मेघवीर मिँजलदास उर्फ मिजल्या

आज एक ऐसे मेघवीर की बात करेँगे जिसका मनुवाद ने इतिहास मे भेदभाव किया मिँजलदास उर्फ मिजल्या दुर्गादास के
साथ रियासत काल में रियासत का एक बहादुर व स्वामी भक्त सिपाही। राजस्थान जातियों की खोज पुस्तक के लेखक रमेश
चन्द्र गुणार्थी ने उसकी वीरता पर गौरव पूर्ण टिपण्णी की है। सं 1736 में सावन सुदी तीज को दुर्गा दास ने जब देल्ही पर हमला किया , तब वह उनके साथ युद्ध मैदान में था। उसकी सूझ बुझ और रण नीति से दुर्गा दस अपने मनसूबे में सफल
हो सका था। इससे कई बातें सपष्ट है कि मेघवालों का रियासती कल में युद्ध क्षेत्र में भी महत्व पूर्ण भागीदारी होती थी।
किसी भी मेघवाल के द्वारा विश्वास घात और कायरता की कोई घटना इतिहास पटल पर नहीं है।
मिजलिया जिसे बिजल्दास भी कहा जाता है, मेघवाल जाती में पैदा हुआ वीर शिरोमणि है, जो योगदान इतिहास में रानी झाँसी के साथ झलकारी बाई का है वो ही योगदान मिजलिया का दुर्गा दास के साथ है।
लिखा ब्राह्मणी और जातिवादी लेखकों ने उसके बारे में मौन रहकर उसका बहिस्कार किया। क्योंकि इससेउनके जाती और धर्म को गौरव नहीं मिलाता था। इसलिए जातिवादी हिन्दू धर्म में मेघवालों को इस पर खोज कर उसके योगदान को आगे लाना चाहिए इससे जाति और देश का गौरव बढेगा। 

ताराराम गौतम - मिजलदास मेघवाल ...दुरगादास के मुख्य अँगरक्षक थे ..जिनके अदभ्य साहस व विरता से ..दुरगादास को ...वीर दूरगादास की ख्याति मिली ..मगर मनुवादी इतिहासकारो ने वीर मीजल मेघ को भूला दिया .

रामसा कङेला मेघवँशी-
साँचा वीर सिपाही
मेघ मिजलदास
विश्वासी अगरक्षक
दुरगदा रा खाश !!
दुरगदा रा खाश
दिल्ली मे गुँजिया !
सतरा सो छतीस मे
ले तलवार झुँजिया
कहे रिख रामसा
रहगी फूला वास
साँचा वीर सिपाही
मेघ मिजलदास" 

रामसा कङेला मेघवँशी-
वीर शिरोमणी मेघ मिजलिया(बिजलिय़ा)
दुर्गा दास का हम उम्र था। उस समय
साधारणतया सभी दाढ़ी मूँछें रखते थे।
इसलिए
वीर मिजलिया के दाढ़ी मूंछे रखी हुई
होना स्वाभाविक है और घोड़े पर
सवारी उसकी और रियासत की सेना का उस
समय आवश्यक अंग था, जिसका वह एक भाग / सैनिक है 

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