Know your struggle मारवाड़ में बेगारी उन्मूलन आंदोलन और उमेदाराम कटारिया

Know your struggle ,
History of emancipation from Untouchability and bonded/forced labour ...
पोस्ट 1 से 5,
मारवाड़ में बेगारी उन्मूलन आंदोलन और उमेदाराम कटारिया
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अग्रणीय मेघ पुरुष श्री उम्मेदाराम कटारिया और मेघवंशी समाज सुधार सभा का प्रथम आयोजन---
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श्री उमेदाराम जी कटारिया अपने समय के बहुत बड़े समाज सुधारक थे और तिंवरी जागीर के कणवारिया थे। सन् 1879 में केरन वाले बाबा जी के प्रयत्नों से जो सुधार कार्य फलीभूत हुआ, उसे मारवाड़ में उमेदाराम जी ने गति दी साथ ही उन्होंने वेठ-बेगारी की जजमानी को नेस्ताबुद किया। मारवाड़ में बेगारी प्रथा के विरुद्ध सन्गठित रूप से सबसे बड़ा आंदोलन श्री उमेदाराम जी कटारीया के नेतृत्व में चला और सफल रहा। उन्होंने शोषण से पीड़ित सभी जातियों को शोषण से मुक्ति दिलाई। उनकी सफलता का राज इस गूढ़ में छुपा था कि इन जातियों में जो तादाद में सबसे ज्यादा और बेठ-बेगारी से ज्यादा पीड़ित जाति थी, उसे सबसे पहले संगठित किया और उनके बलबूते पर और उसके नियंत्रण और निगरानी में इस आंदोलन को चलाया।
03 मार्च 1915 का ऐतिहासिक दिन.
संवत् 1972 के फाल्गुन वदी 6 (छठ) तदनुसार दिनांक 3 मार्च सन् 1915 को उमेदाराम जी ने शोषण से मुक्ति के लिए और बेठ-बेगार से पीड़ित लोगो को संगठित करने के लिए अपने बलबूते पर मेघवाल समाज की एक बड़ी पंचायत (आम सभा) अपने गांव तिंवरी में बुलाई। इसका पूरा खर्चा उमेदाराम जी ने अपनी निजी हैसियत से वहन किया था। हालांकि उस समय आवागमन के साधन नहीं थे, एक जगह से दूसरी जगह जाना बड़ा कठिन था, पर उमेदाराम जी ने सभी मौजिज पंचो को निमंत्रण देकर बुलाया। इसकी शुरूआत नौ पट्टी से हुई। मारवाड़ की कई पट्टीयों से पञ्च तिंवरी में इकट्ठा हुए परंतु उसमें नौ पट्टी आगीवाण हुई। उसमें इन नौ पट्टियों ने सक्रिय भाग लिया- 1.तिंवरी, 2.जेलू, 3.चेराई, 4.ओसियां, 5.नाथडाउ, 6.गांगाणी, 7.केरु, 8.आगोलाई और 9.जोधपुर शहर।
इस पंचायत (आम सभा) में समाज सुधार सभा का गठन किया गया। जिसमें उमेदाराम जी को सर्वसम्मति से इस समाज सुधार सभा का अध्यक्ष चुना गया। उनकी सर-परस्ती में राजबाग, जोधपुर के श्री सुगालाराम भाटिया को उपाध्यक्ष बनाया गया। अन्य प्रमुख पंचों में शाहपुरा, जोधपुर से जेठाराम कड़ेला, घेवड़ा से जेठाराम कड़ेला, गांव जुड़ से राजुराम लीलड़, राजबाग, जोधपुर से प्रतापाराम कडेला, मथानिया से सुजाराम इणखिया, पुंजला से धर्माराम पंवार, चेराई से जुगताराम लीलड़ और चामु से ताराराम कड़ेला आदि सर्वसम्मति से मनोनीत किये गए। इन्होंने समाज में एकता और जागृति पैदा करने में दिन-रात एक कर दिया। वेठ-बेगार नहीं करने और गंदे धंधे नहीं करने की आण के साथ इस सुधार सभा ने महत्वपूर्ण कार्य किया। यह समांज सुधार सभा बाद में मेघवंशी समाज सुधार सभा के रूप में जानी गयी।
मारवाड़ में सबसे ज्यादा मेघ लोग ही निवास करते थे और उनकी बस्तियां मेगवाड़ के नाम से जानी जाती थी और कौम मेघवाल के नाम से। मेघवाल समाज का फैलाव सिंध से लेकर मारवाड़ तक सघन रूप से था और लोग अकाल और लाग-बेगार के कारण इधर-उधर बिखरे हुए थे। उन्हें एक सूत्र में बांधने का काम इस मेंघवाल सुधार सभा ने बड़ी दूरदर्शिता और लगन से किया, जिससे मेघ लोग वेठ-बेगार और शोषण के विरोध में सफल संघर्ष करने हेतु एकजुट हो सके और खिलाफत आंदोलन को सफल बना पाये। यह उमेदाराम जी के कुशल नेतृत्व का ही परिणाम था। यह ऐतिहासिक घटना 03-03-1915 को हुई।

2. श्री उमेदाराम जी दूरदृष्टा और परिपक्व नेता थे। उनमें संगठन की अद्भुत शक्ति थी। अपने कुशल नेतृत्व के गुणों के कारण वे सबके आदर के पात्र थे। गुलाम भारत की जोधपुर रियासत में भी उनका बहुमान था! कांग्रेस का हरिजन सेवक संघ यहाँ कार्यरत था, जिसका नेतृत्व गैर अछूतों के हाथों में था। उमेदाराम जी चाहते थे कि समाज का अपना नेतृत्व उभरे। इस हेतु संगठन बनाना जरूरी था, इसलिये उन्होंने मेघवालों के पंचायत के दायरे को मजबूत बनाने हेतु ठोस कार्य करने का बीड़ा हाथ में लिया। वे यह बात भली भांति जानते थे कि अपने खुद के नेतृत्व के बिना यह समाज आगे नहीं बढ़ सकता है, वे अपनी सभाओं में बहुधा कहा करते थे कि हमारा सशक्त संगठन नहीं होने से दूसरे लोग हमारा नेतृत्व करना अपनी हकदारी समझते है और हमें हेठियाल समझते है। इन दूसरे नेताओं की नज़रों में हमारी कीमत भेड़-बकरियों के बराबर ही है। इसलिए इससे उभरने के लिए हमारी पंचायत पट्टी को मजबूत करना बहुत जरुरी है। उन्होंने मेघवालों के पंचायती गणतंत्र को पुनः मजबूती देने के लिए पूरी ऊर्जा लगा दी और जीवन भर उसके लिए कार्य करते रहे।
उस समय नौ पट्टी को साथ में लेकर उमेदाराम जी ने चौदह पट्टियों का पुनर्गठन प्रस्तावित किया, जिसे सभी की स्वीकृति मिल गयी। ये 14 पट्टियां निम्न तरह से प्रस्तावित की गयी---
1. तिंवरी, 2. ओसियां, 3. आगोलाई, 4. गंगाणी, 5. चेराई, 6. लोहावट, 7. जेलू, 8. इंद्रोका, 9. केरु, 10. बेलवा (इन्दावटी), 11. केतू (गोगादे), 12. सेतरावा ( देवराज), 13. देचू (चाडदे) और 14. मथानिया।
इन सब का न्याय क्षेत्र और सीमा निर्धारण भौगोलिक हिसाब से परम्परागत रूप से अनुभव और कायदे से किया गया। इन पट्टियों के मुख्यालय को मथारा के नाम से पुकारा जाता था। मथारा यानि प्रमुख, सदर। इन मथारों के अधीन आने वाले गांवों और बस्तियों के सभी प्रकार के बाहरी और आतंरिक झगड़ों-झमेलों, वादों और अन्याय-अत्याचारों को माकूल तरीके से निपटने का अधिकार इन मथारों को दिया गया। इन के अधीन आने वाले गांवों को खेड़ा या बाड़िया कहा गया। इन मथारों की सीमाएं उनके अधीन आने वाले गांवों तक थी, जो इस प्रकार से निर्धारित की गयी थी-
1 तिंवरी मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 8 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. तिंवरी, 2. बलरवा, 3. बींजवाड़ीया, 4. कोरडा, 5. गोपासरिया, 6. बड़ो, 7.बडला और 8. बीजारिया।
2.मथानिया मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 10 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.मथानिया, 2. चौपासनी, 3. जुड़, 4. उम्मेदनगर, 5. रामपुरा, 6. माणकलाव, 7. कोरडा, 8. बिंजवाडिया, 9. देवता की ढाणी और 10. बासनी (लाछा).
3. ओसियां मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 14 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.ओसियां, 2. बड़ा बास, 3. दुनाडा, 4. बैठवासिया, 5. थोब, 6. पिण्डजी की ढाणी, 7. रमलाड़ा 8. पलासला, 9.खिटोकोर, 10.तापु, 11. बांरा, 12. नेवरा, 13. भियाडिया और 14. होंणीया।
4. चेराई मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. चेराई, 2. मीनो री ढाणी, 3. बेह, 4. खेतासर, 5. बडोडा गांव, 6. घेवड़ा, 7. चामु, 8. पांचला, 9. डाबडी, 10. खाबडा, 11. बारनाउ और 12.बडला।
5. लोहावट मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. लोहावट ( बिश्नोई बास), 2. लोहावट( जाटा बास), 3.भाकरी, 4. भेड, 5. ढेलाणा, 6. सांवडाउ, 7. हरलाई, 8. भीकमकोर, 9. नौसर, 10. पल्ली, 11. निम्बों का तालाब और 12. मुंजार।
6. जेलू मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 18 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. जेलू, 2. गगाड़ी, 3. खुडियाला, 4. चिड़वाई, 5. बिराई, 6. उटाम्बर, 7. संतोड़ा, 8. माँलूंगा, 9. नेरवा, 10. बासनी (भाटिया), 11. डिगड़ी, 12. बड़ों, 13. चोंचलवा, 14. बीजारिया, 15. बडोडा गांव, 16. घेवड़ा, 17. बिराई ( मोटल बास) और 18. बिराई ( बिछलों बास)
7. आगोलाई मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. आगोलाई, 2. भटलाई, 3. दुगर, 4. कोरना, 5. सुरानी, 6. तुलेसर, 7. बावरली, 8. राजवा, 9. घटियाला, 10. हिंगोला, 11. मेगलाया और 12. बासनी ( मनना)
8. केरु मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. केरु, 2. बेरु, 3. लोरडी, 4. मेघलाया, 5.राजवा, 6.गोलासनी, 7.चांवडा, 8.बड़ली, 9.भाकर वालो बास, 10.नारवा, 11.सालोड़ि और 12.नेरवा ।
9. इन्दरोका मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.इन्द्रोका, 2.बालरवा, 3.बेरु, 4.बींजवाड़ीया, 5.नारवा, 6.गोयलो की ढाणी, 7.गंढ़ेरों की ढाणी और 8.चोखा ।
10.बेलवा मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 24 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.बेलवा, 2.गोपालसर, 3.बस्तवा (माता), 4.बस्तवा (सुण्डा), 5.भालू (राजवा), 6.भालू (बड़ा बास), 7.भालू (रतां), 8.बेरा, 9.देयातु, 10.डेरिया, 11.मेंरिया, 12.जुठिया, 13.जोल्याला, 14.जीया बेरी, 15.घुडीयाला, 16.बालेसर(सत्ता), 17.बालेसर(दुर्गावता), 18.कुई(इंदा), 19.कुई(बामण), 20.अजबार, 21.निम्बों रो गांव, 22.राजवतों की ढाणी, 23.बेलवा(खत्री) और 24.भालू(कुमाणिया) .
11.केतु(गोगादे पट्टी) मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 18 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.केतू(बडो बास), 2.केतू(हमो), 3.केतू(मदा), 4.सेखाला, 5.खिरजों, 6.तेना, 7.भूंगरा, 8.शेरगढ़, 9.रायसर, 10.टिम्बडी, 11.साई, 12.गड़ा, 13.सोइन्तरा, 14.भांडू, 15.सियोदों, 16.भोजो का बास, 17.केतू(मोनवता) और 18.आँवारो बास ।
12. सेतरावा(देवराज पट्टी) मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 15 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.सेतरावा, 2.सोलंकियातला, 3.सोमेसर(सौमेर), 4.जेठानिया, 5.बुड़किया, 6.कलाउ, 7.देसानिया(दासानिया), 8.खिंयारिया(खियासरिया), 9.चौरड़िया, 10.देड़ा, 11.खनोडि, 12.लोहारंद, 13.कानोडिया, 14.हापों और 15.डेढों ।
13. देचू(चाड दे पट्टी) मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.देचू, 2.ठाडिया, 3.गिलकोर, 4.भोजोकोर, 5.कोलू, 6.ऊठवलिया, 7.आरलाई(आसारलाई), 8.सगरो, 9.मडला(पनी), 10.मडला(सूक), 11.कनोडिया और 12.मडला(बडा)
14. गंगाणी मथारा व पट्टी-
इसके अधीन आने वाले 16 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.गंगाणी, 2.कासटी, 3.भवाद, 4.नेतडा, 5.हरडानी, 6.घडाव, 7.खारी, 8.सालवा, 9.खरड़ा, 10.कैलावा, 11.बावड़ी 12.बुडकिया, 13.थबुकड़ा, 14.दईकडा, 15.गेलाव, 16.लूणावास, 17.सुरपुरा और 18.जाजीवाल आदि।
इन मथारों के गठन को लेकर मेघवाल समाज के सभी खेड़ों से सन् 1915 से लंबा विचार विमर्श चला। जिसमें उमेदाराम जी कटारिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही और उनकी सरपरस्ती में मेघवाल समाज ने पंचायत के इन मथारो के गठन का संकल्प लेकर इसको हकीकत में ढालने का काम हाथ में ले लिया, जिसे 1920 में हकीकत में ढाल दिया। वेठ-बेगार और जोर-जबरदस्ती के विरुद्ध सभी एक साथ प्रतिरोध में उतरने लगे, जिससे मेघवाल समाज में एक नयी जान आ गयी और समाज की कमजोरियों और अच्छाईयों का भी पता लगने लग गया। सभी खेड़ों के प्रस्तावित मथारों की नैतिक और सामाजिक मजबूती देखकर सन् 1920 में इनकी विधिवत घोषणा कर दी गयी। जो जो मथारे प्रस्तावित किये गए थे और उनके मातहत आने वाले गांव तय किये थे, उनमें एक-दो मथारों में एक- दो गांव इधर-उधर करके इसको असली जामा पहना दिया। मेघवालों के प्राचीन पंचायती गणतंत्र को नव-जीवन देने का श्रेय निःसंदेह उमेदाराम जी कटारिया को ही जाता है, क्योंकि उन्होंने हर प्रकार की विपत्ति का सामना करते हुए समाज को सम्बल देते हुए इसे अंजाम दिया।
अपना घर फूँक कर निस्वार्थ भाव से समाज का नेतृत्व करने का यह एक बेमिसाल उदाहरण है। इन 14 मथारों के अस्तित्व में आने और सक्रिय होने पर चौरासी का भी पुनर्गठन किया गया। यह 14 मथारों का एक भुवन चौरासी में भी आगीवाण रहा। जिसे अन्य पोस्ट में लिखा जायेगा!
उन्नीसवीं शताब्दि का उत्तरार्द्ध मेघवाल समाज के लिये ही नहीं, बल्कि सारे भारत के लिये जागृति का समय था। मेघवाल समाज अपनी हैसियत को लेकर फिक्र मंद था। ऐसे में मेघ शिरोमणि केरण महाराज के प्रयत्नों से समाज का आंतरिक और बाहरी संगठन मजबूत होने लगा और समाज में नई उम्मीद जगी। बीसवीं शताब्दि के प्रारंभ के साथ ही मेघ समाज ने भी अपने को वृहत्तर हिन्दू समाज में खपाने और उसमें हैसियत हासिल करने के प्रयत्न तेज कर दिए। सन् 1891 में आर्य-समाज की स्थापना हुई, उससे पहले ही मेघों में वृहत्तर हिन्दू समाज की धारा में शामिल होने और उनके साथ बराबरी से पेश आने के छोटे-बड़े आंदोलन जगह-जगह होने लगे। आर्य-समाज ने भी शुद्धि का आंदोलन शुरू कर मेघों की इस जागृति को बल दिया। मेघवाल समाज सिंध से लेकर मारवाड़ तक सघन रूप से फैला हुआ था और अकाल की विभीषिकाओं और बैठ-बेगारी से त्रस्त था। ऐसे में मेघो को हर-एक वो आंदोलन जो मेघों की तकलीफ़ों को कम करने में मदद करने वाला लगता उनको लुभाता था। इसलिए 20वीं शताब्दि के प्रारंभ से ही मेघ लोग ऐसे आंदोलनों से जुड़ते गए। सन् 1901-1902 के दरम्यान मुल्तान और उसके आस-पास के क्षेत्रों में 30000(तीस हजार) मेघों ने आर्य-समाज के शुद्धिकरण से आर्य धर्म अपनाया। सन् 1911 में मीरपुर में 1047 लोग आर्य समाजी बने। रहन-सहन, खान-पान और रीति-रिवाज, शील-संस्कार आदि सब इस समय के वैचारिक और व्यवहारिक मुद्दे थे। शुद्धि मन्त्र, शुद्धि क्रिया और हरिद्वार-स्नान आदि उस समय प्रचलन में आने लगे, जिसका जिक्र मैंने अन्यत्र किया है।
मेघवालों के सामने सिर्फ आचार-विचार या रहन-सहन की ही समस्या नहीं थी, बल्कि जागीरदारों के जुल्म और शोषण की, जिसे वेठ-बेगार के नाम से परम्परागत रूप से किया जा रहा था, उससे मुक्त होने की भी समस्या थी। इन सब से मुकाबला करने और इनसे निजात पाने के लिए मेघवालों की न्यात को मजबूत करने का विचार जब 1915-16 में थिर हो गया तो उमेदाराम कटारिया और उनके साथ के मौजिज पंच घर-बार छोड़कर जगह-जगह जाकर समाज में जागृति फैलाने लगे और जहाँ भी ऐसा जुल्म, ज्यादती या अत्याचार होता पूरा समाज एक राय होकर मुकाबला करता। वे पूरे समाज में नया जोश और साहस पैदा करने में कामयाब हुए।
लगातार पांच-छः वर्षों तक ऐसा संघर्ष करने से जब उनको पूरा विश्वास हो गया कि मेघ समाज अपना खुद का नेतृत्व खुद कर सकता है और उस पर आने वाली हर मुसीबत का मुकाबला अपने स्तर पर कर सकता है तो जो मेघवाल समाज सुधार सभा का ताना-बाना बुना था, उसको असली जामा पहनाने के लिए एक विशाल आम सभा बुलाने का निर्णय लिया। सभी गांवों के पंचो और मौजिज लोगों को इकट्ठा कर, उनसे विचार विमर्श कर समाज सुधार सभा के विधिवत गठन हेतु बालरवा में न्यात बुलायी गयी। इसका मुख्य उद्देश्य बेठ-बेगार और अत्याचारों के खिलाफ संगठित संघर्ष करना था। संघर्ष की रणनीति, उसमें आने वाली परेशानिया, दूसरी जाति-बिरादरी द्वारा मेघवाल समाज के बहिष्कार की स्थिति में उसका मुकाबला करना और समाज के आंतरिक लाग-बाग और रश्मो रिवाज आदि कई पहलुओं पर भी इस न्यात में मंथन करने का तय हुआ।
06 फरवरी 1920 का ऐतिहासिक दिन
यह विशाल जन-आंदोलन एक सभा के रूप में दिनांक 6 फरवरी, 1920 (संवत् 1976 के चैत की शुक्ल पक्ष की छठ) को गांव बालरवा बावड़ी पर उमेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में हुआ। इस सभा में जगह-जगह से मेघवाल समाज के प्रतिनिधि सरीक हुए और एक मत से मेघवालों की अपनी पंचायती व्यवस्था को नया रूप देने का प्रस्ताव पास किया और जो 14 पट्टियों की रूपरेखा बनायी गयी थी, उसे न्यात ने एक-दो मथारों में एक-दो गांव इधर-उधर करते हुए उनकी सीमा को भी सर्व-सम्मति से मंजूरी दे दी। इस प्रकार से समाज सुधार सभा का गठन 6 फरवरी 1920 को होना माना जा सकता है। वर्तमान में मेघवाल समाज में जो न्यात के मथारे और पञ्च-पंचायती की मर्यादाएं है, वे इसी सभा की देन है। मारवाड़ के मेघवालो के इतिहास में अपनी तरह की यह पहली सभा या सम्मेलन था, जिसमें बेगारी, गैर बराबरी और अन्याय-अत्याचार के विरोध में खुलकर इस समाज ने सामूहिक रूप से चर्चा की और सामूहिक रूप से खिलाफत का बिगुल बजाया। इसके बाद ऐसा एक भी मौका नहीं आया, जिसमें मेघवालों ने पीछे मुड़कर देखा हो। वे हर जगह पर और हर स्तर पर संगठित होकर मुकाबला करते रहे। मथारों और खेड़ों के निर्धारण के साथ-साथ हर गांव और तहसील में भी सभाएं करने और वहां पर अनुभवी लोगों का दल बनाने का निर्णय भी इस न्यात में लिया गया। इस से गांवों में निवास करने वाले मेघों में एकता, स्फूर्ति और जागृति का ऐतिहासिक संचार हुआ। गांवों के पंच अपने अपने क्षेत्र में इस पर पूरी निगरानी और नियंत्रण रखने लगे। गांवों के पंच अपने प्रभाव से समाज के नियमों का पालन करते हुए बेठ-बेगार और सामंती जुल्म के खिलाफ एकजुटता से लग गए और जहाँ कहीं भी ऐसा वाकया होता वे ढाल बनकर वहाँ खड़े होते और शोषण के खिलाफ संघर्ष करते।
मेघवाल समाज के इन संगठित प्रयासों से इन क्षेत्रों में बेठ-बेगार आजादी से बहुत पहले ख़त्म हो गयी। इसमें बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की विचारधारा का प्रभाव, जिसे पंच लोग 'उमेदगारी' कहते थे, के साथ-साथ, यूनीयनिस्ट मिशन, कांग्रेस और आर्य समाज के प्रयासों से मेघवाल समाज को बहुत बड़ा सम्बल मिला, जिसका वर्णन अन्यत्र किया गया है। मेघो के इतिहास में सन् 1920 का वर्ष 'शोषण से मुक्ति' का वर्ष माना जाता है। यह वर्ष अंग्रेजी हकुमत और रियासत के शोषण से मुक्ति की चेतना से लबरेज था। सभी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी मेघों ने बेठ-बेगारी के शोषण के जाल को उतार फेंक दिया। इसमें मेघों की बुजुर्ग पीढ़ी की सूझ-बूझ और चेतना की जितनी प्रशंसा की जाय, उतनी ही कम है। जब हर गांव में राजपूतों और जागीरदारों का भयंकर आतंक और शोषण था और खेत-खलिहानों के कोई पट्टा-पूली नहीं थे, कमाई के कोई साधन नहीं थे और सेठ-शाहूकारी के कर्ज के बोझ तले पूरा समाज पिस रहा था, तो ऐसे में उमेदाराम जी जैसे कर्मठ मेघ पुरुषों को हिम्मत और होशियारी से ही यह समाज इनके चंगुल से अपने को आजाद करा पाया।
इस सम्मेलन या न्यात में उमेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में 14 पट्टी के जो प्रमुख़ पंच सम्मलित हुए, उनमें मुख्यतः लोहावट से उमेदाराम जयपाल, घेवड़ा से जेठाराम कड़ेला, चामु से ताराराम कड़ेला, बेलवा से चुतराराम लिखणिया, मथानिया से लाभूराम पालड़िया, इन्द्रोका से हरिंगाराम इणखिया, नारवा से पुरखाराम भाटिया, जुड़ से राजुराम लीलड़, दूनाडा से रावतराम लोहिया, भीकमपुर से केसुपराम आइस,राजबाग-जोधपुर से सुगालाराम भाटिया, भीकमपुर से सादुलराम पिडियार, राजबाग-जोधपुर से प्रतापराम पंवार, पुंजला-जोधपुर से मगजी, मथानिया से सूजाराम इनखिया, खेतासर से किरपाराम पिडियार, बींजवाड़ीया से भोमाराम कटारिया और बालरवा से पीराराम कड़ेला आदि प्रमुख थे।
इस सभा में शादी-ब्याह के लाग-बाग को लेकर जोधपुर की बारह(12) बस्ती 14 पट्टी से अलग हो गयी थी। जोधपुर की 12 बस्ती पर अलग पोस्ट देखें।
जोधपुर शहर और ओसियां का सम्मेलन--
पिछली पोस्ट में बताया गया था कि सन् 1915 की तिंवरी की सभा में जोधपुर 9 पट्टी में शामिल था परंतु 1920 के बालरवा के सम्मेलन में जोधपुर 14 पट्टी से अलग हो गया था। हालाँकि व्यवहार की थाली में जोधपुर शामिल रहा। जोधपुर शहर में बेठ-बेगारी और अत्याचार का इतना आतंक भी नहीं था, जितना गांवों में था। गांवों और शहरों में उमेदाराम जी कटारिया की देखरेख और कुशल नेतृत्व में मेघवालों का 'शोषण-मुक्ति' आंदोलन पूरे जोर-शोर से चल रहा था और समाज मजबूती से एक सूत्र में एकसार हो गया। आपसी समझ, चेतना और एकता से बेठ-बेगार कम ही नहीं हुई, बल्कि उस पर पूरी पाबंदी लग गयी। गांवों में लगातार एक-दूसरे से मेल-मुलाकात, गांवों में सभा और मथारों के क्रिया-कलापों ने शोषक वर्ग को मजबूर कर दिया था। गांवों में लोग मथारे के पंचों के निर्देशों का पूरा पालन करने लग गए। मथारों के न्याय-क्षेत्र में आंतरिक या बाहरी जो भी मुद्दा या मामला आता वे तत्परता से उसका निवारण कर देते। उमेदाराम जी की देखरेख में मथारों और 84 की जो सामाजिक व्यवस्था पुनर्जीवित की थी वह पूरी तरह से कारगर होकर सक्रिय रूप से व्यवहार में अपनायी जा चुकी थी। निर्बाध रूप से उसका काम आगे बढ़ता रहा। शहर में भी हरिजन उद्धार और कांग्रेसी स्वयंसेवक जैसे कई संगठनों में भी मेघ लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे और इनका सहयोग मेघ समाज को भी मिलता गया। गांवों और मथारों में समय समय पर सम्मेलन, सभाएं या न्यात जुड़ती गयी, परंतु सन् 1920 के बाद मेघवाल समाज सुधार सभा का कोई बड़ा सम्मेलन हुआ हो, ऐसा जानकरी में नहीं आया।
सन् 1947 को देश आजाद हुआ, मेघवाल समाज ने उसकी ख़ुशी मनाई। सन् 1950 को जब देश का संविधान लागु हुआ और रियासतों को पुराने तौर-तरीके छोड़ने को मजबूर होना पड़ा तो मेघवाल समाज ने फिर बड़ा सम्मेलन करने का विचार किया।सन् 1920 में गांवों और शहर की पंचायत अलग हो गयी थी, इसलिये दोनों जगह अलग-अलग सम्मेलन हुए। यह समाज सुधार सभा के नाम से ही हुए।
09 सितम्बर 1951 का ऐतिहासिक दिन
जोधपुर पंचायत का सम्मेलन-- जोधपुर शहर में बारह बस्ती का विशाल सम्मेलन करने के लिए सर्वश्री बस्तीराम तुंवर, पुनाराम लीलड़, हरजी बामणिया, भाणुराम, विडदाराम कड़ेला आदि पंचों ने पहल की और इसका सफल आयोजन किया। शहर में पहले 6 बस्ती थी, जो इस समय तक 12 हो गयी थी। शहर की पंचायत में इनका सभी का अलग वजूद स्वीकार किया गया। उस समय ये 12 बस्तियां निम्न थी- 1. शाहपुरा(सायपूरा), 2. राजबाग, 3. महामंदिर, 4. सहरदार, 5. मंडोर, 6. पुंजला, 7. इमरती बेरा, 8. दारू का ठेका, 9. कुचामन हवेली, 10. किली खाना, 11. सरदारपुरा और 12. बिजली घर।
जोधपुर शहर की बारह बस्ती के प्रमुख पंचों और आगीवाण नेताओं की ओर से दिनांक 9 सितंबर, 1951 (संवत् 2008 के भादवा की शुक्ल पक्ष की बीज ) को भगवानदास जी जोया की अध्यक्षता में आम सभा का आयोजन महामंदिर के लखजी के धड़े पर हुआ। इस सभा में देश की आजादी और गणतंत्र की खुली हवा का स्वागत किया गया। इस सभा में समाज हित में कई निर्णय लिए गए और मेघवाल समाज का जीवन स्तर सुधारने के लिए खान-पान, रहन-सहन में सुधार और बच्चों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। शहर की इस सभा में 12 बस्ती के निम्न प्रमुख़ पंच मौजिज थे- 1. शाहपुरा से भाणु जी गोदा, छोगाराम बामणिया, सूरजमल कड़ेला, गंगाराम कड़ेला, दयाराम पंवार आदि, 2. राजबाग से प्रतापजी पंवार, सुरजमल दइया, रुगाराम, लाधुराम लीलड़, बस्तीराम इणखिया आदि, 3. महामंदिर से मगाराम पिडियार, दयाराम पिडियार आदि, 4. सहरदार से बिडदाराम कड़ेला, चेलाराम राठौड़ीया, भंवरलाल भाटिया, उदाराम पिडियार आदि, 5.मन्डोर से नथुराम गोदा, पाखुराम पंवार, जेठुजी गोदा आदि, 6.पुंजला से भीयाराम पालड़िया, रुगनाथ पंवार, धर्माराम पालड़िया आदि, 7. इमरती बेरा से रूपाराम पंवार, शिवनाथ सोलंकी, 8. दारू का ठेका से खिंवराज गोधा, सूरजमल बोसिया आदि, 9. कुचामन हवेली से उमाराम जी, ढीमजी सेजू आदि, 10. किलिखाना से टाउराम कड़ेला, हरेश पंवार आदि, 11. सरदारपूरा से नारायणजी तुंवर, मांगीलाल लालणेसा आदि, और 12. बिजली घर से रामूजी कड़ेला, जेठुजी पिडियार, गणेशराम देपन, हजारीराम बामणिया आदि।
इस अवसर पर शहर की कार्यकारिणी का भी गठन किया गया, जिसमें सर्वसम्मति से भगवानदास जोया को सभापति, बस्तीराम तुंवर को उपसभापति, हजारीराम बामणिया को कोषाध्यक्ष, भाणुराम गोधा को मंत्री, बिउदाराम गदेला को प्रचार मंत्री और पुनाराम लीलड़ को पोतदार चुना गया।
13 अप्रैल 1952 का ऐतिहासिक दिन(डॉ आंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या)
गांवों की पंचायतों का ओसियां-सम्मेलन- देश के आजाद होने के बाद गांवों में भी ख़ुशी मनायी गयी और 1952 में गांवों की पट्टियों का एक बड़ा सम्मेलन किया गया। यह सम्मेलन संवत् 2009 की चैत वद एकम तदनुसार दिनांक 13 अप्रेल 1952 को ओसियां के देव के बेरे पर उमेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। यह एक आम चौरासी (84) न्यात थी। इस चौरासी की न्यात यानि विशाल सभा में समाज में जो कुरीतियां है, उस पर विचार विमर्श किया गया और उन्हें शीघ्र त्यागने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया। बेठ-बेगार के बारे में भी विमर्श हुआ, जिसे बहुत पहले बन्द कर दिया था, परंतु कहीं-कहीं पर इसके होने की जानकारी भी मिली। इस पर विचार कर सर्वसम्मति से सख्त निर्णय लिया कि किसी भी सूरत में बेठ-बेगार कतई नहीं की जाय। समाज के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिये बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाये। विवाह आदि सामाजिक रीति-रिवाजों में लाग-बाग आदि भी सर्वसम्मति से तय किये गये।
इस चौरासी में मुख्य-मुख्य पंच निम्न लिखित थे- सदर तिंवरी से उमेदाराम जी कटारिया, लोहावट से अमेदाराम जयपाल, घेवड़ा से भीयाराम इणखिया, पांचला से मंगलाराम लिखणिया, खेतासर से गोरखराम और नारूराम पिडियार, थोब से भीयाराम धनदे, होंणीया से जोधाराम कटारिया, बड़ला से मेहरामराम पिडियार, कोरडा से भेराराम गुलू, ओसियां से मोडाराम बोसिया, गुलाराम गंढेर और लाधुराम सोलंकी आदि प्रमुख थे।
सन् 1920 के बाद होने वाले सम्मेलनों में ये बड़े सम्मेलन थे और इनका विस्तृत और दूरगामी प्रभाव मेघ समाज पर पड़ा।
अग्रणीय मेघ पुरुष श्री उमेदाराम कटारिया और मेघवंशी समाज सुधार सभा का संगठन कार्य:
उन्नीसवीं शताब्दि का उत्तरार्द्ध मेघवाल समाज के लिये ही नहीं, बल्कि सारे भारत के लिये जागृति का समय था। मेघवाल समाज अपनी हैसियत को लेकर फिक्र मंद था। ऐसे में मेघ शिरोमणि केरण महाराज के प्रयत्नों से समाज का आंतरिक और बाहरी संगठन मजबूर होने लगा और समाज में नई उम्मीद जगी। बीसवीं शताब्दि के प्रारंभ के साथ ही मेघ समाज ने भी अपने को वृहत्तर हिन्दू समाज में खपाने और उसमें हैसियत हासिल करने के प्रयत्न तेज कर दिए। सन् 1891 में आर्य-समाज की स्थापना हुई, उससे पहले ही मेघों में वृहत्तर हिन्दू समाज की धारा में शामिल होने और उनके साथ बराबरी से पेश आने के छोटे-बड़े आंदोलन जगह-जगह होने लगे। आर्य-समाज ने भी शुद्धि का आंदोलन शुरू कर मेघों की इस जागृति को बल दिया। मेघवाल समाज सिंध से लेकर मारवाड़ तक सघन रूप से फैला हुआ था और अकाल की विभीषिकाओं और बैठ-बेगारी से त्रस्त था। ऐसे में मेघो को हर-एक वो आंदोलन जो मेघों की तकलीफ़ों को कम करने में मदद करने वाला लगता उनको लुभाता था। इसलिए 20 शताब्दि के प्रारंभ से ही मेघ लोग ऐसे आंदोलनों से जुड़ते गए। सन् 1901-1902 के दरम्यान मुल्तान और उसके आस-पास के क्षेत्रों में 30000(तीस हजार) मेघों ने आर्य-समाज के शुद्धिकरण से आर्य धर्म अपनाया। सन् 1911 में मीरपुर में 1047 लोग आर्य समाजी बने। रहन-सहन, खान-पान और रीति-रिवाज, शील-संस्कार आदि सब इस समय के वैचारिक और व्यवहारिक मुद्दे थे। शुद्धि मन्त्र, शुद्धि क्रिया और हरिद्वार-स्नान आदि उस समय प्रचलन में आने लगे, जिसका जिक्र मैंने अन्यत्र किया है।
मेघवालों के सामने सिर्फ आचार-विचार या रहन-सहन की ही समस्या नहीं थी, बल्कि जागीरदारों के जुल्म और शोषण की, जिसे वेठ-बेगार के नाम से परम्परागत रूप से किया जा रहा था, उससे मुक्त होने की भी समस्या थी। इन सब से मुकाबला करने और इनसे निजात पाने के लिए मेघवालों की न्यात को मजबूत करने का विचार जब 1915-16 में थिर हो गया तो उमेदाराम कटारिया और उनके साथ के मौजिज पंच घर-बार छोड़कर जगह-जगह जाकर समाज में जागृति फैलाने लगे और जहाँ भी ऐसा जुल्म, ज्यादती या अत्याचार होता पूरा समाज एक राय होकर मुकाबला करता। वे पूरे समाज में नया जोश और साहस पैदा करने में कामयाब हुए।।
लगातार पांच-छः वर्षों तक ऐसा संघर्ष करने से जब उनको पूरा विश्वास हो गया कि मेघ समाज अपना खुद का नेतृत्व खुद कर सकता है और उस पर आने वाली हर मुसीबत का मुकाबला अपने स्तर पर कर सकता है तो जो मेघवाल समाज सुधार सभा का ताना-बाना बुना था, उसको असली जामा पहनाने के लिए एक विशाल आम सभा बुलाने का निर्णय लिया। सभी गांवों के पंचो और मौजिज लोगों को इकट्ठा कर, उनसे विचार विमर्श कर समाज सुधार सभा के विधिवत गठन हेतु बालरवा में न्यात बुलायी गयी। इसका मुख्य उद्देश्य बेठ-बेगार और अत्याचारों के खिलाफ संगठित संघर्ष करना था। संघर्ष की रणनीति, उसमें आने वाली परेशानिया, दूसरी जाति-बिरादरी द्वारा मेघवाल समाज के बहिष्कार की स्थिति में उसका मुकाबला करना और समाज के आंतरिक लाग-बाग और रश्मो रिवाज आदि कई पहलुओं पर भी इस न्यात में मंथन करने का तय हुआ।
यह विशाल जन-आंदोलन एक सभा के रूप में दिनांक 6 फरवरी, 1920 (संवत् 1976 के चैत की शुक्ल पक्ष की छठ) को गांव बालरवा बावड़ी पर उमेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में हुआ। इस सभा में जगह-जगह से मेघवाल समाज के प्रतिनिधि सरीक हुए और एक मत से मेघवालों की अपनी पंचायती व्यवस्था को नया रूप देने का प्रस्ताव पास किया और जो 14 पट्टियों की रूपरेखा बनायी गयी थी, उसे न्यात ने एक-दो मथारों में एक-दो गांव इधर-उधर करते हुए उनकी सीमा को भी सर्व-सम्मति से मंजूरी दे दी। इस प्रकार से समाज सुधार सभा का गठन 6 फरवरी 1920 को होना माना जा सकता है। वर्तमान में मेघवाल समाज में जो न्यात के मथारे और पञ्च-पंचायती की मर्यादाएं है, वे इसी सभा की देन है। मारवाड़ के मेघवालो के इतिहास में अपनी तरह की यह पहली सभा या सम्मेलन था, जिसमें बेगारी, गैर बराबरी और अन्याय-अत्याचार के विरोध में खुलकर इस समाज ने सामूहिक रूप से चर्चा की और सामूहिक रूप से खिलाफत का बिगुल बजाया। इसके बाद ऐसा एक भी मौका नहीं आया, जिसमें मेघवालों ने पीछे मुड़कर देखा हो। वे हर जगह पर और हर स्तर पर संगठित होकर मुकाबला करते रहे। मथारों और खेड़ों के निर्धारण के साथ-साथ हर गांव और तहसील में भी सभाएं करने और वहां पर अनुभवी लोगों का दल बनाने का निर्णय भी इस न्यात में लिया गया। इस से गांवों में निवास करने वाले मेघों में एकता, स्फूर्ति और जागृति का ऐतिहासिक संचार हुआ। गांवों के पंच अपने अपने क्षेत्र में इस पर पूरी निगरानी और नियंत्रण रखने लगे। गांवों के पंच अपने प्रभाव से समाज के नियमों का पालन करते हुए बेठ-बेगार और सामंती जुल्म के खिलाफ एकजुटता से लग गए और जहाँ कहीं भी ऐसा वाकया होता वे ढाल बनकर वहाँ खड़े होते और शोषण के खिलाफ संघर्ष करते।
मेघवाल समाज के इन संगठित प्रयासों से इन क्षेत्रों में बेठ-बेगार आजादी से बहुत पहले ख़त्म हो गयी। इसमें बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की विचारधारा का प्रभाव, जिसे पंच लोग 'उमेदगारी' कहते थे, के साथ-साथ, यूनीयनिस्ट मिशन, कांग्रेस और आर्य समाज के प्रयासों से मेघवाल समाज को बहुत बड़ा सम्बल मिला, जिसका वर्णन अन्यत्र किया गया है। मेघो के इतिहास में सन् 1920 का वर्ष 'शोषण से मुक्ति' का वर्ष माना जाता है। यह वर्ष अंग्रेजी हकुमत और रियासत के शोषण से मुक्ति की चेतना से लबरेज था। सभी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी मेघों ने बेठ-बेगारी के शोषण के जाल को उतार फेंक दिया। इसमें मेघों की बुजुर्ग पीढ़ी की सूझ-बूझ और चेतना की जितनी प्रशंसा की जाय, उतनी ही कम है। जब हर गांव में राजपूतों और जागीरदारों का भयंकर आतंक और शोषण था और खेत-खलिहानों के कोई पट्टा-पूली नहीं थे, कमाई के कोई साधन नहीं थे और सेठ-शाहूकारी के कर्ज के बोझ तले पूरा समाज पिस रहा था, तो ऐसे में उमेदाराम जी जैसे कर्मठ मेघ पुरुषों को हिम्मत और होशियारी से ही यह समाज इनके चंगुल से अपने को आजाद करा पाया।
इस सम्मेलन या न्यात में उमेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में 14 पट्टी के जो प्रमुख़ पंच सम्मलित हुए, उनमें मुख्यतः लोहावट से उमेदाराम जयपाल, घेवड़ा से जेठाराम कड़ेला, चामु से ताराराम कड़ेला, बेलवा से चुतराराम लिखणिया, मथानिया से लाभूराम पालड़िया, इन्द्रोका से हरिंगाराम इणखिया, नारवा से पुरखाराम भाटिया, जुड़ से राजुराम लीलड़, दूनाडा से रावतराम लोहिया, भीकमपुर से केसुपराम आइस,राजबाग-जोधपुर से सुगालाराम भाटिया, भीकमपुर से सादुलराम पिडियार, राजबाग-जोधपुर से प्रतापराम पंवार, पुंजला-जोधपुर से मगजी, मथानिया से सूजाराम इनखिया, खेतासर से किरपाराम पिडियार, बींजवाड़ीया से भोमाराम कटारिया और बालरवा से पीराराम कड़ेला आदि प्रमुख थे।
इस सभा में शादी-ब्याह के लाग-बाग को लेकर जोधपुर की बारह(12) बस्ती 14 पट्टी से अलग हो गयी थी। जोधपुर की 12 बस्ती पर अलग पोस्ट देखें।
अग्रणीय मेघ पुरुष श्री उम्मेदाराम जी कटारिया और मेघवंशी समाज सुधार सभा का कार्य---
पिछली पोस्ट में उमेदाराम जी कटारिया के शोषण-मुक्ति के प्रयासों की प्रमुख-प्रमुख घटनाओं और उनकी तारीखों का उल्लेख किया गया था। उनके सफल मार्ग निर्देशन और उनके व उनकी जुझारू टीम के त्याग और बलिदान से ही इस क्षेत्र में शोषित जातियां एकजुट हो सकी और शोषण, बेठ-बेगारी और जजमानी के चंगुल से बाहर निकल सकी। इसी क्रम में केतु मथारे ने समाज-सुधार सभा की सभा अपने क्षेत्र में करने का निवेदन किया, जिसे 14 पट्टी ने स्वीकार कर लिया और अगली न्यात(महासभा) शेरगढ़ में करने का तय हुआ।
दिनांक 3 मार्च 1915 की तिंवरी की सभा के बाद 6 फरवरी 1920 की बालरवा, 9 सितंबर 1951 की जोधपुर और 13 अप्रेल 1952 की ओसियां की बड़ी महासभाओं के क्रम में शेरगढ़ में होने वाली यह सबसे बड़ी पंचायत थी। इसमें 1915 से लेकर अब तक के सब मुद्दों पर पुनः आत्म-मंथन किया गया और बेठ- बेगारी और हीन समझे जाने वाले धंधों को समाज के किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं किये जाने का संकल्प दोहराया गया और समामेलन और लाग-बाग को पुनः दोहराया गया। बीते वर्षों में जो अनसुलझे मामले थे उनका भी निपटारा किया गया।
15 दिसंबर 1958 का ऐतिहासिक दिन : शेरगढ में हुई पंचायत.
समाज सुधार सभा के विधिवत गठन (1920 को मानते हुए, न कि 1915 )के बाद एक तरह से देखा जाय तो यह तीसरी बड़ी पंचायत थी। इसका विधिवत प्रारंभ संवत् 2015 के फागण वद अमावस को दिनांक 15 दिसम्बर 1958 को शेरगढ़ में हुआ। इस महा-पंचायत की अध्यक्षता चेराई के लाभूराम जी लीलड़ ने की। इसकी खास बात यह थी कि अब समाज सुधार का काम समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने की ओर ज्यादा केंद्रित किया जाने लगा और खान-पान व रहन-सहन के तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों और लाग-बाग को पुनर्विवेचित कर उसे समय और परिस्थिति के अनुरूप किया गया। इन सब पर अलग पोस्ट में लिखा गया है, इसलिए यहाँ नहीं दोहराह रहे है। (आगे की पोस्ट देखें)

इस में भाग लेने वालइ मुख्य पंच सर्वश्री प्रतापाराम लिखणिया (बेलवा), चेतराम लिखणिया (पांचला), पीपाराम धांधू (सेतरावा), जोराराम लवा (खियासरिया), भलाराम (केतु कला), चुनाराम पंवार ( देचू ), पुनाराम (कनोडिया), भूराराम (आलाई ), गुनाराम (लोहारंद), दमाराम लीलड़ ( हापां ), आदि कई मौजिज पञ्च थे।
हमारे अग्रणीय मेघ पुरुष उमेदाराम जी कटारिया के देहावसान के बाद सन् 1979 में पुनः तिंवरी में सभा हुई! यह संवत् 2036 के आसोज की शुक्ल पक्ष की आठम के दिन तारीख 17 सितंबर 1979 के दिन प्रारंभ हुई। इसकी अध्यक्षता पुनाराम जी कटारिया ने की और कुछ सत्रों की भूंगरा निवासी शिवलाल जी ने की।
इसमें उस समय के 160 गांवों के मौजिज पंचों ने भाग लिया। यह सभा भी 15 दिन तक चली और सब विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।
इसमें जो पञ्च कर्ता-धर्ता थे, उन में से निम्न प्रमुख थे.- सर्व श्री प्रतापाराम लिखणिया (बेलवा ), दमाराम (बालेसर ), लोंगराम (शेरगढ़ ), माँहिंगाराम व खीयाराम (मथानिया ), हिमताराम (लोहावट ), सांगाराम (सेतरावा ), बुधराम (आगोलाई ), दुर्गाराम ( चेराई ), गोरखाराम व नाराराम ( खेतासर ), रतनाराम ( नाथडाउ ), भगोनाराम (जेलू ), जसराम ( केरु ), कुनजी (इंद्रोका ) आदि थे।
If any one want to peep into more in the subject please go to read my books on 'Meghavansh: History and Culture', some volumes published and some of it are yet to be published.
I hereby stop this series to post on any whatsapp/FB group. As it is laborious and time consuming to type on mobile.
But you will find details of Gujarat, Punjab, jammu-kashmir and of Rajasthan ( Marwad, Merwada, Godwad and of Mewar) in my forthcoming books about this struggle
पिछली पोस्ट में सन् 1915 के बाद के उमेदाराम जी कटारिया के संघर्ष की कुछ घटनाओं और तिथियों का जिक्र किया गया था। अलग-अलग बिखरी पड़ी और अलग अलग धड़ों और कुनबों में बंटी कौम को उमेदाराम जी एक करने और संगठित करने में कैसे कामयाब हुए? उनका यह ऐतिहासिक प्रयास विचम्भित करने वाला है। कई बातें थी, जिसका मैंने मेघवंश इतिहास और संस्कृति में विश्लेषण किया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण जो बात थी वह थी- सबसे पहले इस कौम के आंकड़ों यानि data का संग्रह करना। उनका यह काम ऐतिहासिक और आधारभूत था, जिसके कारण ही वे इस समाज को संगठित कर पाये और मुक्ति संघर्ष को सफल बना पाये।
समाजिक सुधार और मुक्ति आंदोलन शुरू करने से पहले उन्होंने हर गांव और वाड़/बाड़ीयों में निवास करने वाले मेघों के घरों की स्थिति और संख्या को इकट्ठा किया, फिर पंचों के माध्यम से हर वाड़ी या गांव-ढाणी में मेघों की जन-संख्या को अपने स्तर पर इकट्ठा किया। यह संख्या प्राप्त करने के बाद फिर उन्होंने उन्हें वाड़/बाड़ियां और गांवों की सीमा रेखा में बांटा, जिसे खेड़ा कहा गया। किस बाड़ी या गांव में यानि कि खेड़े में कितने मेघों का समूह होगा , यह तय किया। कई गांव अकेले ही अपने आप में खेड़े के रूप में बनाये गए तो कई खेड़े ऐसे भी थे जिनमें एक से ज्यादा गांव या वाडियां थी। किस खेड़े में कितने मोहल्ले होंगे, धड़े होंगे या गांव होंगे यानि की भाग होंगे यह सब मेघों की बस्तियों और मेघों की वास्तविक संख्या प्राप्त करके उसके आधार पर बड़ी सिद्दत और दूरदृष्टि से तय किया गया था। किस-किस को पंचायत में कितना कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा, यह सब आपसी मन्त्रणा से तय किया। यह सब मेघों के प्राचीन गणतंत्र की की रूपरेखा के आधार पर ही निर्धारित किया गया था। यह ध्यान देने की बात है कि कम से कम 8 खेड़ों से कम की एक पट्टी नहीं हो सकती थी और 24 खेड़ों से ज्यादा होते ही दूसरी पट्टी बनानी जरुरी थी। सब तरह से कुल 12 खेड़ों की पट्टी एक आदर्श पट्टी मानी गयी।
हर एक पट्टी का एक मुखिया या प्रमुख़ बनाया गया, जिसे उन्होंने मथारा कहा। मथारा अपने आप में एक स्वतंत्र इकाई थी। मथारा उस गांव को बनाया गया, जिस गांव के मेघवालों में आकीन-आबरू और जुझारूपन था। उनके अंदर नैतिक और सामाजिक बल की पराकाष्टा थी, उनके बराबर का उन खेड़ों में दूसरा कोई नहीं होता था। वहां के लोग अनुभवी, आण-बाण के पक्के, न्यायप्रिय और बुद्धिमान होते थे। कौम के हर-एक काम को संकल्प के साथ परिणाम तक पहुचाने वाले थे। जहाँ कहीं भी कोई भीड़ या पीड़ पड़ जाती या विपत्ति आ जाती वे कौम के लिए दिन हो या रात वहाँ जाते थे और संबल और साधन से उस काम को निस्वार्थ भाव से पूरा करते थे। मथारे सामाजिक और नैतिक रूप से निष्कलंक होते थे। नैतिक और सामाजिक पक्ष पर किसी को भी उनके विरुद्ध अंगुली उठाने तक का मौका नहीं देते थे। उनके अधीन आने वाले खेड़ों के हर प्रकार के मुद्दे को हर तरह से व न्याय से तत्काल निपटान कर देने वाले थे। इन सब पर 14 पट्टी का नियंत्रण और ऐसी 14 पट्टियों के कम से कम 6 भुवनों से बनने वाली 84 का उन पर नियंत्रण होता था।
कोई भी मथारा जाने या अनजाने में अगर कौम को लजाने वाला काम कर दे, समाज विरोधी काम करदे या उनके अधीन आने वाले खेड़ों में ऐसा हो जाय और मथारा समय रहते उसका निवारण नहीं कर पाये तो मथारे की पदवी छीन ली जाने का प्रबंध किया गया था और दूसरे वाड़ या खेड़े को मथारा बनाया जा सकता था।
कहने का तात्पर्य यह है कि उन्होंने जो व्यवस्था बनायीं वह व्यवहारिक थी। उसकी सक्रियता हर स्तर पर थी। इसलिए वे इस आंदोलन को सफल बना पाये!
( For detail see books - 'Meghavansh: History and Culture' )
अग्रणीय मेघ पुरुष श्री उम्मेदाराम जी कटारिया और मेघवंशी समाज सुधार सभा-
मेघवालों का मुक्ति संघर्ष..

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