बुधवार, 3 मई 2017

Poona Pact and after - पूना पैक्ट और उसके बाद

Poona Pact and after - पूना पैक्ट और उसके बाद
बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने बिना राज्य और सरकार के समर्थन के आम भारतीय के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया- यह उनकी महानता है। अद्वितीय प्रतिभा के धनी भारत रत्न डॉ. आंबेडकर में नेतृत्व और संगठन की अद्भुत शक्ति थी। वे अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में वे लोगों को संगठित करने और भेद-भाव व संकीर्णता समाप्त करने का सतत अलख जगाते रहे। उन्होंने हर जाति और धर्म के लोगों को एक 'लोकतंत्रात्मक समाज' निर्माण के लिए प्रतिबद्ध रखने की कोशिश की। उन्होंने बिखरे हुए, हाशिये पर पड़े लोगों में क्रांति की मशाल लेकर आगे बढ़ने का साहस पैदा किया।
इतिहास-निर्माण में उनका अपूर्व योगदान रहा है। जो लोग इतिहास को भूल जाते हैं, इतिहास उनको भूल जाता है। अतः हमें इसका सतत अवगाहन करते रहना चाहिए। भारत के संवैधानिक विकास की इतिहास-गाथा से हमें पता चलता है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंम्भ से ही डॉ. आंबेडकर नए भारत का इतिहास बना रहे थे, जिसका मूलमंत्र समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा था। ब्रिटिश सरकार ने 1919 के कानून की समीक्षा एवं संशोधन हेतु 1928 में एक आयोग का गठन किया, जिसे साइमन कमीशन कहा गया। बाबा साहेब ने इस आयोग के सामने दलितों का पक्ष बड़ी मजबूती एवं बुद्धिमत्ता से रखा था। साइमन-कमीशन की रिपोर्ट मई 1930 में प्रकाशित हुई। तत्पश्चात ब्रिटिश सरकार ने गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट की सम-सामयिकता एवं अन्य मुद्दों हेतु 'गोलमेज-कांफ्रेंस' आयोजित की। पहला गोलमेज सम्मलेन 12 नवम्बर 1930 से 19 जनवारी 1931 तक चला। दूसरा कांफ्रेंस 7 सितम्बर 1931 को प्रारंभ हुआ। विभिन्न बैठकों के बाद ब्रिटिश सरकार ने 4 अगस्त 1932 को एक अवार्ड जारी किया, जिसे 'कम्युनल अवार्ड' (सांप्रदायिक पंचाट) कहा जाता है। जिसमें अस्पृश्यों (दलितों) के सीटों के आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी। जिसमें विशेष बात यह थी कि इसमें दलितों के लिए सीटों की संख्या निश्चित की गयी, जो केवल दलितों के मतों और दलित व्यक्तियों द्वारा ही भरी जाने का प्रावधान था। साथ ही, दलितों को दोहरे मत का अधिकार दिया गया था। पहला एक पृथक निर्वाचन क्षेत्र में प्रयोग करने के लिए और दूसरा साधारण निर्वाचन के लिए।
महात्मा गाँधी ने इसका कट्टर विरोध किया और 20 सितम्बर 1932 को यरवदा जेल में 'आमरण अनशन' प्रारंभ कर दिया। बाबा साहेब पर बहुत दबाव पड़ा और मानवता के नाते उसमें परिवर्तन हेतु राजी हो गए। आपसी वार्ताओं के बाद बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और म. गाँधी के बीच 24 सितम्बर 1932 को एक गैर-सरकारी समझौता हुआ, जिसे 'पूना-पैक्ट' के नाम से जाना जाता है। जिसकी शर्तों को 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट में शामिल किया गया। इस समझौते पर बाबा साहेब ने कहा था- "मैंने मानवता की आवाज को स्वीकार किया और जैसे गांधीजी संतुष्ट होते थे, वैसे सांप्रदायिक निर्णय में परिवर्तन करके उनके प्राण बचा दिए।" परन्तु बाबा साहेब इसकी पालना को लेकर निश्चिंत नहीं थे। अस्तु, "पूना-पैक्ट" के बाद बाबा साहेब जगह-जगह दलित वर्गों को जागृत करने के लिए एवं दलित वर्ग के लिए जो आरक्षण प्राप्त किया है, उसके संभावित खतरों के प्रति दलितों को सावधान करने हेतु निकल पड़े। सम्पूर्ण भारत में जगह-जगह पर उनकी सभाएं और सम्मान हुआ। बिखरा हुआ समाज संगठित होने लगा व सिंहनाद की गर्जना करने लगा। यह महान आंबेडकर की संगठन शक्ति, नेतृत्व-परिपक्वता, वाणी और लेखनी का ही कमाल था कि मुर्दों में जान आ गयी। लोग उन्हें 'हृदय सम्राट' कहते, जो प्रत्येक दलित के दिल पर राज करता था।
इसी कड़ी में 4 नवम्बर 1932 को गुजरात के 'बाळ पाखाड़ी' पर मेघवाल समाज की एक जंगी सभा हुई, जिस में बाबा साहेब को ''मान-पत्र'' भी भेंट किया गया था। उसकी रिपोर्टिंग (विवरण) उस समय प्रकाशित होने वाले "जनता" नामक पत्र के 12 नवम्बर 1932 के अंक में प्रकाशित हुई थी। महाराष्ट्र सरकार, मुंबई द्वारा प्रकाशित "डॉ बाबा साहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेस" के वॉल्यूम-18 के पार्ट-1 के पृष्ठ 381-382 पर उसका मूल पाठ मराठी भाषा में उपलब्ध है। उसका हिंदी अनुवाद आपकी जानकारी हेतु यहाँ पर दिया जा रहा है, जिसमें बाबा साहेब के भाषण का सार समाहित है-
"अपने आपस के भेद-भाव ख़त्म करना इष्ट (लक्ष्य) हो"
"शुक्रवार, 4 नवम्बर 1932 को रात्रि 9 बजे 'गुजराती-मेघवाल' व अन्य सभी सभी अस्पृश्यों की एक विशाल सभा 'बाल पाखड़ी' जगह पर हुई। वहां पर मंच और मंडप के चारों ओर - 'गाँधी-आंबेडकर समझौता अजर-अमर रहे', 'डॉ आंबेडकर ही हम सभी दलितों के सच्चे नेता है', 'अस्पृश्यों का उद्धार करने हेतु डॉ. आंबेडकर को परमेश्वर लंबी उम्र दे'- इस प्रकार के नारे लगे थे। इस सभा-मंडप में बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ठीक नौ बजे डॉ. सोलंकी, शिवतारकर, गोविन्द चव्हाण, सूबेदार सवादकर, फणसे, चित्रे बन्धु और अन्य नेताओं के साथ सभा-स्थल पर पधारे। उनके आगमन पर चारों ओर 'डॉ. आंबेडकर जिंदाबाद की समवेत ध्वनि गूंज उठी। निरंतर पांच मिनट तक एक-स्वर में डॉ. आंबेडकर की जय जय कार के पश्चात श्रीमान भाणजी राठोड़ ने डॉ. सोलंकी साहब को सभा को अध्यक्षता करने का निवेदन किया, जिसका श्री शिवराम च्वाहन ने अनुमोदन किया। डॉ. सोलंकी साहब के अध्यक्षीय पद ग्रहण करते ही सभी ने उनका करतल-ध्वनि से स्वागत किया। तत्पश्चात 'डिप्रेस्ड क्लास वेलफेयर कमेटी' के प्रमुख श्री लक्षमण डी. सोलंकी ने बाबा साहेब को दिये जाने वाले 'सम्मान-पत्र' को पढ़कर सुनाया और बाबा साहेब को सादर भेंट करने हेतु अध्यक्ष को हस्तांतरित किया, जिसे ससम्मान बाबा साहेब को भेंट किया गया।"
"मान-पत्र का उत्तर देते हुए बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने कहा-
"भाईयों और बहिनों! आपने मुझे जो 'मान-पत्र' दिया है, उसका महत्व अन्य जगहों से मिले मान-पत्रों से ज्यादा है- ऐसा मैं समझता हूँ। इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूँ। आप इस इलाके में (आपण या चाळी मध्ये) रहने वाले लोग म्युनिसिप्लटी के अधीन काम करते हो। यहाँ कई खादी-भक्त कांग्रेसी हैं। यहाँ पर खादीभक्त कांग्रेस-अभिमानी लोगों ने कई बार आपको उपदेश दिए हैं कि -'कांग्रेस ही तुम्हारा उद्धार करेगी- उसकी मदद करो'- ऐसा उपदेश देने वाले खादी-भक्त नगर-निगम में कार्यरत हैं। परन्तु, इन जगहों पर उन्होंने आपके लिए क्या किया- इस पर आप विचार-मनन करो।------गरीबों के हित के जब भी प्रस्ताव (ठहराव) आये हैं, अपने प्राण-पन तक गरीबों के हितों की रक्षा करने का जाप करने वाले इन खादी-भक्त कांग्रेसवादी श्रीमानों ने मुंह मोड़ लिया। आपके रहने की बसावट की स्थिति सुधारने और आपको मिल रही अपर्याप्त पगार को बढ़ाने के लिए इन्होंने कभी कोई आन्दोलन, जिरह भी नहीं की। ------अगर तुम चार दिन भी काम बंद कर लो, तो सारा शहर रोग ग्रस्त हो जायेगा। परन्तु, आप जो परोपकारी कार्य कर रहे हो, उससे आपको क्या मिला? ये हिन्दू लोग आपको गुलामी में ही रखना चाहते हैं। जब आपको 'स्वतंत्र मतदाता संघ' का अधिकार मिला तो मेरे मित्र म.गाँधी ने अनशन शुरू कर दिया। इसी का परिणाम है कि ये गाँधी के वास्ते मंदिर खोलने लग गए। परन्तु यह हल-चल समुन्द्र में पानी की बूंद की तरह है-----जो कब ख़त्म होगी-- इसमें विश्वास मत करो।"
"हमें समानता के आधार पर सामाजिक दर्जा मिलाना चाहिए। अपनी आर्थिक गुलामी को ख़त्म करने के लिए हमें अपने पैरों पर खड़ा होकर संगठन का निर्माण करना पड़ेगा। अपना ईमान (शील) बेच कर पेट भरने वाले ये लोग आपको पग-पग पर बहकायेंगे- इन से सावधान रहो। आपको अपने मन में जो ठीक लगे- वही करो।-----अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ कि जैसे हम हिन्दुओं को जाति-भेद ख़त्म करने को कहते हैं, वैसे ही हमें आपस के भेद-भाव भी मिटाने चाहिए।----आपने मुझे 'मान-पत्र' देकर मेरा गौरव बढाया, उसके लिए मैं पुनः आप सबका आभार व्यक्त करता हूँ।"
(संदर्भ: जनता, 12 नवम्बर 1932, बाबा साहेब आंबेडकर: लेखन आणि भाषणे, खंड-18, भाग-1, डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर यांची भाषणे, भाग-1, 1920 ते 1936, पृष्ठ- 381-382.)

सर छोटूराम के बारे मे एक हरिजन विद्वान के उद्गार

सर छोटूराम के बारे मे एक हरिजन विद्वान के उद्गार
सर छोटूराम के बारे मे एक हरिजन विद्वान के उद्गार( श्री सोहनलाल शास्त्री , विधावाचस्पति , बी.ए., रिसर्च आफिसर ,राजभाषा (विधायी) आयोग , विधि मंत्रालय भारत सरकार )
स्वर्गीय चौधरी छोटूराम जी मेरी दृष्टि मे कर्मवीर योद्धा के साथ साथ महापुरुष भी थे | महापुरुष के लक्षण हैं जिस मे दीन, दुःखी , दरिद्र और अन्याय पीड़ित जनसमुदाय के लिए पूर्ण सहानुभूति हो | वीर तो डाकू भी हो सकता हैं और कर्मवीर उसे कहा जाता हैं जिसका जीवन केवल कथनी पर निर्भर न हो , करनी पर आधारित हो | एक कर्मवीर योद्धा यदि अपने परिश्रम से कोई सिद्धि या निधि प्राप्त कर ले किन्तु उस फल का उपभोग स्वयं ही करे या केवल अपने बंधुओ तथा सगे सम्बन्धियो को उसके उपभोग का पात्र ठहराए तो वह महापुरुष नहीं कहला सकता | चौधरी साहब का ह्रदय गरीब लोगो के लिए सदैव आर्द्र रहा | मैं व्यक्तिगतरूप से उनके संपर्क मे आता रहा हूँ | पंजाब के हरिजनों के बारे मे मेरा उनसे विचार-विनिमय होता रहा हैं | पत्र-व्यवहार मे मैंने एक बार उन्हे लिखा था कि चौधरी साहब आप की दृष्टि मे तो बेचारा किसान ही समाया हुआ हैं , किन्तु आपने कभी बेचारे कम्मी (हरिजन तथा दूसरे मुसलमान कम्मी) केलिए हमदर्दी नहीं दिखाई , अतः परमात्मा आप के लिए एक विशेष नरक तैयार कर रहा हैं |चौधरी साहब ने मुझे उत्तर कि उनके दिल मे हरिजन के लिए किसानों से कम प्रेम और स्नेह नहीं हैं |साहूकारों के शैतानी पंजे से छुड़ाने के लिए जो विधान चौधरी साहब के प्रयत्नों से पंजाब सरकार ने बनाए , उन से केवल किसानों को ही लाभ नहीं पहुंचाया , वरन कममियों के लिए भी यह लाभदायक बनाए गए | किसी भी हरिजन या कम्मी के घर का सामान , अनाज , भैंस , गाय तथा बैल आदि साहूकार कुर्क नहीं कर सकता था | मसालहती बोर्ड मे फैसले के लिए किसान की भांति कम्मी भी न्याय प्राप्त करने के अधिकारी थे |उस युग मे जब यूनियनिस्ट सरकार बनी ,हरिजनो को सरकारी नौकरियों मे पहलेपहल तब ही लिया गया | मुझे अच्छी तरहस्मरण जब एक हरिजन युवक जिसने बी.ए.,एल.एल.बी.पास करने के पश्चात पी.सी.एस. की परीक्षा की तो उसने मैरिट लिस्ट मे सबसे नीचे स्थान प्राप्त किया | स्वर्गीय सर मनोहरलाल ने उन्हे पी.सी.एस. मे स्थान देना नहीं चाहा , क्योंकि वह योग्यता से दूसरे हिंदुओं के मुकाबिले में बहुत निम्न स्तर पर था |चौधरी साहब ने तब पूरा बल लगाकर उस हरिजन को पी.सी.एस. बना कर ही दम लिया| इस घटना पर पंजाब सरकार के हिन्दू सदस्यों और अन्य हिन्दू नेताओ मे घोर विरोध हुआ , किन्तु चौधरी साहब का निर्णय अटल था | आज वही हरिजन युवक पंजाब मे सैशन जज का काम कर रहाहैं और बीसियों हिन्दू सेशन जजो से उसका कार्य अच्छा माना जाता हैं | पंचायतों मे कई हरिजन नवयुवको को पंचायत अफसर बनाने का श्रेय चौधरी साहब को ही हैं | चौधरी साहब वचन के पक्के और स्पष्ट वक्ता थे | वह मनसा अन्यत , कर्मणा , अन्यत , वचसा अन्यत, की नीति मे विश्वास नहीं रखते थे | महापुरुषों के मुख्य लक्षणों मे यहसद्गुण आवश्यक हैं | चौधरी साहब को मैंने एक कड़वा पत्र लिखा जिस मे कहा कि आप हरिजनो को जमीन खरीदने का अधिकार क्यों नहीं देते , जबकि सब हरिजन सदस्य आपकी पार्टी का साथ दे रहे हैं |चौधरी साहब ने मुझे उत्तर दिया कि मैंने कभी हरिजनो सदस्यों को यह वचन नहीं दिया कि यदि वह मेरी राजनीतिक पार्टी मे शामिल हो जाए तो मैं उन्हे जमीन खरीदने का अधिकार दिलवा दूंगा | चौधरी साहब कहा करते थे कि पंजाब का Land Alienation Act बेचारे किसान कि ज़मीन को हिन्दू साहूकारों के फौलादी हाथसे बचाने के लिए ढाल हैं | यह एक्ट ऐसा लोहमय दुर्ग हैं जिसमे साहूकारके अत्याचार से जमींदार का बचाव हो सकता हैं | अगर मैं हरिजन के लिए इस एक्ट मे संशोधन करूंगा तो इस दुर्ग मे ऐसी दरार पड़ जाएगी , जिस मार्ग से साहूकार घुस जाएगा और बेचारे किसानया जमींदार कि एकमात्र आशा और आश्रय अर्थात भूमि का टुकड़ा छीन लेगा |चौधरी साहब कहते थे कि हरिजन के पास भूमि खरीदने कि आर्थिक शक्ति नहीं हैं | वह केवल हिन्दू नेताओ के बहकावे मे आ कर इस मांग पर बल देता हैं | चौधरी साहब का विश्वास था कि हिन्दू नेता हरिजन को भूमि ख़रीदारीकि मांग के लिए इसलिए उकसाते हैं ताकि विधान कि सुविधा से साहूकार स्वयं रुपया देकर भूमि खरीद ले और हरिजन के नाम पर बेनामी करा दे | क्योंकि हरिजन हिन्दू साहूकार का विश्वासपात्र रह सकता हैं | इस प्रकार हरिजन को भूमि खरीद कि कानूनी छूट का अभिप्राय साहूकार कोपरोक्ष रूप से किसान की भूमि हथियाना था | चौधरी साहब इन दाव पेंचो को खूब जानते थे , अतः उन्होनेहरिजनो की मांग को कभी स्वीकार नहीं किया | ऐसा होने पर ही आपको हरिजन हितैषी ही कहना पड़ता हैं क्योंकि मूलतान के क्षेत्र मे जब कुछ मुरब्बे ज़मीन बांटने की सरकार ने योजना बनाई तो चौधरी साहब ऐसे समय पर हरिजनो को नहीं भूले और बहुत मुरब्बे भूमि इन्हे देकर पंजाब के इतिहास मे पहली बार हरिजनों को जमींदार बना दिया | यह उनकी उदारता और महापुरुष का जीता-जागता उदाहरण हैं |ज़िला मूलतान मे आर्य नगर नामक गाँव की सारी भूमि सन 1923-1924 मे मेघ उद्धार सभा स्यालकोट ने सरकार से सस्ते दामों मे खरीद कर के मेघ जाति के हरिजनो को उसका मुजरा बना कर आबाद किया | कई बरसों का सरकारी लगान और मुरब्बों की किशते अदा न करने के कारण सरकार ने उस गाँव की सारी ज़मीन जब्त कर ली थी और फैसला करदिया था कि इस भूमि कि कीमत वसूल कि जाये | सरकार ने मेघ उद्धार सभा (जिसके कर्ता-धर्ता हिन्दू साहूकारव वकील थे ) के पदाधिकारियों को नोटिस थमा दिये कि वह बकाया रकम अदा करे | किन्तु केघ उद्धार सभा ने ऐसा नहीं किया | यूनियनिस्ट सरकार के समय मे चौधरी साहब ने हरिजन काश्तकारों का ज़मीन बांटने का फैसला कर दिया और मेघ उद्धार सभा का दखल समाप्त करके यह इस सारे गाँव के मुरब्बे मेघ जाति के हरिजनो मे बाँट दिये | जो मेघ काश्तकार जिस-जिस मुरब्बे को काश्त करते चले जा रहे थे वही उसके मालिक बना दिये गए और लगान का बकाया आदि उनसे सस्ती किश्तों मे वसूल किया |आपने अपने एक प्राइवेट पार्लियामेंट सेक्रेटरी को आदेश दिया कि जिस-जिस मुरब्बे पर मेघ (हरिजन) काश्तकार चला आ रहा हैं , वह मुरब्बा उस के नाम पर अंकित कर दिया जाये | इससे बढ़कर स्वर्गीय चौधरी छोटूराम कि हरिजनो के प्रति सहानुभूति और क्या हो सकती थी | जाट के उद्धार के लिए तो वह अवतार बन कारआए तथापि वह हरिजनो के हित और कल्याण को कभी नहीं भूले | चौधरी साहब एक आदर्श माता का जो अपनी संतान के लिए अपना बलिदान कर देती हैं साक्षात उदाहरण या प्रतीक थे किन्तु जैसे सहृदय माता अड़ोस पड़ोस के बालकों मे मधुर और स्नेहमय व्यवहार करती हैं , इसी भांति चौधरी साहब कि वास्तविक संतान को पंजाब का जाट था , मगर उस जाट संतान के खेतोमे काम करने वाले , उनके लिए जूता जोड़ा बनाने वाले , लोहार-बढ़ई का काम करने वाले कम्मी को भी उन्होने सदैव सहानुभूति से देखा और उनकी भलाई के लिए कानूनों से जो कुछ किया जा सकता था , किया |अछूतो के लिए जितना दर्द और सहानुभूति बाबा साहिब डॉक्टर अंबेडकर के हृदय मे था और जो कुछ आप ने निरीह लोगो के लिए किया और सोचा , उतना ही बल्कि उससे भी कहीं अधिक काम चौधरी छोटूराम ने पंजाब के जाटों के लिए किया |कहावत हैं , कि खून पानी से गाढ़ा होता हैं , अर्थात अपना परिवार , अपनी बीरदारी या जाति से दूसरों की अपेक्षा ज्यादा सहानुभूति होती , ममता और लगाव होता हैं | इसी प्रकार जाट जाति के साथ चौधरी साहब की ममता और स्नेह का होना स्वाभाविक और प्रकृतिक ही था , तो भी सच्चे महापुरुष दूसरे दीनहीन , दुःखी लोगो को अपना स्नेह पात्र मानते हैं |बाबा साहिब डॉक्टर अंबेडकर और चौधरी छोटूराम दोनों महापुरुष थे | दोनों अपने व्यक्तिगत संघर्ष और परिश्रम से ऊपर उठे , विद्वान बने , अंतिम श्वास तक दबे , पिसे निरीह लोगो की वकालत की | बहादूरों की भांति पिछड़े वर्गो की उन्नति के लिए अंतिम सांस तक जूझते रहे | दोनों ही सैनिक जाति के सपूत थे | (जाट और महार दोनों ही सैनिक जाति माने गई हैं ) दोनों ही भारत की मिट्टी से उभरे और आकाश के देदीप्यमान सूर्य की भांति भारत केगगन मे जा चमके | दोनों महापुरुषों ने केवल अपनी लौकिक उन्नति पर ही संतोष नहीं किया बल्कि अपनी जाति के उद्धार के लिए अपनी सारी शक्तियों का प्रयोग किया |मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ कि मुझे दोनों कर्मवीर योद्धाओ का व्यक्तिगत संपर्क प्राप्त करने का अवसर मिला | दोनों से विविध विषयों पर पत्र व्यवहार होता रहा तथा साक्षात्कार करने के अवसर प्राप्त हुए | मैंने इन दोनों महापुरुषों कोबहुर करीब से देखा हैं | दोनों के हृदय स्वच्छ और उदार थे | दोनों के मस्तक विधा और राजनीति से भरपूर थे| दोनों अपनी अपनी धुन के इस प्रकार दृढ़ थे कि संसार का कोई भी प्रलोभन या भय उन्हे अपने उद्देश्य से इधर-उधर नहीं कर सकता था | एक बार शायद 1943 मे जब बाबा साहिब डॉक्टर अंबेडकर वायसराय कि एजीक्यूटिव कौंसिल के सदस्य थे , मुझे उनसे 22 पृथ्वीराज रोड़ पर मिलने का अवसर मिला | बातों-बातों मे चौधरी सर छोटूराम जी का भी प्रसंग छिड़ गया | डॉक्टर साहब ने मुझ से पूछा कि सर छोटूराम की सारे पंजाब और दिल्ली मे धाक हैं , क्या वह बहुत उच्च दर्जे का विद्वान हैं ? मैंने उत्तरदिया कि चौधरी साहब संभवतः आप के बराबर विद्वान तो नहीं किन्तु आप कि भांति पंजाबी किसान को साहूकार के जालिम पंजे से छुटकारा दिलाने के लिए जी-जान से लड़ रहे हैं | साहूकारों के अत्याचारों से पीड़ित पंजाब के लिए वे अवतार हैं | डॉक्टर साहब ने कहा , उनकी प्रसिद्धि और ख्याति का और क्या कारण हैं ? मैंने उत्तर दिया कि चौधरी साहब का संपर्क जन-साधारण के साथ हैं | उनमे दो गुण ऐसे हैं जो आप मे नहीं है | डॉक्टर साहब बोले वह कौन से अनोखे गुण चौधरी साहब मे विधमान हैं जो मुझ मे नहीं ? मैंने उत्तर दिया कि भारत के किसी भी कोने से उन्हे पोस्ट कार्ड लिखा जाए , चाहे उस पोस्ट कार्ड मे उन्हे गालियां ही क्यों न दी जाएँ, उस पत्र का अपने हाथ से उत्तर देना , वह अपना परम कर्तव्य समझते हैं | दूसरा गुण यह हैं कि उनकी कोठी पर सदा भंडारा लगा रहता हैं | कोई भी व्यक्ति किसी समय जा कर वाहा खाना खा सकता हैं | ये हैं दो अनुपम गुण जिनहोने चौधरी साहब को प्रसिद्ध किया और भी चार चाँद लगा दिये | किन्तु बाबा साहिब डॉक्टर अंबेडकर मे इन दोनों गुणो का अभाव था | वह झट बोल उठे कि मैं कार्य मे इतना व्यस्त रहता हूँ कि मुझे किसी व्यक्ति के पत्र का उत्तर देने का समय ही नहीं लगता और मैं विधुर हूँ | इसलिए कोठी पर आए अभ्यागत को चाय-पानी कि नहीं पूछ सकता | मैं उत्तर दिया जहां तक कार्य व्यस्तता का संबंध हैं , चौधरी साहब आप से कम कार्य व्यस्त नहीं हैं किन्तु जहां तक दूसरी बात का प्रसंग हैं , चौधरी साहब कि धर्मपत्नी तो उनके साथ न रह कर अपने गाँव मे ही रहती हैं | कहने का अभिप्राय यह हैं कि चौधरी सर छोटूराम कर्मवीर योद्धा के साथ-साथमहानपुरुष भी थे |चौधरी साहब ने जहां पंजाब के पीड़ित किसानों के परोपकार के लिए न्याय-युद्ध लड़ा और उसे जीता , उसी प्रकार वे पंजाब के हरिजनो के भी सच्चे हितचिंतक थे | पंजाबी हरिजनो को यूनियनिस्ट सरकार के अधीन भरसक नौकरिया दिलवाई , उन्हे मूलतान के क्षेत्र मे मुरब्बे बांटे | आर्य नगर के मेघ हरिजनो को सारा का सारा गाँव सरकार से दिलवाया |वास्तव मे देखा जाय तो चौधरी छोटूराम साहूकारों का भी अहित नहींचाहते थे | वे सदा कहा करते थे कि मुझे बनिए, महाजनो से वैर नहीं , वे मेरे भाई हैं | मुझे उनकी उस जालिमाना लूट-खसोट से वैर हैं , जो सुर दर सूद कि शक्ल मे की जा रही हैं और जिसने बेचारे किसान का खून चूस लिया हैं | चौधरी साहब ने अपनी सरकार मे जब दुकाने खोलने और बंद करने के घंटे समय नियत किए तो बनिए दुकानदार चिल्ला उठे | चौधरी साहब को गालियां देने लगे की यह जाट हमे अब दुकानों के जरिये भी रोटी कमाने नहीं देना चाहता | चौधरी साहब अपने व्याख्यानों मे प्रायः इस आरोप का युक्तियुक्त उत्तर देते थे और कहा करते थे कि मैंने दुकानों के खोलने और बंद करने का समय नियत करके बनिया भाइयों का स्वास्थ सुधारा दिया हैं| अब दुकानों से जल्दी उठकर सैर किया करेंगे और स्वस्थ-जीवन और लंबी आयु भोगेंगे |आज कि कांग्रेस सरकार जो चौधरी साहब कि सरकार से अधिक लोकप्रिय मानी जाती हैं , वह भी सारे भारत मे उनके कानूनों कि नकल कर रही हैं , और दुकानों को खुलने तथा बंद होने के लिए समय नियत कर रही हैं | चौधरी साहब ने जो जो सुचारु नीति अपनाई , उसका मूल्यांकन आज हो रहा हैं और पंजाब का साहूकार बनिया भी अब उन्हे अत्यंत श्र्दा-भरे दिल से श्रद्धांजलि भेंट करता हैं |चौधरी सर छोटूराम पंजाब की वीर भूमि के इस्पात थे | जाट जाति के सच्चे सपूत और हरिजन , किसानों , कम्मियों के सच्चे हितचिंतक थे | इसप्रकार की विभूतिया सैकड़ों बरसों के पश्चात उत्पन्न होती हैं और युग-युगांतरों तक वे इतिहास की शोभा बनती हैं उनके पथ-प्रदर्शन पर चल कर और उनसे शिक्षा लेना अनेक कार्यकर्ता अपने कार्य मे सफल हो सकते हैं | मैं न तो हरियाणा मे पैदाहुआ , न ही जाट जाति से मेरा संबंध हैं और न ही मैंने चौधरी साहब से कोईआर्थिक लाभ प्राप्त किया | इतना होने पर भी उस महान विभूति महापुरुष के लिए मेरा हृदय तथा श्र्धा से भरपूर हैं और मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझता हूँ कि मेरा इस युगपुरुष से परोक्ष और साक्षात संबंध रहा हैं |(पुस्तक- किसानबंधु , चौधरी सर छोटूराम - लेखक -आर.एस.तोमर)