बुधवार, 3 मई 2017

Poona Pact and after - पूना पैक्ट और उसके बाद

Poona Pact and after - पूना पैक्ट और उसके बाद
बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने बिना राज्य और सरकार के समर्थन के आम भारतीय के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया- यह उनकी महानता है। अद्वितीय प्रतिभा के धनी भारत रत्न डॉ. आंबेडकर में नेतृत्व और संगठन की अद्भुत शक्ति थी। वे अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में वे लोगों को संगठित करने और भेद-भाव व संकीर्णता समाप्त करने का सतत अलख जगाते रहे। उन्होंने हर जाति और धर्म के लोगों को एक 'लोकतंत्रात्मक समाज' निर्माण के लिए प्रतिबद्ध रखने की कोशिश की। उन्होंने बिखरे हुए, हाशिये पर पड़े लोगों में क्रांति की मशाल लेकर आगे बढ़ने का साहस पैदा किया।
इतिहास-निर्माण में उनका अपूर्व योगदान रहा है। जो लोग इतिहास को भूल जाते हैं, इतिहास उनको भूल जाता है। अतः हमें इसका सतत अवगाहन करते रहना चाहिए। भारत के संवैधानिक विकास की इतिहास-गाथा से हमें पता चलता है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंम्भ से ही डॉ. आंबेडकर नए भारत का इतिहास बना रहे थे, जिसका मूलमंत्र समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा था। ब्रिटिश सरकार ने 1919 के कानून की समीक्षा एवं संशोधन हेतु 1928 में एक आयोग का गठन किया, जिसे साइमन कमीशन कहा गया। बाबा साहेब ने इस आयोग के सामने दलितों का पक्ष बड़ी मजबूती एवं बुद्धिमत्ता से रखा था। साइमन-कमीशन की रिपोर्ट मई 1930 में प्रकाशित हुई। तत्पश्चात ब्रिटिश सरकार ने गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट की सम-सामयिकता एवं अन्य मुद्दों हेतु 'गोलमेज-कांफ्रेंस' आयोजित की। पहला गोलमेज सम्मलेन 12 नवम्बर 1930 से 19 जनवारी 1931 तक चला। दूसरा कांफ्रेंस 7 सितम्बर 1931 को प्रारंभ हुआ। विभिन्न बैठकों के बाद ब्रिटिश सरकार ने 4 अगस्त 1932 को एक अवार्ड जारी किया, जिसे 'कम्युनल अवार्ड' (सांप्रदायिक पंचाट) कहा जाता है। जिसमें अस्पृश्यों (दलितों) के सीटों के आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी। जिसमें विशेष बात यह थी कि इसमें दलितों के लिए सीटों की संख्या निश्चित की गयी, जो केवल दलितों के मतों और दलित व्यक्तियों द्वारा ही भरी जाने का प्रावधान था। साथ ही, दलितों को दोहरे मत का अधिकार दिया गया था। पहला एक पृथक निर्वाचन क्षेत्र में प्रयोग करने के लिए और दूसरा साधारण निर्वाचन के लिए।
महात्मा गाँधी ने इसका कट्टर विरोध किया और 20 सितम्बर 1932 को यरवदा जेल में 'आमरण अनशन' प्रारंभ कर दिया। बाबा साहेब पर बहुत दबाव पड़ा और मानवता के नाते उसमें परिवर्तन हेतु राजी हो गए। आपसी वार्ताओं के बाद बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और म. गाँधी के बीच 24 सितम्बर 1932 को एक गैर-सरकारी समझौता हुआ, जिसे 'पूना-पैक्ट' के नाम से जाना जाता है। जिसकी शर्तों को 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट में शामिल किया गया। इस समझौते पर बाबा साहेब ने कहा था- "मैंने मानवता की आवाज को स्वीकार किया और जैसे गांधीजी संतुष्ट होते थे, वैसे सांप्रदायिक निर्णय में परिवर्तन करके उनके प्राण बचा दिए।" परन्तु बाबा साहेब इसकी पालना को लेकर निश्चिंत नहीं थे। अस्तु, "पूना-पैक्ट" के बाद बाबा साहेब जगह-जगह दलित वर्गों को जागृत करने के लिए एवं दलित वर्ग के लिए जो आरक्षण प्राप्त किया है, उसके संभावित खतरों के प्रति दलितों को सावधान करने हेतु निकल पड़े। सम्पूर्ण भारत में जगह-जगह पर उनकी सभाएं और सम्मान हुआ। बिखरा हुआ समाज संगठित होने लगा व सिंहनाद की गर्जना करने लगा। यह महान आंबेडकर की संगठन शक्ति, नेतृत्व-परिपक्वता, वाणी और लेखनी का ही कमाल था कि मुर्दों में जान आ गयी। लोग उन्हें 'हृदय सम्राट' कहते, जो प्रत्येक दलित के दिल पर राज करता था।
इसी कड़ी में 4 नवम्बर 1932 को गुजरात के 'बाळ पाखाड़ी' पर मेघवाल समाज की एक जंगी सभा हुई, जिस में बाबा साहेब को ''मान-पत्र'' भी भेंट किया गया था। उसकी रिपोर्टिंग (विवरण) उस समय प्रकाशित होने वाले "जनता" नामक पत्र के 12 नवम्बर 1932 के अंक में प्रकाशित हुई थी। महाराष्ट्र सरकार, मुंबई द्वारा प्रकाशित "डॉ बाबा साहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेस" के वॉल्यूम-18 के पार्ट-1 के पृष्ठ 381-382 पर उसका मूल पाठ मराठी भाषा में उपलब्ध है। उसका हिंदी अनुवाद आपकी जानकारी हेतु यहाँ पर दिया जा रहा है, जिसमें बाबा साहेब के भाषण का सार समाहित है-
"अपने आपस के भेद-भाव ख़त्म करना इष्ट (लक्ष्य) हो"
"शुक्रवार, 4 नवम्बर 1932 को रात्रि 9 बजे 'गुजराती-मेघवाल' व अन्य सभी सभी अस्पृश्यों की एक विशाल सभा 'बाल पाखड़ी' जगह पर हुई। वहां पर मंच और मंडप के चारों ओर - 'गाँधी-आंबेडकर समझौता अजर-अमर रहे', 'डॉ आंबेडकर ही हम सभी दलितों के सच्चे नेता है', 'अस्पृश्यों का उद्धार करने हेतु डॉ. आंबेडकर को परमेश्वर लंबी उम्र दे'- इस प्रकार के नारे लगे थे। इस सभा-मंडप में बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ठीक नौ बजे डॉ. सोलंकी, शिवतारकर, गोविन्द चव्हाण, सूबेदार सवादकर, फणसे, चित्रे बन्धु और अन्य नेताओं के साथ सभा-स्थल पर पधारे। उनके आगमन पर चारों ओर 'डॉ. आंबेडकर जिंदाबाद की समवेत ध्वनि गूंज उठी। निरंतर पांच मिनट तक एक-स्वर में डॉ. आंबेडकर की जय जय कार के पश्चात श्रीमान भाणजी राठोड़ ने डॉ. सोलंकी साहब को सभा को अध्यक्षता करने का निवेदन किया, जिसका श्री शिवराम च्वाहन ने अनुमोदन किया। डॉ. सोलंकी साहब के अध्यक्षीय पद ग्रहण करते ही सभी ने उनका करतल-ध्वनि से स्वागत किया। तत्पश्चात 'डिप्रेस्ड क्लास वेलफेयर कमेटी' के प्रमुख श्री लक्षमण डी. सोलंकी ने बाबा साहेब को दिये जाने वाले 'सम्मान-पत्र' को पढ़कर सुनाया और बाबा साहेब को सादर भेंट करने हेतु अध्यक्ष को हस्तांतरित किया, जिसे ससम्मान बाबा साहेब को भेंट किया गया।"
"मान-पत्र का उत्तर देते हुए बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने कहा-
"भाईयों और बहिनों! आपने मुझे जो 'मान-पत्र' दिया है, उसका महत्व अन्य जगहों से मिले मान-पत्रों से ज्यादा है- ऐसा मैं समझता हूँ। इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूँ। आप इस इलाके में (आपण या चाळी मध्ये) रहने वाले लोग म्युनिसिप्लटी के अधीन काम करते हो। यहाँ कई खादी-भक्त कांग्रेसी हैं। यहाँ पर खादीभक्त कांग्रेस-अभिमानी लोगों ने कई बार आपको उपदेश दिए हैं कि -'कांग्रेस ही तुम्हारा उद्धार करेगी- उसकी मदद करो'- ऐसा उपदेश देने वाले खादी-भक्त नगर-निगम में कार्यरत हैं। परन्तु, इन जगहों पर उन्होंने आपके लिए क्या किया- इस पर आप विचार-मनन करो।------गरीबों के हित के जब भी प्रस्ताव (ठहराव) आये हैं, अपने प्राण-पन तक गरीबों के हितों की रक्षा करने का जाप करने वाले इन खादी-भक्त कांग्रेसवादी श्रीमानों ने मुंह मोड़ लिया। आपके रहने की बसावट की स्थिति सुधारने और आपको मिल रही अपर्याप्त पगार को बढ़ाने के लिए इन्होंने कभी कोई आन्दोलन, जिरह भी नहीं की। ------अगर तुम चार दिन भी काम बंद कर लो, तो सारा शहर रोग ग्रस्त हो जायेगा। परन्तु, आप जो परोपकारी कार्य कर रहे हो, उससे आपको क्या मिला? ये हिन्दू लोग आपको गुलामी में ही रखना चाहते हैं। जब आपको 'स्वतंत्र मतदाता संघ' का अधिकार मिला तो मेरे मित्र म.गाँधी ने अनशन शुरू कर दिया। इसी का परिणाम है कि ये गाँधी के वास्ते मंदिर खोलने लग गए। परन्तु यह हल-चल समुन्द्र में पानी की बूंद की तरह है-----जो कब ख़त्म होगी-- इसमें विश्वास मत करो।"
"हमें समानता के आधार पर सामाजिक दर्जा मिलाना चाहिए। अपनी आर्थिक गुलामी को ख़त्म करने के लिए हमें अपने पैरों पर खड़ा होकर संगठन का निर्माण करना पड़ेगा। अपना ईमान (शील) बेच कर पेट भरने वाले ये लोग आपको पग-पग पर बहकायेंगे- इन से सावधान रहो। आपको अपने मन में जो ठीक लगे- वही करो।-----अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ कि जैसे हम हिन्दुओं को जाति-भेद ख़त्म करने को कहते हैं, वैसे ही हमें आपस के भेद-भाव भी मिटाने चाहिए।----आपने मुझे 'मान-पत्र' देकर मेरा गौरव बढाया, उसके लिए मैं पुनः आप सबका आभार व्यक्त करता हूँ।"
(संदर्भ: जनता, 12 नवम्बर 1932, बाबा साहेब आंबेडकर: लेखन आणि भाषणे, खंड-18, भाग-1, डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर यांची भाषणे, भाग-1, 1920 ते 1936, पृष्ठ- 381-382.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें