Megh Culture - मेघ संस्कृति

1-        Megh Culture -
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मेघ समाज में संकेतों का विशेष महत्व है. गोल
घेरा या वृत्त जब उकेरा जाता (उत्कीर्णन) है
तो उस वृत से वे समस्त ब्रह्मांड से अभिप्राय
लेते हैं. इसे आप अंतरिक्ष या space समझिये.
जब वृत्त में बीचों बीच एक बिंदी लगाकर उकेरते
हैं तो यह उनकी भाषा में यह उस ब्रह्माण्ड में
उसकी स्थिति है. जब वृत्त में क्षितिज
रेखा खींच कर उकेरते हैं तो उसका अर्थ वे बेदाग
माता से लेते हैं. जब वृत्त में क्षितिज
रेखा को उर्ध्वाकार रेखा से क्रॉस करते हैं
तो उसका अर्थ सांसारिकता का या पारगामी लेते
हैं. जब वृत्त नहीं हो और सिर्फ क्रॉस (+)
हो तो उसका अभिप्रायः है
सांसारिकता या भोगों की प्राप्ति. जीवन
या सृष्टि का चलन.
जब वृत्त नहीं हो और क्रॉस हो, साखये के रूप
में, तो उसका अर्थ है - स्वस्तित्व.
अपने आसपास के किसी बुजुर्ग से पूछ कर इस
गूढ़ रहस्य का पता लगाइए. अब आपको समझ
में आ जाना चाहिए कि नवजात के जन्म पर
मेघों में वृत्त और साख्या क्यों बनाया जाता है.
यह मेघों का आध्यात्मिक रहस्य है जिसका वे
प्राचीन काल से अनुगमन करते रहे हैं. यदि मुझे
समय और अवसर मिला तो मैं निश्चित रूप से
मेघों की संस्कृति के इस रहस्यात्मक
प्रतीकों पर अधिक लिखना चाहूँगा.
यह उनके अध्यात्म के रहस्य से भी जुड़े हैं
जिनको आप सिद्धों की अपभ्रंश भाषा में इधर-
उधर बिखरा हुआ पाएँगे.
चार वृत्तों द्वारा बनाए गए जीवन के चार
क्षेत्र. स्वास्तिक के वृत्त के समान. वृत्त
चंद्रमा का भी प्रतीक है और यदि इसके
चारों ओर अतिरिक्त वृत्त बना हो तो यह सूर्य
का प्रतीक बन जाता है. कभी-कभी इसके
चारों और किरणें बना कर इसे सूर्य का प्रतीक
बनाया जाता है.
ये उत्कीर्णन श्री आर. के. मेघवाल जी ने भेजे हैं.
जो परंपरागत रूप से उनके समाज में नवजात शिशु
के जन्म के समय उकेरे जाते हैं. वस्तुतः यह
प्राचीन काल से चली आ रही उनकी धार्मिक
और आध्यात्मिक रहस्यवादिता है. इसमें वैदिक
ब्राह्मणवाद या पाखंड न होकर स्वास्तित्व
का निदर्शन है. यह परंपरा अभी भी इस समाज में
जीवित है परन्तु मुझे जीवंत
नहीं लगती क्योंकि इसके अर्थ और सन्दर्भ
काल के गर्भ में वे खो चुके हैं और नए
ब्राहमणवाद में धँस चुके हैं.


2-    Megh Culture - मेघ संस्कृति

किसी भी शुभ काम के लिए मेघवालों में किसी भी प्रकार की हवन-पूजा या यज्ञ आदि नहीं किया जाता है। परसों मुझे ग्रामीण इलाके में एक शादी के कार्य-क्रम में शरीक होने का मौका मिला । यहाँ भी वे ही क्रिया कलाप हुए, जिसको मैंने विवाह के प्रसंग में उद्धृत किये थे। समेला के समय प्रयुक्त की जाने वाली थाली और उसमें रखी सामग्री विशेष रूप से विचारणीय है। कांसे की थाली में पानी से भरा लोटा मंगल कलश का प्रतिरूप है। पीली हल्दी में सूत के धागे को पीला करके लोटे के लपेटते है। यहाँ थाली में रखा है। कलश में खेजड़ी की कोपल वाली हरी टहनी रखी है। पीपल की अनुपलब्धता में कलश में खेजड़ी की हरी टहनी रखी जाती है। थाली में साख्या(स्वस्तिक) उकेरा गया है। उसके आस पास सूरज और चाँद साक्षी स्वरुप उकेरे गए है। थाली में आखी बाजरी और गुड़ रखा है। यह सब सामग्री और इस समय के क्रिया कलाप उनकी संस्कृति की विशिष्ठ पहचान और निरंतरता को दर्शाते है।



3 - Megh Culture - मेघ संस्कृति

किसी भी शुभ कार्य के लिए , यथा शादी-ब्याह, उजोवणा-उत्सव
आदि के अवसर पर मेघ परिवार अपने घर के
आँगन को लीप-पोत करके मुख्य आँगन के
बीचो-बीच चौक मांडते(बनाते) है। इसे वे
अपनी भाषा में "चौक-पूरणा" कहते है। जब तक
वह शुभ कार्य पूरा नहीं हो तब तक उस चौक
को उलिङ्गते (उसके ऊपर से नहीं चलते है)
नहीं है । इसे वे शुभ और पवित्र मानते है।
प्रस्तुत आकृति एक विवाह के अवसर की है।
बारात आने के अवसर पर वधु के घर पर
सधवा औरत यह चौक बना रही है। मेघों की इस
विरासत को शहरी या तथाकथित सभ्य समाज
आजकल इसे रंगोली या मन्दन मात्र कहता है
क्योंकि उनके लिए यह मात्र एक आकर्षक
डिजाइन है परन्तु मेघों के लिए उनके विश्वास
या आस्था का यह प्रतीक है। इसे वे "चौक पूरणा" कहते है। पूरणा का अभिप्राय पूर्ण या संपन्न करना ही बनता है। चौक का अर्थ पवित्र शुभंकर आकृति से ही है। जो प्रायः स्वस्तिक आकृति का पल्लवन या अभिवृद्धि है। चूँकि यह आकृति है, इसलिए साधारण लोग या इससे अनभिज्ञ लोग इसे मात्र "मांडना" कहते है।मांडना का हिंदी में अर्थ बनाना या आकृति बनाना ही होता है। परन्तु मेघों के लिए यह सिर्फ आकृति या "मांडना"नहीं है बल्कि उनकी आस्था और संस्कृति का प्रतिस्वरूप पवित्र शुभंकर है। इसके अलावा वे अन्य आकृतियाँ बनाते है, उन्हें साधारणतया "मांडना"कहते है।
शादी के अवसर पर इस पवित्र चौक को चौकोर आकृति से बनाना शुरू करते है। विवाह की चंवरी में आटे से स्वास्तिक के साथ बारह चौकोर खाने बनाकर करते है। मृत्युपरांत किये जाने वाले पवित्र क्रिया कर्म में चौक को वृत्त बना कर शुरू करते है। त्यौहार, उजोवन- उत्सव में विभिन्न रंगों के मनमोहक स्वरुप में बनाते है। मुख्य बात यह है कि यह उनकी आस्था की सांस्कृतिक परंपरा है। इसके पीछे उनका आध्यात्म और दर्शन गहरे रूप से जुड़ा है न कि आकर्षण।


इन प्रतीकों की प्राचीनता और गूढता की जानकारी की अनभिज्ञता से कुछ मेघों में हीनता घर कर गयी। अतः उससे उभरने के लिए वे देखा देखी में आस पास में प्रचलित दुसरे ब्राहमण वादी क्रिया कलापों अपनाने हेतु आतुर और उत्साहित होते है। ऐसा करने में उन्हें कुछ समय के लिए बड्पन आ जाता है। वे सोचते है कि वे भी ब्रहामनवादी धर्म में बराबर है परन्तु वास्तव में एसा नहीं है। उन्हें अपनी संस्कृति की रक्षा हेतु खूब मेहनत करनी पड़ेगी नहीं तो निम्न तर ही रहेंगे। 

                                                                                                                                                                                 साभार -ताराराम गौतम 

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