रविवार, 12 जून 2016

अछूतपन' गुलामी से भी बदत्तर है। यह गुलामी से भी बुरी स्थिति है - ताराराम गौतम

[रात १०:११ बजे, ११/६/२०१६] Tararam Goutam: [6/8, 8:24 PM] Tararam: आप सब धन्य है कि जिस दीन-हीन समाज में आप पैदा हुए उसे प्रगति के पथ पर लाने का और प्रगति का फायदा पंहुचाने का आपने बीड़ा उठाया है। जो समाज सदियों से दबा कुचला था, शिक्षा से वंचित था, नागरिक अधिकारों से वंचित था। उस में आप शिक्षा की ज्योति जला रहे हो, एक गरिमामय जीवन जीने की कला सिखा रहे हो- यह अपने आप में ऐतिहासिक है। विगत शताब्दियों में हमारे पुरखों या बड़ेरों का जीवन नर्क के जीवन से कम नहीं था, जिसे हमारे पुरखों ने भोगा। वह जीवन कहने को जीवन था अन्यथा गुलामों के समतुल्य हमारा जीवन था। इस से उभार कर एक नया जीवन देने वाले हमारे परम पूज्य प्रातः स्मरणीय बाबा साहेब पर हम बार बार न्यौच्छावर होते है। उन्होंने जो कारगर उपाय बताये है वे ही हमारी समस्या का माकूल और वास्तविक समाधान है। हमें उन पर मनन करना चाहिए। उनके बताये मार्ग का अनुशरण करना चाहिए। इस संस्थान के पिछले आयोजन से लेकर इस आयोजन तक मेघ समाज में काफी कुछ चलवल और हलचल हुई है- हर क्षेत्र में यह  समाज उठ खड़ा हुआ है और अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा की प्राप्ति हेतु प्रतिबद्ध दिखता है। परन्तु सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में जो कुछ घटित हुआ या हो रहा है वह कोई उत्साह वर्धक नहीं है बल्कि डरावना और निराशाजनक है। नागौर के डंगावास, पाली के घेनडी और गडरारोड के डेल्टा प्रकरण ने हम सबको हिलाकर रख दिया और सोचने को मजबूर कर दिया कि बहुसंख्यक हिन्दू हमारे साथ दोयम दर्जे का बर्ताव क्यों करते है? साधारण नागरिक अधिकारों के बरतने पर भी यदा-कदा हमारे लोग प्रताड़ित और पीड़ित क्यों किये जाते है? पिछले वर्ष आपने ऐसे मुद्दो पर काबिले तारीफ एकता दिखाई और राज्य और राष्ट्र स्तर पर अपना रोष दर्ज कराया। आप सब धन्य है कि आप अपनी बेड़ियों को तोड़ने के लिए स्वतः प्रेरित होकर सामाजिक मुक्ति के संघर्ष में प्राण-पन हुए। हम यह सोचने के लिए मजबूर हुए कि आखिर हमारा जीवन क्या है और हमारा सामाजिक वजूद क्या है? आजादी से पहले हमारा जीवन अंधकारपूर्ण था, जिसे बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने उर्जावान और प्रकाशवान बनाने का हर संभव भीम-प्रयत्न किया। उसका सुफल हमें मिला पर जब जब ऐसी घटनाएँ होती है, हमें पुनः झकझोर देती है। ऐसे आयोजनों पर हमें इन पर विचार करना चाहिए और कोई रास्ता खोजना चाहिए।
           जैसा मैंने बताया कि हमारे समाज की जिंदगी गुलामों के समतुल्य थी फिर भी धन्य है कि उन्हें 'गुलाम' के नाम से नहीं पुकारा गया, अन्यथा दूसरी वस्तुओं या चीजों की भांति इनका भी बाजार लगाया जाता और वस्तुओं की तरह बेचे और ख़रीदे जाते। दुनियां का इतिहास पढने से मालुम हुआ कि गुलामों की जिंदगी कितनी नारकीय होती थी। इस इलाके में 'गोेला' कहे जाने वाले लोग इसी तरह से राजे-रजवाड़ों के लिए क्रय और विक्रय की चीज थे। शुक्र है कि 'मेघ' लोग ऐसी गुलामी में नहीं फंसे। आज की हालातों और अन्य कारकों को देखा जाय तो यह कहा जा सकता है कि अगर मेघ लोग ऐसी गुलामी में फंसे होते तो उनकी मुक्ति भी अभी तक हो गयी होती जैसी कि हम विश्व इतिहास में गुलामों की मुक्ति देखते है और यहाँ के गोलों और दरोगों की मुक्ति देखते है। विश्व के कई कोनों में गुलामों की जिंदगी तकरीबन एकसी ही रही है। कई कारणों से लोगों को गुलाम बनाया जाता था और एक बार आदमी गुलाम बन गया तो निर्जीव वस्तुओं की तरह उसकी हालात बन जाती थी। वह सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता था। पीढ़ी दर पीढ़ी उसकी गुलामी चलती रहती थी, लेकिन हमारे लोग ऐसे गुलामों की तरह क्रय-विक्रय के रूप में नहीं थे। फिर भी उनका जीवन किसी गुलाम के जीवन से कम नहीं था। मैंने इसका कुछ संकेत 'मेघवंश : इतिहास और संस्कृति' के दूसरे भाग में किया है।
        अगर गुलामों के नारकीय जीवन और उनकी पीड़ा को देखा जाय तो मेघवालों पर लगी अछेप की छाप या अछूतपन का उनका जीवन ठीक था- ऐसा कोई कहता है तो काफी हद तक ठीक है। परन्तु दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो यह 'अछूतपन' गुलामी से भी बदत्तर है। यह गुलामी से भी बुरी स्थिति है। गुलाम लोग गुलामी से मुक्त होकर सभी नागरिक अधिकारों की प्राप्ति की स्थिति में आ गए है, पर अछूतपन के कलंक में दबे हुए लोग अभी भी संघर्ष कर रहे है। गुलामों की आजादी के कई उदाहरण है लेकिन मारवाड़ के इतिहास में या भारत के इतिहास में अछूत के छूत होने का सबूत ढूँढना बड़ा मुश्किल है। अभी भी घोड़े पर बन्दौली निकालने पर दंगा-फसाद होता है, मंदिरों के दरवाजे बंद कर दिए जाते है, हैंडपंप के ताले लगाये जाते है, खाने-पीने की अलग पंगत रखी जाती है...ऐसी अनगिनत निर्योग्यताएँ ज्यों की त्यों है। संविधान प्रदत्त नौकरियों में आने और प्रगति करने के अवसरों पर एक से बुरे एक अड़ंगे लगाये जाते है, जिसे सवर्ण आनंद से भॊगते है पर आपको उस से वंचित किया जाता है। हमारे द्वारा/ आपके द्वारा उज्र करने पर वे आपके पीछे हाथ धो कर पड़ जाते है। लाठी लेकर पीछे दौड़ते है। यह अछूत से छूत होने का तो कोई सबूत नहीं है। संक्षेप में बात यह है कि हमारी अछूतपन की पीड़ा ख़त्म नहीं हुई। देश गुलामी से आजाद हो गया। सरकार दर सरकार बदलती रही, सरकारों में कारिंदे आये और गए पर 'अछूतपन' का कलंक नहीं गया। हमारे लोग ऊँचे ओहदों पर आसीन हुए, मंत्री बने, मुख्य मंत्री बने, बाबु बने, कलेक्टर और सेक्रेटरी बने, धनवान बने, कारोबारी बने पर कौम से चिपका हुआ अछूतपन का कलंक नहीं गया। यह हमारे लिए चिंतन का विषय होना चाहिए।
            दुनियां में जहाँ भी गुलामी रही है, वह एक निश्चित काल तक रही है और उस से मुक्त होने के कई रास्ते रहे है, पर अछूतों की या मेघवालों की अछूतपन की स्थिति इनसे अलग है। वे अभी भी इस से छुटकारा पाने के लिए संघर्षरत है। क्योंकि अछूतपन कालातीत है और इससे मुक्त होने का कोई रास्ता नहीं है। आप 'सायर' को देख ले, धारु को देख ले, धनरूप को देख ले, कबीर को देख ले, डाली को देख ले, केरण को देख ले, रामदास को देख ले, इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। ये सभी मेघ समाज से ही थे, इन्होने सब ऊँचाइयों को छुआ पर उनका और उनके समाज का अछूतपन नहीं गया। राजिया बाम्भी, माया मेघ और मातंग धणी  भी मेघवाल समाज से ही थे और अभी के राजनैतिक दिग्गज हंसराम भगत हो या पन्ना लाल बारुपाल, जस राज जयपाल हो या सम्पत राम, बरवड हो या मकवाना, अर्जुन मेघवाल हो या कैलाश मेघवाल, मा.भंवरलाल हो या अछ्ला राम ये सभी राजनीती में ऊपर उठे पर उनका और उनके समाज का अछूतपन का कलंक नहीं गया। ये भी अछूतपन से मुक्त होने के सबुत नहीं है। बात यह है कि जो जन्म से ही अछूत है वह मरने तक भी अछूत ही है। इसका पद से या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से कोई लेना-देना नहीं है। यह बात हमें समझ में आनी चाहिए कि इस अछूतपन के खतरनाक नियम को बने हुए कई सदियां बीत गयी, तब से आज तक अछूत समाज 'अछूत' ही है। आर्थिक और राजनैतिक हालत बदलने के बावजूद भी उनके साथ यह चिपका है। यह बात हम लोगों को समझ में आनी चाहिए कि हमारे साथ जुड़ा अछूतपन का जो धब्बा है, वह गुलाम लोगों के गुलामी के धब्बे या तमगे से भी गहरा और भयंकर है। दासों या गुलाम लोगों के उत्थान में जितनी रुकवाटे उनकी गुलामी पैदा कर रही थी, उस से भी कई गुणा ज्यादा रुकावटें हमारे उत्थान में यह अछूतपन पैदा कर रहा है। ऐसा कहना कोई अवास्तविक नहीं है।
             आप में से कई लोग यह जानते है कि हमारे लोगों पर आरोप लगाये जाते थे और लगाये जाते है कि ये लोग गंदे काम करते है, छोटे काम करते है, मरे हुए जानवरों को काटते है, उनकी खाल उतारते है, गंदे कपडे पहनते है, मरे हुए जानवरों का मांस खाते है। विभिन्न बदसूरत देवी-देवताओं को पूजते है। मांवडियों को पूजते है, अलख को थापते है, बाबे को धोख देते है..ऐसे बहुत से आरोप और उन आरोपों से हमारी आस्था और आराधना की खिल्ली उड़ाते। हमारी बदहाली का क्रूर मजाक उड़ाते, फायदा उठाते। इस प्रकार के एक नहीं, दो नहीं, कई आरोप हम पर लगाये गए और लगाये जाते है। फिर भी हमारा समाज विचलित नहीं हुआ। आरोप लगाना आसान है, लेकिन इन आरोपों के लिए कौन जिम्मेदार है? आरोप लगाने वाले लोग इस बारे में सोचते तक नहीं है। वास्तविकता यह है कि आरोप लगाने वाले ही इन आरोपों के लिए जिम्मेदार है। यह जो समाज है वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रहा है, इस में कोई भंज अभी तक नहीं आया। जो नयी पीढ़ी है, जो आगे की पीढ़ी है वह अपने सभी रीति-रिवाज, धार्मिक भावनाएं आदि अपनी पिछली पीढ़ी से सीखती है। समाज में व्यक्ति तो मर जाता है पर समाज  नाम की संस्था नहीं मरती है। वह हमेशा जिन्दा रहती है।
                यह जो हमारा समाज है, मेघवाल समाज है, जो हिन्दू समाज है, वह इस तरह से संगठित नहीं हुआ है तो फिर हम में वो रीति-रिवाज कैसे आयेंगे? उन्होंने हमें शिक्षा से वंचित कर दिया तो उनका दोष है। उन्होंने हमें वेद और उपनिषद आदि से रोका तो उनका दोष है। उनके वेद-वेदांत का ज्ञान उनके पास पड़ा रहा, हमारा इस में क्या कसूर है। उनका ब्रह्म हमारे लिए एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं रहा। उनसे बड़ा हमारा अलख रहा तो इसमें हमारा क्या दोष? उनके अद्वैत की जगह हमारा अद्वय बड़ा रहा तो हमारा क्या दोष? उनके ज्ञान और धर्म से हमने अपने ज्ञान और धर्म को बड़ा कहा तो इसमें हमारा क्या दोष? वेदों और उपनिषदों की जगह हम ने महा धर्म की महिमा गायी तो उन्होंने हमें नीच धर्म को मानने वाले कह दिया। उनके उपनिषद और वेद ज्ञान से हमारा महाधर्म बड़ा, कम से कम उसने हमें जीने का साहस तो दिया। उनके शास्त्र ज्ञान से हमारे गुरु ज्ञान की श्रेष्ठता को 'आप्त-वचन' की प्रमाणिकता में उन्होंने कोसा, इन सब में हमारा क्या दोष था? हमारी धरा और धारा को किसने अलग किया? आरोप लगाना आसान है पर इन आरोपों को लगाने वाले ही इसके लिए जिम्मेवार है। यह बात हमें समझ में आनी चाहिए और उन्हें भी समझ में आनी चाहिए। उनके शास्त्र ज्ञान और खंडन-मंडन से हमारा कथा-कीर्तन और वाणी-वार्ता बड़ी है। उसको हेय दृष्टि से वे देखते है और आरोप लगाते है तो जिम्मेवार कौन है? वे ही लोग है। उनके श्लोकों से हमारी पेयाल और सायल बड़ी है, उनके आत्मा की मुक्ति से हमारी जीव की मुक्ति बड़ी है। उनके योग से हमारी धुप खेंवण बड़ी है। उनकी भक्ति से हमारी जुगति बड़ी है। भलेई इस में भाषा की वह पंडिताई नहीं हो पर अध्यात्मिक उन्नति का हमारा वह श्रेयस रहा है, जिसे वो अधम धर्म कह कर हम पर आरोप लगाते है पर दोषी वे ही है।
                 उन्होंने हमें यज्ञोपवीत और जनेउ पहनने का अधिकार नहीं दिया, भलेई हम अपने भजनों में अपने  को ब्रह्मा के मौभी पुत्र की औलाद मानते हुए अपने को जूना या पुराने समय का ब्राह्मण कहते रहे पर वे हमें भाई मानना तो दूर अपने समाज के घेरे से ही दूर मानते रहे। यह समाज चोखामा नहीं बन सका। चारों वर्णों में नहीं आ सका तो सोचिये, दोष किसका है? उनका जनेऊ धागा नहीं मिला तो हमने अपनी कंठी और कन्दोरे को ही बड़ा मान लिया। हमारी माँ-बहनों ने आठी और डोरे को ही पवित्र मान लिया और अपनी शुद्धि और पवित्रता में, अपनी आकीन और औकात में हम कहीं डिगे नहीं। फिर भी वे कहते रहे कि हम गंदे रहते है, गंदे लोग है। साफ-सुथरे नहीं रहते। अब आप ही सोचे हम साफ सुथरे कैसे रहते? हमारे से भी ज्यादा गंदे रहने वाले लोग जो 'मैली पिछेडी' वाले तमगे के साथ चलते है, उनसे इनको नफरत नहीं है पर हमारे समाज से है क्योंकि हमारे ऊपर 'अछेप' का ठप्पा जो लगा दिया। बात यह है कि यदि हम लोगों में गलत बातें है तो इसके लिए हमारा यह जबाब है कि अच्छी बातों की शिक्षा हमें किसने दी? ब्राह्मणों में जो रस्म-रिवाज है या ईसाई है, मुसलमान है, जैन है, उन में वो ब्राह्मणी रिवाज, ईसाई रिवाज, मुसलमानी रिवाज या जैनी रिवाज उनके बच्चों में कहाँ से आते है? इस बात पर गंभीरता से विचारने पर पता चलता है कि संस्कारों के विकास के लिए दोनों समुहों में अपनेपन और आपसी सम्बन्धों का होना जरुरी है। मेघवालों के साथ जुड़े 'अछूतपन' की वजह से हिन्दू समाज की ऊँची जातियों के साथ इस तरह का सम्बन्ध होना असंभव है। आरक्षण के आधार पर हम लोगों के नौकरियों में आने से और संविधान के लागू होने से एक-दूसरे को समझने का मौका मिला पर उनकी धारणा नहीं बदली, हमारे प्रति हिन्दू समाज में जो नफरत का बीज है, उसका खात्मा नहीं हुआ। दुनिया में जहाँ-जहाँ गुलामी रही है, दास या गुलाम रहे है उन लोगों की गुलामी में इस तरह की अछूतपन की दीवारें नहीं होने की वजह से अभिजात्य वर्ग के गुणों का पाठ हमेशा उनके सामने रहता था, इतना ही नहीं वे उनका अनुकरण भी करते थे और आजाद होने के बाद सभी नागरिक अधिकारों का निर्बाध उपयोग करते है पर हमारे प्रति अभी भी वक्र दृष्टि है। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? यह बात हमें समझ में आनी चाहिए कि अछूतपन की वजह से ही हमारे साथ ऐसा व्यावहार होता रहा है। इसलिए इस कलंक को ख़त्म कर दिया जाय। पर कैसे?
                   आजादी से पहले और अब भी इस पर मंथन हो रहा है। हम मथ रहे है, झुग रहे है पर अभी भी मक्खन नहीं निकल रहा है। संविधान की धारा 17 के तहत छुआछूत ख़त्म करने की घोषणा कर दी गयी पर वह ख़त्म नहीं हुयी, क्योंकि यह हिन्दू धर्म-प्रणीत है। इनके शास्त्र इसकी आज्ञा देते है। इसलिए यह कलंक आपके साथ चिपका है। क्या कोई इसे नकार सकता है? नहीं । यह एक धारणा के रूप में, एक अवशिष्ट के रूप में अभी भी विद्यमान है और आपकी प्रगति और नागरिक अधिकारों के निर्विघ्न उपभोग में बहुत बड़ा रोड़ा है। इसे धक्का देना होगा। यह जो धब्बा है, साफ-सुथरे कपडे पहनने से, ऊँचे औहदे पर पंहुचने से और शिक्षा की ऊँची से ऊँची डिग्रियां ले लेने पर भी आपके साथ जोड़ा गया 'अछूतपन' धुलने का नाम नहीं लेता तो हम सबको इस पर विचार करना चाहिए क्योंकि जब तक यह रहेगा तब तक आपकी भावी पीढियों के लिए यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ख़तरा बना रहेगा। आपको, हम को, सबको इस पर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिये और खुलकर करना चाहिए, अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को खुशहाल चाहते है। यही इंसानी तुजुर्बा है। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के जन्म से पहले मेघ समाज ने सोचा कि मरे हुए जानवरों का मांस खाने की वजह से उनके साथ छुआछूत की जाती है तो सिंध और पंजाब के मेघ लोगों ने इस पर गंभीरता से विचार किया। जिस इलाके में आज यह सभा हो रही है, उस समय यह सिंध का ही भू भाग था। सिंध में रहने वाले मेघ और यहाँ के मेघ एक ही जमात के है। महाराजा गुलाबसिंह का उस समय सिंध-पंजाब पर अधिकार था, जम्मू काश्मीर भी उनके अधीन था और बीकानेर पंजाब का हिस्सा था। तक़रीबन 1890 के आस-पास एक ऐतिहासिक निर्णय हुआ। इस समाज ने निर्णय किया कि वे मरे हुए जानवरों का मांस नहीं खायेंगे। हमारे समाज के संत पुरुष केरन महाराज और महाराजा गुलाब सिंह के बीच लिखित रूप से इसकी शर्तो को निबंधित किया गया और राज की सील से उसे पुख्ता किया गया। मेघ लोगों ने मरे हुए जानवरों का मांस खाना छोड़ दिया और और जगहों पर भी ऐसे ही परवाने लिखे गए। पर क्या हुआ , उन के साथ चिपका हुआ 'अछुतपन' नहीं गया। आज भी कोई भी मेघवाल मरे हुए जानवरों का मांस नहीं खाता पर यह 'अछूतपन' का कलंक नहीं गया। इस अनुभव से इसके मर्म को समझना चाहिए।
               कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि
           
आजादी से पहले कई लोग देश-देशांतर करते थे। इस देशांतर के पीछे कई कारण होते थे। अकाल की विभीषिका और सामंतों के जुर्म और अत्याचार प्रमुख कारण थे।  जातिगत बेगारी और अन्याय-अत्याचार से पीड़ित होकर भी मेघ लोग इधर से उधर भटकते रहे है। मैंने सन1931 के जनसँख्या के आंकड़े और उस पर की गयी टिप्पणियों को देखा है। मेघवाल या मेघ लोग उस समय कई प्रोविन्सेज में स्पृश्य गिने गए और कई प्रोविंसेज में अस्पृश्य  या अछूत माने गए। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि अछूतपन से छुटकारा पाने के लिए मेघ लोग देशांतर कर ले। आप और हम सभी जानते है कि भिन्न-भिन्न जगहों पर अछूत जातियों के भिन्न-भिन्न नाम है और इन नामों के फेर में इधर-उधर जाकर लोग अछूतपन के कलंक से अपने को बचाते रहे पर इस से 'अछूतपन' की समस्या ख़त्म नहीं हुई। मेघों ने कहीं पर भी अपना नाम नहीं बदला, लोग उन्हें कुछ भी कहते रहे हो पर मेघ अपने को मेघ, मेघवाल या मेंगवार ही कहते रहे। इस फेर में भी किसी भी प्रकार का धंधा करने के बावजूद भी उनका 'अछूतपन' नहीं गया। हमें यह बात समझ में आई कि देशांतर करने पर भी मेघ समाज पर लगा अछेप का ठप्पा नहीं मिटा। दर-दर भटकने पर भी और एक से बढ़कर एक धंधा बदलने पर भी इस जाति के प्रति हिन्दू सवर्ण लोगों की जो धारणा है, वह नहीं बदली। इनकी जनसंख्या का सर्वाधिक घनत्व जम्मू कश्मीर, राजस्थान और गुजरात में है। इसके अलावा इनका देशांतरण बहुत कम है और यहाँ पर इनकी हालाते बताती है कि देशांतरण कोई माकूल समाधान नहीं है। हाँ, यह किसी व्यवसाय या धंधे से धन अर्जन का एक जरिया हो सकता है। वह कुछ हालातों को बदलने में तो सहायक हो सकता है, इसे नकारा नहीं जा सकता है। इसलिए रोजगार हेतु देशांतरण हो तो कोई बुरा नहीं है, परन्तु वह 'अछूतपन' के कलंक को ख़त्म नहीं कर सकता है। रोजी-रोटी के लिए गांव के सभी छोटे-बड़ों के अहसान की बजाय देशांतरण में जाकर भाग्य बदलना अच्छा है। दूसरा प्रगति का लाभ लेने हेतु अधिक से अधिक शहरों में बसावट कर लेनी चाहिए।
                सवाल यह है कि पुरखों की जमीन पर रहते हुए, अपने इलाके में रहते हुए इस 'अछूतपन' निर्मूलन का कोई रास्ता हो सकता है? इस पर भी हमें विचार करना चाहिए क्योंकि सभी देशांतरण नहीं कर सकते है और सभी नौकरी-पेशा या जमीन-जायदाद के ऊँचे औहदे या पैमाने पर नहीं जा सकते है। इसके भी लोगों ने कई रास्ते  सुझाये , कई लोग उस-उस रास्ते पर चले भी है और चल भी रहे है। मसलन, साफ-सफाई से रहना, टीका-तिलक लगाना, हिन्दू  शास्त्रों को पढना, उनका बखान करना, हिन्दू धर्म के किसी पंथ में मन्त्र दीक्षा लेना आदि-आदि-  ऐसे कई तरीके लोग बताते है और अपनाते है और कहते है कि दूसरे लोग क्या सोचते है, हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम ये सब उंच-नीच, जाति-भेद और छुआछूत नहीं मानते है। कई बातें है। उन सब पर नहीं जाना चाहता हूँ पर यह तय है कि यह एक धर्म की समस्या है, हिन्दू धर्म की समस्या है। इसे हमें मानना चाहिए। जब तक हिन्दू धर्म  है यह जाति की समस्या रहेगी। जातिगत भेदभाव रहेगा। सवर्ण लोगों को यह समस्या लगती ही नहीं है। जातिगत भेदभाव उन्हें भेद भाव ही नहीं लगता है। छुआछूत उनके लिए कोई अनोखी चीज नहीं है। निष्कर्ष यह है कि इसे दूसरा कोई ख़त्म नहीं कर सकता है। जो अछूतपन से पीड़ित है वे इसे ख़त्म नहीं कर सकते है। यह हिन्दुओं के अन्दर का मामला है। यह सवर्ण लोगों के दिमागों का मामला है। आप और हम इसमें निस्साहय है। ज्यादा से ज्यादा आप किसी पंथ में जा सकते हो, जाते भी हो, पर समाज के ऊपर लगे अछूतपन के ठप्पे से आपको निजात नहीं मिली और न मिलेगी। ऐसा पिछली कई शताब्दियों का इतिहास बताता है और आज के वर्तमान से इसकी पुष्टि होती है।
                 मुसलमान बनकर जुलाहे हो गये, ईसाई बनकर बापिस्ट हो गए, सिख बनकर खालसा या निरंकारी हो गए। आर्य-समाजी बनकर भगत हो गए। इस से कुछ परिवर्तन हुआ परन्तु वह परिवर्तन उन-उन आस्थाओं या धर्मों की मान्यताओं के कारण हुआ। जो हिन्दू है, उनमें जाति है और जाति रहेगी। कोई भी जाति तभी जाति कहलाती है जब वह किसी से ऊँची हो और किसी से नीची। इसके बिना किसी जाति का वजूद ही हिन्दू धर्म में नहीं है और जाति के साथ ही निर्योग्यताएँ जुडी होती है। हिन्दू धर्म की इस मर्मान्तक अवधारणा को गहराई से समझना पड़ेगा, तभी हम कुछ सोचने और समझने की स्थिति में आएंगे। नहीं तो जाति के क्रूर चक्रव्यूह में कभी इधर और कभी उधर, कभी दर्द और पीड़ा में तो कभी दर्प और दमन में, कभी सुखी तो कभी दुखी होते रहेंगे। ऐसे आयोजनों के अवसर पर हमें इस पर विचार करना चाहिए।
                  जनसंख्या के आंकड़ों पर नजर डालने से मालूम होता है कि भारत के केंद्र प्रशासित प्रदेशों सहित 12 राज्यों में मेघ समाज निवास करता है। इन में जम्मू काश्मीर, राजस्थान और गुजरात में इनकी सर्वाधिक आबादी है। राजस्थान में अनुसूचित जातियों में शुमार चमार जाति के बाद मेघवाल जाति सर्वाधिक है। इससे भी आगे जैसलमेर और बाडमेर जिले में निवास करने वाली अनुसूचित जातियों की कुल आबादी की लगभग 85%  आबादी मेघवाल है।
जिसने भी अछूतपन की समस्या पर विचार किया और समझा है, उसका निष्कर्ष यही है कि यह हिदुओं की समस्या है। हिन्दू धर्म की समस्या है। हमें विचार करना चाहिए कि कोई धर्म अपने कुछ अनुयायियों के साथ ऐसा दोयम दर्जे का बर्ताव करने का स्थापन कैसे कर सकता है? यह एक अलग सवाल है पर महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए हमें धर्म को समझना पड़ेगा। हमारा जो समाज है, जो मेघवाल समाज है, व्यवहारिक रूप से हिन्दू समाज का अंग है। अगर हम ऐसा कहे तो कोई गलत बात नहीं है। किसी भी धर्म को समझने के लिए हमें उसकी सैद्धांतिक और व्यावहारिक धारणाओं को देखना चाहिए क्योंकि उसकी धारणाओं से ही उसके अनुयायियों का समाज बनता है। इसलिए वह आधार के रूप में स्थित रहता है। तत्वों की दृष्टि से हिन्दू धर्म किसी से कदाचित पराजित नहीं होगा। ऐसा मैं इस आधार पर कहता हूँ कि मैंने इसके कई शास्त्रों को पढ़ा है, उन पर कईयों की टीकाएँ और व्याख्याएं पढ़ी है, उसके  सैद्धांतिक पक्ष को पढ़ा है। इसकी सैद्धांतिक दृष्टि को जाना है। जिसके आधार पर मेरा यह मानना है कि तत्व की दृष्टि से हिन्दू धर्म कदाचित ही किसी भी अन्य धर्म से पराजित हो। शायद किसी भी धर्म से वह आला दर्जे का धर्म समझा जायेगा। सैद्धांतिक दृष्टि से हिन्दू धर्म में सर्वानुभूत 'आत्मा' ऐसा एक तत्व है, उस उदार तत्व के कारण या इस तत्व के आधार पर हिन्दू समाज की रचना हुयी होती तो जिस तरह से दीपक अपनों पर रौशनी और दूसरों पर अँधेरा नहीं करता, जैसे पेड़ सबको समान छाया देता है, जैसे बहता हुआ जल सबकी प्यास बुझाता है, इसी प्रकार की हिन्दू धर्म में सम्यक बुद्धि होनी चाहिए थी, किन्तु हिन्दू धर्म का व्यवहारिक स्वरुप न जाने किस वजह से इतना गन्दा है कि इसमें आचार और विचार का कहीं मिलाप नहीं है। जो लोग गला फाड़-फाडकर यह बताते है कि आत्मा सभी प्राणियों में एक सी है, उन्हीं लोगों द्वारा आदमी जैसे आदमी को अपवित्र और अछूत समझना बड़ी अनहोनी और आश्चर्य की बात है। यह कौतुक नहीं है तो क्या है? इसके व्यावहारिक पक्ष में इस से भी खराब जो दूसरी बात है, वह यह है कि जो लोग हिन्दू धर्म पर किसी भी प्रकार की श्रृद्धा नहीं रखते, उन्हें हमारे हिन्दू धर्म के ऊँची जाति के हिन्दू बराबरी की नजरों से देखते है। ईसाई लोग अपवित्र नहीं है और वे अछूत भी नहीं है। ऊँची जाति वाले हिन्दुओं को उनके छू जाने से कोई अपवित्रता नहीं होती और उनके नीचे काम करने में उन्हें बुरा भी नहीं लगता। उसी प्रकार एक दृष्टि से मुस्लिम लोग भी हिन्दुओं के किसी सबसे नीचे वर्ग से ज्यादा अछूत या अपवित्र नहीं है-  ऐसा कहना गलत नहीं होगा। यह सब हम रोजमर्रा के जीवन में बखूबी देखते है।
             एक बात और भी है, अभी सारे भारत में 'गौ-मांस' को लेकर बहस छिड़ी हुई है। कोई भी हिन्दू गाय की हत्या करके उसके मांस पर अपना निर्वाह नहीं करता है, किन्तु मुस्लिम और ईसाई लोगों को ऐसा करने में कोई संकोच या परहेज नहीं है। वे सवर्ण हिन्दुओं के लिए अछूत नहीं है परन्तु महार-मेघ, चमार-मोची, जटिया-जाटव आदि जो व्यवहारिक रूप से हिन्दू है, वे इन सवर्ण हिन्दुओं के लिए अछूत है। साफ बात यह है कि सवर्ण हिन्दूओं द्वारा ईसाई और मुसलमान आदि को इन महार, चमार, मेघ, मोची, जटिया, जाटव और अन्य अनुसूचित जाति के हिन्दुओं की अपेक्षा पवित्र और छूत माना जाता है। उनका और हिन्दुओं का हर प्रकार का बाहरी व्यवहार है, वे कुँए से पानी भरते है, बराबरी से खा-पी सकते है, अपने नागरिक अधिकारों का उन्मुक्त रूप से उपभोग कर सकते है। और भी कई बातों में उनसे बराबरी का व्यवहार है। लेकिन आप देखिये जो हम लोग है, जो वैदिक धर्म को या हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ मानते है, जिसमें हमारा आचार-व्यवहार है, उन से ही, हम से ही हिन्दू नफ़रत करते है। इतना ही नहीं वे लोग हमें जानवरों से भी नीचा समझते है।
               हमें यह समझना चाहिए कि जिस धर्म के तत्व इतने ऊँचे है, व्यवहार में वो धर्म इतना नीचा हो, तो क्या उस धर्म में रहकर हमारा उत्थान होगा? क्या हमारी भावी पीढ़ियां इस से मुक्त होगी? यह स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होता है। इस पर हमें गहराई से और भविष्यत् दृष्टि से, दूरदृष्टि से विचार करना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि हमारी समस्या 'तत्व' की समस्या नहीं है। हमारी समस्या सैद्धांतिक धर्म की नहीं है बल्कि हमारी समस्या व्यवहारिक धर्म की है, सामाजिक पक्ष की है और यह समस्या इस धर्म के ऐसे चरित्र के कारण है। इसलिए हमे धर्म पर विचार करना जरुरी है। इस पर गहराई से विचार किये बिना हमारी आगे की पीढ़ी सुरक्षित नहीं है। हर एक निवृतवान पीढ़ी अपनी आगे आने वाली पीढ़ी का भविष्य तय करने में अपनी उर्जा खपा देती है, इसलिए हमारी आगे की पीढियों के सुखमय जीवन के लिए हमें इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। हमारे लोगों को धर्म परिवर्तन करना चाहिए या नहीं करना चाहिए, इस सवाल का जबाब देना आसान नहीं है और यह भी कि धर्म मनुष्य के लिए आवश्यक है या नहीं है। इन सवालों में उलझने में मेरी कोइ रूचि नहीं है, किन्तु इस बात में सच्चाई है कि कुछ खास लोगों में विशेषकर तथाकथित हिन्दू लोगों को धर्म जान से भी प्यारा है। मैं यहाँ पर बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के शब्दों को दोहराना चाहूँगा। उस पर हम विचार करें। वे कहते है- " जिस धर्म में इन्सान की इंसानियत नहीं, वह धर्म किस काम का? जो धर्म अपने अनुयायियों को सांसारिक और आध्यात्मिक सुख के दरवाजे खुले करने के बजाय उन्हें बंद करके उन्हें उसी बुरी अवस्था में पड़े रहने के लिए मजबूर करता है, उस धर्म से चिपककर रहने का क्या मतलब है? "
           अभी की घेनडी की घटना, पाली जिले की बारात की घोड़े पर बंदोली निकालने आदि आदि की घटनाएँ क्या बयाँ करती है? मेघवालों को या अछूतों को जिस रास्ते से जाने का अधिकार नहीं, उसी रास्ते से ईसाई, मुसलमान और अन्य गैर-हिन्दू आ जा सकते है। ऐसा हम कई व्यवहारों और अवसरों पर देखते है, अनुभव करते है। इस भेद भाव की वजह पूछने पर खुले आम यह बताया जाता है कि मेघवाल लोग या अछूत लोग हिन्दू हैं, इसलिए उन्हें उस रास्ते से जाने का या फलां-फलां करने का अधिकार नहीं है। अगर इसी प्रकार का नियम है तो हम लोगों को धर्मान्तरण करके हिन्दू धर्म की ज्यादतियों से अपने आपको मुक्त क्यों नहीं करना चाहिए? इस पर ऐसे आयोजनों पर खुलकर विचार करना चाहिए क्योंकि यह एक सबसे बड़ी समस्या है, हमारे सम्मान पूर्वक और गरिमामय जीवन यापन के लिए। हम लोग बहिष्कृत रहने की बजाय किसी बड़े समाज का हिस्सा बनकर कम समय में ही अपना और अपने समाज का उत्थान कर लेंगे।
                   अछूतपन के लगे कलंक को पोंछने के लिए कई जातियों ने अपनी जाति का नाम बदलने का उपाय भी किया। इस हेतु कई सामुहिक प्रयास और आन्दोलन भी हुए। उन सब पर यहाँ चर्चा करना उपयुक्त नहीं है पर इतना निश्चित है कि जब से मेघ लोग मेघ नाम की जाति से जाने जाने लगे, उन्होंने अपने लिए इसी नाम को अपनाये रखा। कम से कम 17वीं शताब्दी में यह नाम अंग्रेजी पुस्तकों में आया है। लेकिन उस से भी पहले ये इसी नाम से जाने जाते थे। धारू मेघ 15 वीं शताब्दी में हुए। उस से भी पहले का उल्लेख अलेक्जेंडर कन्निंघम ने किया है। ये सब इतिहास में दफन की गयी बातें है। पर आजादी से पहले इन पर 'अछूतपन' का धब्बा लग चुका था। मैंने आपको केरण महाराज के बारे में बताया। उनके प्रयत्नों से जाति का कुछ उद्धार हुआ। हम लोगों ने हमारे ऊपर थौंपी गयी कई निर्योग्याताओं को उखाड़ फेंका, फिर भी उजल कौम में शुमार नहीं किये जा सके। यहाँ जितनी अछूत जातियां है, उन में उनको उच्च भाव मिल गया पर उनका अछुतपन नहीं गया। और भी कई जातियां थी, जो इस से पीड़ित थी। वे अपनी जाति का नाम बदलकर अछूतपन से मुक्ति पाने के उपाय करने लगी। बहुत सी जातियां है जिन्होंने ऐसा किया और अब भी कर रही है पर नामांतरण इसका हल नहीं है। अंग्रेजों के समय हुए जाति जनगणना में ऐसी प्रवृतियों का जिक्र है। कई जातियां जो मेघों के समकक्ष रही, या उनके जैसी जीवन-यापन स्थिति में आ गयी, वे भी अपने को मेघ या मेघवाल कहने लगी। आज भी यह प्रवृति जारी है। नाम बदलना अच्छा है या बुरा? कौन सा नाम हो और कौन सा नहीं? इस पर वाद और प्रतिवाद होता रहा है। यह हकीकत है। नाम के सवाल में कुछ नहीं रखा है, ऐसा कहने से काम नहीं चलेगा। इतना ही नहीं, नाम में सारा सार है। इस सम्बन्ध में दो उदाहरण देकर मैं दूसरे पहलू पर बात करूँगा।
                 एक तो आर्य समाज के शुद्धिकरण आन्दोलन का और दूसरा अनुसूचित जातियों के 'आदि धर्म' आन्दोलन  का उदाहरण है। दोनों पिछली शताब्दी में जोर पर थे और हमारे लोग इस से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे। हमारा जो मेघवाल समाज है-  वह प्राचीन समाज है। यह इस देश का आदि निवासी समाज है। जिनकी जनसंख्या का सर्वाधिक घनत्व सिंध के क्षेत्र में रहा है। अलेक्जेंडर कन्निङ्घम और अन्य पुरा-इतिहास वेत्ताओं ने उजागर किया है कि तक्षशिला, लाहौर, झेलम और सतलज आदि जगहों पर हमारे गणराज्य थे और आज भी इनकी सर्वाधिक बस्तियां यहीं है। जब हिन्दू पुनर्जागरण शुरू हुआ तो पूर्व में ब्रह्म समाज और पश्चिम में आर्य समाज का आन्दोलन हुआ। आर्य-समाज ने हम जैसे कई समाजों का शुद्धिकरण के द्वारा आर्यकरण कर हिन्दुकरण किया। आर्य समाज की गतिविधियाँ लाहौर, पंजाब, जम्मु-कश्मीर और मारवाड़ आदि जगहों पर थी। लाहौर और स्यालकोट में आर्य समाज का पूरा जोर और ध्यान मेघों के शुद्धिकरण के ऊपर था। हजारों की तादाद में मेघ शुद्धिकरण के द्वारा आर्य बन कर हिन्दू हुए। दूसरी जातियां भी हुई, जिसमें डोम, ओड, जाट आदि थे। यह सिलसिला उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में शुरू हुआ और आजादी तक चलता रहा। जो लोग इस बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते है, वे आर्य-समाज की गतिविधियों के इतिहास को ज्ञात कर जान सकते है। हमारे समाज के अग्रणीय भारत भूषण भगत जी के आग्रह पर मैंने इसका भी विवेचन किया, जो उनके ब्लॉग पर 'आर्य-समाज का शुद्धिकरण और मेघ' के नाम से प्रकाशित है। आप उसे वहां देख सकते है। इस सन्दर्भ में यहाँ मैं जो बात कहना चाहता हूँ वह यह है कि आर्य-समाज ने इन-इन जातियों को नये-नये नाम दिए, मसलन, मेघों के लिए 'भगत' और डोमों के लिए 'महाशय' आदि। उससे क्या हुआ? आप और हम सभी जानते है। संतराम बी. ए. जैसे लोग भी हमारे समाज से ही निकले। शुद्धिकरण का आन्दोलन फ्लॉप होकर रह गया। हमारे समाज की मुक्ति नहीं हुई। उसी के कुछ समय बाद आदि धर्म आन्दोलन भी चला। यह आन्दोलन 'अछूतपन' से पीड़ित जातियों के लोगों ने ही चलाया था। श्री मंगतू राम जी इसके अग्रणीय थे। इस आन्दोलन का ध्येय यह था कि जितनी भी अछूत जातियां है, वे एक हो जावे, वे सभी एक ही समाज है और जो जटिया, रैगर, खटीक, मेघ, चमार आदि उनके नाम है, वे उनकी शाखाएं या खांप है। इन सबका एक ही धर्म है-  'आदि धर्म'; वे अपने को आदि धर्मी के नाम से कहे और जाने जाये। वे न तो हिन्दू है और न मुसलमान आदि, उनका धर्म आदि धर्म है।
                      हमारी मुक्ति के लिहाज से देखा जाय तो दोनों आन्दोलन विडंबना पूर्ण ही कहे जा सकते है। अछूतों के आपस में जो जाति भेद है, वह भी विवादपूर्ण है और ऐसे आंदोलनों से उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा, हाँ, तत्कालिक समय में इन आंदोलनों ने उन्हें उर्जा दी। अछूतों के आपसी जाति-भेद का विवाद आज भी उतना ही है। सबसे बड़ी बात यह है कि वे यह मान लेते है कि उन में जाति भेद और अछूतपन शाखात्मक है और इस से जहाँ जो जाति ज्यादा होती है या प्रभावशाली बन जाती है वह दूसरी जातियों को अपनी जाति की ही छोटी या बड़ी खांप मानकर जातीय वर्चस्व में हावी हो जाती है। ऐसा हमें आज भी कई प्रदेशों में देखने को मिलता है। उन में रोटी-बेटी का व्यवहार नहीं होता है। पिछले कुछ दशकों में रोटी का व्यवहार तो शुरू हुआ परन्तु बेटी का व्यवहार नहीं शुरू हुआ और यह जो हुआ है, वह आदि धर्म या शुद्धिकरण के प्रयत्नों से नहीं हुआ बल्कि इसके लिए अन्य कारक उत्तर दायी है। वे इस से झिझकते है या दूर रहते है। इसका एक कारण हिन्दू धर्म का जातीय भेद है और जब वे यह मान लेते है कि आपसी जातियां शाखात्मक है तो रोटी-बेटी का व्यवहार भी शाखात्मक मान लेते है और उनका पालन करते है, जबकि कानून द्वारा इसकी छूट है। हम लोग, अनुसूचित जाति के लोग हिन्दू है और हिन्दुओं की जातियों में रोटी-बेटी व्यवहार की छूट है तो उसे उन्हें अमल में लाने की कोशिश करनी चाहिए परन्तु वास्तव में लोग ऐसी कोशिश नहीं करते है। इसका कारण यह है कि जो जाति-भेद और अछूतपन है, वह शाखात्मक नहीं है बल्कि यह भावनात्मक है। इसलिए उसे यदि समाप्त करना है तो हम लोगों को शाखाओं पर वार करने की बजाय भावनाओं को नष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।

इन भावनाओं को कैसे मिटाया जाये। इस पर विचार करना चाहिए। समझने की बात यह है कि जाति का मतलब ही एक अलग समूह से है और यह अलगाव ही जातियों का प्राण है, हिन्दू धर्म की यह प्राण वायु है। इसलिए आपस में खान-पान आदि हो जाने पर भी भावना ख़त्म नहीं होती। इसको ख़त्म करने के लिए लोग रामस्नेही बने, राधा स्वामी बने, कई साधु और संतों के चेले बने। वो सब अध्यात्म के तत्व तक ही रहा, व्यवहारिक रूप में उनकी आपस की जातिय भावना नहीं मिटी। हिन्दू धर्म का सवर्ण तबका हो या अवर्ण - अछूत कहा जानेवाला तबका, किसी में भी यह भावना ख़त्म नहीं हुई और यह ख़त्म नहीं हो सकती है। इसलिए अगर यह कहा जाय कि अछूतपन और जाति भेद पूरी तरह से ख़त्म नहीं हो सकता तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी, क्योंकि ये नाम में समाये हुए है। सवर्ण हिन्दू हम लोगों से नफरत करते है, वह सिर्फ हमारे नाम की वजह से नफ़रत करते है। यह समझने वाली चीज है। मेघवाल कहने पर सुनने वाले के मन में खास प्रकार की नफ़रत की भावना पैदा हो जाती है। चमार कहने पर अलग भावना पैदा होती है, रैगर कहने पर, जटिया कहने पर, सरगरा कहने पर.... एक खास प्रकार की भावना- एक नफरत की भावना पैदा होती है। वहीँ राजपूत कहने पर, ब्राह्मण कहने पर एक अलग खास तरह की आदर की भावना पैदा होती है। यह बात झूठ है, ऐसा कोई नहीं कह सकता है। नाम के साथ जुडी हुई इस नफ़रत और आदर की भावना के कारण एक इलाके का अछूत दूसरे इलाके में गया तो उस नाम के अभाव में उसके लिए रुकावट नहीं होती है। परन्तु 'इसके कारणों को खोजा जाए तो पता चलेगा कि अछूतपन के लक्षण सभी प्रदेशों में एक जैसे नहीं है। एक प्रदेश का अछूत दूसरे प्रदेश में लक्षण के अभाव में छूत समझा जाता है। मनुष्य के नाम पर मनुष्य और जाति के नाम पर जाति अछूत नहीं है। फलां एक नाम धारण करने वाले लोग अछूत समझे जाते है। वह नाम जिनका नहीं होगा, वे छूत समझे जायेंगे। यह समाज की मोटी-सी समझ बन गयी है।अन्यथा अछूत आदमी की चमड़ी में, रूप और रंग में, कुछ अलग है, ऐसी कोई बात नहीं है।' कहने का मतलब यह है कि अछूतों की पहचान का नाम के अलावा दूसरा कोई निशान नहीं हैं। इसलिए अछूतों को एक नाम के तहत एक होना चाहिए, इस बात का मेघवाल समाज हमेशा समर्थन करता रहा। अगर किसी एक सर्व सम्मत नाम से उनमें एकता और सद्भावना बढे तो यह उनके लिए सुखद होगी। ऐसा मैं मानता हूँ। इस तरह का बदलाव आये, उसका हम स्वागत करते है। पर यह बदलाव कैसे आये और जो प्रयत्न इस सम्बन्ध में हए उनके क्या परिणाम रहे, इस बारे में भी विचार करना चाहिये।
           मैंने सामाजिक आंदोलनों का इतिहास पढ़ा है। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से सामाजिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूँ। इसलिए इस पर संक्षिप्त टिप्पणी कर मैं विषयांतर करूँगा। अछूतपन से छुटकारा पाने के लिए तकरीबन 1925 के आस-पास आगरा आदि प्रदेशों के जटियों ने नामांतरण किया, वे जाटव लिखने लगे, कहने लगे; कई जगह रैगर लिखने/कहने लगे, भंगी या मेहत्तर लोगों ने वाल्मीकि कहना शुरू किया। यह नामांतरण हुआ और भी कई जातियों ने ऐसा किया। कुछ मेघों ने भी किया। सालवी, बुनकर, बलाई आदि इसी पृष्ठभूमि से उपजे नाम है। कई जातियों ने अपनी जाति के नाम पर अपनी संस्थाएं बनायीं और आज भी है। वे उन-उन जातियों के उत्थान के लिए काम भी करती है। यह सिलसिला आजादी से पहले से शुरू हो गया था। मैं उन सभी संस्थाओं पर नहीं जाना चाहता हूँ परन्तु यह बताना चाहता हूँ कि मेघों के नाम से भी संस्थाएं बनी। जिन में स्यालकोट आदि की 'मेघ उद्धार सभा' आदि प्रमुख है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मेघों की ये संस्थाएं मेघों ने नहीं बनायीं थी, बल्कि आर्य-समाज ने बनायीं थी। मेघ ऐसी संकल्पना में नहीं बंधे और जो सभी जातियों के सामूहिक प्रतिनिधित्व की संस्थाएं थी, जिन में जाति विहीनता का भाव उद्बोधित होता था, उन से जुड़े, गहरे रूप से जुड़े और अपनी जातीय पहचान को खोने की चेतना और सामूहिक चेतना वृद्धि हेतु काम करने लगे। लेकिन उनके पंचायतों का जो गणतन्त्र था, जो पंचायते थी वे ज्यों की त्यों बनी रही। आजादी के बाद उन्होंने जो संगठन बनाये, वे या तो बाबा साहेब के नाम से अस्तित्व में आये या अनुसूचित जातियों के संगठन के रूप में। उन संस्थाओं में हरिजन सेवक संघ, दलित उद्धार सभा, डिप्रेसड क्लासेस लीग, शेडूल्ड कास्ट फेडेरेसन/अपलिफ्ट यूनियन.. जैसी कई प्रमुख संस्थाएं थी। इनका प्रभाव और शाखाएं हमारे यहाँ भी रही और मेघवाल लोग निश्छल मन से, कर्मठता से उन में आगीवाण हुए। इस प्रकार से आजादी के बाद मेघ या मेघवाल के नाम से कोई संस्था अस्तित्व में नहीं रही। उन्होंने इस को तव्वजू नहीं दी। लेकिन दूसरे समाजों की जातीय संस्थाएं ज्यों की त्यों चलती रही।

मेरे लिए और हिन्दू समाज की अन्य जातियों के लिए यह सोचने का विषय है कि जो समाज ऐसी जातिगत संस्थाओं से परहेज करता रहा है, उसको यह संस्था, अपनी जाति के नाम से संस्था क्यों बनानी पड़ी या अब वे जगह-जगह ऐसी संस्थाएं क्यों बना रहे है? यह सोचने के लिए मजबूर है कि अनुसूचित जातियों का जो समेकित या समग्र आन्दोलन है, उस में कहीं न कहीं गड़बड़ है। निश्चित रूप से यह समाज अपने आप को ठगा हुआ महसूस करता है, वह यह भी महसूस करता है कि उसकी अपेक्षित अनदेखी की जा रही है और मेघवाल समाज समकक्ष वर्गों से पिछड़ता जा रहा है। उसे प्रगति का अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है। ऐसे कई कारण अनुभूत किये जा सकते है। इस पर अलग से विमर्श की गुंजाईस है। बात नामांतरण की कर रहा हूँ। विगत के इन आन्दोलनों की कर रहा हूँ। इन आदोलनों ने अलग-अलग बनी जातियों को नजदीक आने का दृष्टिकोण तो पैदा किया परन्तु हिन्दू चेतना ने उन्हें एक होने ही नहीं दिया, वे अपनी अलग रूढ़ हुई जाति को नहीं तोड़ सके और एक नहीं हो सके। यही आज की हकीकत है। बात यह है कि तमाम अछूत जातियों में एकता स्थापित करने की बात तक तो सदभावना है, और सभी हिन्दू है, वहां भी विरोध नहीं है, परन्तु एक नाम और फिर उनका एक सा व्यवहार- यह दूर की कौड़ी है। आदि धर्म आन्दोलन और अभी के मूल निवासी आन्दोलन में बहुत समानताएं है, बहुत सी संभावनाएं भी है, मैं इस अवसर पर उस पर नहीं जाना चाहता हूँ। परन्तु बदलाव का पक्ष ग्राही हूँ। हमें बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, हमारी आने वाली पीढ़ी को इस हेतु सक्षम बनाना चाहिए।
         जो अन्याय और अत्याचार हम पर हो रहे थे, उनका प्रतिरोध इन आन्दोलनों ने खड़ा किया, इस बात को हम नकार नहीं सकते है। यह एक कदम आगे बढ़ना था। जैसा कि आप जानते है, कई मामलों में राजसत्ता का उपयोग किये बगैर सामाजिक अन्याय को समाप्त करना मुश्किल है। इस पर आजादी के दौर में बहुत लम्बी -छोड़ी बहसे हुई, आन्दोलन हुए, वाद और प्रतिवाद हुए और हमारे समाज के कई लोग राजनीती में आये और धार्मिक क्षेत्र में आये, उन सब का उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में हमारे समाज की गरिमा को ऊपर उठाना था। सामाजिक क्षेत्र में खिलाफत आन्दोलन की धुरी हमारा समाज ही बना रहा।  उनकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता है। वे लोग प्रतिबद्ध थे। इस समाज के कई लोगों ने साधु-सन्यस्त होकर, कईयों ने समाज-सुधारक बनकर और कईयों ने नेता बनकर इस समाज का मार्गदर्शन किया। ऐसे प्रत्येक शख्स में समाज को एक नयी दिशा देने का जोश था, प्रेरणा थी और परिस्थिति थी। वे साधन संपन थे या साधन विपन्न, वे अपने ध्येय के प्रति अटूट आस्थावान थे। शहरों में संस्थाएं आन्दोलन कर रही थी तो गांवों में हमारी पंचायते पूरे संकल्प और शक्ति के साथ थौंपी गयी निर्योग्याताओं के विरोध में हर स्तर पर आंदोलनरत थी। मेघवाल समाज का सर्वाधिक संघर्ष और आन्दोलन गांवों में रहा, क्योंकि उनकी कुल जनसँख्या का 92%भाग यानि 100 में से 92 लोग गांवों में ही रहते है। इस समाज के सन 1879 में हुए निर्णय की पृष्ठ भूमि और बाबा साहेब के 'गंदे धंधे और बेगारी छोड़ने के आह्वान' ने इस समाज को पुनः जागृत कर दिया और फिर एक बार सवर्ण समाज के सामने चुनौती पैदा कर दी, हर स्तर पर-  धर्म के स्तर पर, राजनीती के स्तर पर और सामाजिक स्तर पर। मेघवालों का 'खुली-बंधी का आन्दोलन' जो हकीकत में हिन्दू समाज के सवर्ण वर्चस्व के विरुद्ध खिलाफत था, उसका पूरा मूल्यांकन अभी तक हुआ नहीं है। उनके 'बेगारी-उन्मूलन' आन्दोलन का भी कोई मूल्यांकन हुआ नहीं है। पर यह ऐसा दौर था, जिसमें राजनीती एक महत्त्व पूर्ण घटक बन गयी थी और मेघवाल लोग उसकी प्रमुख धुरी, हालाँकि जनसँख्या के लिहाज से वे अभी भी सभी राजनैतिक पार्टियों के लिए अदद बने हुए है, पर वैसी परिस्थियाँ नहीं है। इसलिए राजनैतिक रूप से उस समय जो मेघवालों का वजूद था, वैसा अब नहीं है।
                 अन्याय और अत्याचारों के विरुद्ध उनका सामाजिक आन्दोलन नाकामयाब रहा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। उनका धार्मिक आन्दोलन और राजनैतिक चलवल अपनी जगह ठीक थे। जब पूना पैक्ट के बाद दोहरे मतदान की बात आई और गंदे धंधे छोड़ने की बात आई, आन्दोलन हुआ तो पहली बार मेघ समाज में इन बातों को लेकर कुछ लम्बी खिंचातान हुई। जो लोग मेघवालों के मुक्ति आन्दोलन की थोड़ी बहुत भी जानकारी रखता है, वह जानता है कि सारे भारत में उस समय दलित समाज के लिए आशा की एक मात्र किरण डॉ. आंबेडकर थे और मेघवालों की पंचायतें उनके नक़्शे कदम पर चल रही थी। अनुसूचित जातियों के कई संगठन थे, उन में से कई संगठनों ने कोंग्रेस की लाइन पर डॉ. अम्बेडकर का विरोध भी किया। जो मेघ लोग कांग्रेस के  हरिजन नामधारी या दलित नामधारी संगठनों के कर्ता-धर्ता थे, उन्होंने यह विरोध मुखर रूप में किया। कई लोग थे, इसकी सूचि बनायीं जा सकती है। विभिन्न अनुसूचित जातियों के विभिन्न लोगों में भगत श्री अमीं चंद मेघ भी ऐसे ही एक शख्स थे। ऐसे इने-गिने लोगों को छोड़कर पूरा समाज डॉ. आंबेडकर के साथ खड़ा था। शुरूआती दौर में आदि धर्म आन्दोलन से जुड़े लोग और आर्य समाज से जुड़े लोग भी डॉ. अम्बेडकर के विरोध में खड़े दिखे, पर बाद में परिस्थियाँ बदल गयी। ऐसा क्यों हुआ, उसका सबसे प्रमुख कारण मेघवालों की पंचायतें थी और दूसरा बॉम्बे में खोती-प्रथा या वतनदारी का कानून पारित होना था। जो मेघवालों के बेगारी के विरुद्ध किये जा रहे संघर्ष में मददगार था। इस दौर में गंदे धंधे छोड़ने, मरे हुए जानवरों की खाल नहीं उतारने और मरे हुए पशुओं का मांस नहीं खाने की जो शर्ते 1879 में तय हुई थी, उसका मेघवालों की पंचायतों ने सख्ती से पालना करने के फरमान जारी करने शुरू कर दिए। हमारे क्षेत्र में ये काम आजादी से पहले ही बंद कर दिए गए थे पर कुछ जगह अपवाद भी थे। उन पर पंचायतें सख्त होने लगी। इसी सख्ती के विरुद्ध सवर्ण हिन्दू समाज खड़ा हो गया और कुछ हमारे ही लोग, कारण यह था कि पंचायतों के फरमान, जिसे परवाना कहा जाता था, उस पर जब तक राज की निशानी/सील नहीं लगती थी तब तक वह बाध्यकारी नहीं होता था और कोई भी हाकिम या जागीरदार ऐसा करने को तैयार नहीं रहता था। इसलिए मेघों पर भयंकर विपत्ति थी, फिर भी सभी मुसीबतों को झेलते हुए भी उन्होंने गंदे कहे जाने वाले कामों को स्वतः तिलांजलि दे दी। उनके साथ अन्य कौमों ने ऐसा नहीं किया। यह कहना प्रासंगिक है कि सिंध अधीन पंजाब और सिंध के आस-पास के हमारे बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर आदि के क्षेत्रों में आजादी से पहले पूर्ण प्रतिबन्ध लग गया परन्तु मेवाड़ और गोड़वाड के इलाके के मेघ  लोग इस पर सहमत नहीं हुए। उन में से कई लोग जो समाज सुधारक की भूमिका में थे वे खुलकर इसकी वकालत करने लगे। कांग्रेस और हिन्दू जनमत तो यही चाहता था।
। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदली और उन लोगों को भी यही रास्ता अपनाना पड़ा।
             दोहरे मतदान की संशोधित प्रक्रिया के अनुसार मारवाड़ में हुए चुनावों में मेघवालों ने  जनमत में भाग लिया। इसके बाद ऐसा जो चुनाव हुआ, उस में राजबाग में रहने वाले सूरजमल जी मेघवाल सूरसागर से निर्वाचित हुए। यह ज्यादा समय नहीं रह सका और सीटों के आरक्षण की व्यवस्था में फलौदी की सीट आरक्षित की गयी। उस में भी लालाराम मेघवाल विधायक चुने गए। सीट फिर बदल दी गयी और बिलाडा की सीट को आरक्षित किया गया, जिस में कालूराम आर्य विधायक बने। उस सीट का स्थानांतरण कर सूरसागर सीट को आरक्षित किया गया और वहां से मेघवाल नरपत राम बरवड़ लम्बे समय तक विधायक और मंत्री रहे। उसके बाद मोहन मेघवाल भी लम्बे समय तक विधायक और मंत्री भी रहे। राजनैतिक दल के लिहाज से मोहन मेघवाल बीजेपी से रहे, बाकी अवधि में हमारा प्रतिनिधित्व कांग्रेस के विधायकों ने ही किया। जैसलमेर से एक बार साधारण सीट से मुल्ताना राम मेघवाल चुने गए। जोधपुर, जैसलमेर और बाडमेर से अनुसूचित जाति का कोई सांसद नहीं रहा। जालोर से हुकमा राम मेघवाल ही थे और बीकानेर से लम्बे समय तक सांसद रहने वाले पन्ना लाल बारुपाल और वर्तमान सांसद अर्जुन राम मेघवाल ही है। इस क्षेत्र की राजनीती का मोटे रूप से यह परिदृश्य है। जो आरक्षित सीटें इन जिलों में रही, उनके विधायक मेघवाल ही रहे और लम्बे समय तक रहते आ रहे है, फिर भी मेघवालों की दुर्दशा हो रही है तो हमें सोचना पड़ेगा कि कमी कहाँ है?    निर्योग्याताओं को मिटाने वाले कानून है, आपके विधायक है और सब कुछ है फिर भी हिन्दू मानसिकता आपके साथ नहीं है तो मानना पड़ेगा कि सत्ता आपके साथ नहीं है। सामंती-जागीरदारी के राज और आज के राज में उस लिहाज से कोई फर्क नहीं है। हमारे लिए सत्ता नहीं के बराबर है। फर्क इतना है कि पहले सत्ता वंश परम्परा से चलती थी और अब एक तरह की सम्मति से चलती है। हमारा संघर्ष आज भी जारी है। निर्योग्यता उन्मूलन कानून बना दिए जाने के बाद भी जाति और रस्म-रिवाजों पर क़ानूनी दबाब नहीं है, तो ऐसी आजादी नहीं के बराबर है। ऐसी सत्ता हमारे किसी काम की नहीं है और हमारे जेहन में बार-बार यह प्रश्न कौंधता है कि क्या सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में कानून बनाकर परिवर्तन करना संभव है या नहीं? कुछ लोग इस के पक्ष या विपक्ष में हो सकते है। परन्तु यह यक्ष प्रश्न हमारी भावी पीढ़ी के सामने भी खड़ा रहेगा। उसका जबाब ऐसी संस्थाओं से ही दिया जा सकता है। हमे इस पर विचार करना चाहिए कि हमारे विधायक और सांसद बन जाने के बाद भी सत्ता किसकी सम्मति से चल रही है?
               राजस्थान की विधान सभा के 200 विधायाकों में तकरीबन 34 विधायक अनुसूचित जातियों के है। यह इनका प्रतिनिधित्व है। इससे भी बड़ी बात यह है कि लोग बताते है कि इन 34 में से 17 या 18 विधायक मेघवाल जाति से आते है। मुझे तो इन पर संदेह है कि ये आपकी जाति के है भी या नहीं भी। जो भी हो, सत्ता का यह स्वरुप है। क्या जिस जाति के इतने विधायक हो और जिस जाति की सर्वाधिक जनसंख्या हो, उस जाति पर फिर भी अत्याचार और अन्याय हो, यह कैसे संभव है? आप इस पर गहराई से विचार करिए। मैं तो विचारों के संसार में गोते खाता रहता हूँ। कई तथ्य मिलते है। सबसे बड़ा तथ्य यह है कि जिस सम्मति की बात की जाती है, वह किन की है? किस वर्ग की है? आजादी के बाद जो सत्ता हासिल हुई, जिसमें हमारा प्रतिनिधित्व हुआ पर हमारी सम्मति उस में कभी जुड़ नहीं पायी या कभी रखी नहीं गयी। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के अनथक प्रयत्नों से प्रजातंत्र में संख्या बल में हम लोगों को अपरिहार्य प्रतिनिधित्व प्राप्त है परन्तु  प्राप्त की गयी सत्ता में सम्मति के भागीदार नहीं है।  सत्ता एक वर्ग विशेष की सम्मति से ही अमल में लायी जा रही है। पार्टियों के नाम बदल जाते है, बैनर बदल जाते है, चेहरे बदल जाते है पर सत्ता की सम्मति पर कब्ज़ा उसी वर्ग का है। इस लिए डांगावास, घेनडी और डेल्टा जैसे जघन्य हत्या कांडों में भी हमारे तथाकथित विधायकों और सांसदों की कोई आवाज किसी गली में भी नहीं सुनाई देती है।
               सवाल सत्ता में संख्या बल से ज्यादा प्रभावकारी प्रतिनिधित्व या सम्मति का है। आजादी के बाद सत्ता जिन के हाथों में आई, वे सम्मति को कोई महत्त्व नहीं देते है। यह 60-70 वर्षों में हमने जाना है। इसलिए आप पर या हम पर जो अत्याचार और अन्याय होता है, उसे वे मामूली मानकर उस पर ध्यान नहीं देते है। उनके लिए न तो यह तकलीफ देने वाली चीज होती है और न चुनावों में जिताने या हराने वाली होती है। क्योंकि  हमारा जो राजनैतिक मतदान का हक है, उसे बहुत ही सीमित कर दिया गया है। राजनीती में सिर्फ विधायक या सांसद बनना ही सत्ता की प्राप्ति नहीं होती है, बल्कि सत्ता जिन गलियारों में पसरी होती है, वहां पर अधिकार सम्पन्नता प्राप्त करना सत्ता की प्राप्ति है। जहाँ योजनायें बनती है, जहाँ से राज्य के लाभ निकलते है, उन केंद्रो पर काबिज होना इसकी पहली शर्त है। हम लोगों को ऐसे केन्द्रों, निकायों, निगमों, बोर्डों, आयोगों या सन्स्थानों के संचालन या प्रशासन से जान-बूझकर दूर रखा जाता है। इनके प्रशासन के काम-धाम, सलाहकारी और नियंत्रण के रूप में  जितने भी राजनैतिक मनोनयन के महत्त्व पूर्ण पद या प्रतिष्ठाएं है, उन पर उन्हीं लोगों का, उन्हीं वर्गों का वर्चस्व है जो किसी विशेष वर्ग या जाति से आते है। सर्वाधिक आबादी और उज्र होने के बाद भी जब ऐसे अवसर आते है तो सरकार द्वारा मेघवाल को यह अवसर नहीं दिया जाता है और अन्यान्य जाति को ये पद और प्रतिष्ठाये बख्स दी जाती है और वे लोग आपके हितों की अवहेलना करते है। ऐसे पद और प्रतिष्ठाये सरकार का संरक्षण कही जाती है, जो आपको नहीं दिया जाता है, आपको संरक्षण नहीं देते है। नौकरियों में आरक्षण और कानून-कायदे के प्रावधान संवैधानिक संरक्षण है और ऐसे पदों पर मनोनयन और चयन सरकार का संरक्षण है। सरकार द्वारा जिन लोगों को या जिस जाति के लोगों का मनोनयन या चयन किया जाता है, वह उन-उन का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संरक्षण होता है। राजनैतिक सत्ता किसी भी दल या पार्टी की हो ये अन्यान्य जातियां या वर्ग उन पर हावी रहते है। इस अनदेखी को आप पंचायत या निगम-बोर्ड से लेकर लोक सेवा आयोग और अन्य मंडलों तक देख सकते है। इस लिए लाभ के स्रोतों का मुहाना आपकी तरफ नहीं होता है। आप उपेक्षित और ठगे जाते है। जहाँ से काम होने होते है, जहाँ से लाभ या विकास की सुविधाएँ निकलती है या बंटती है, जहाँ से अन्यायों अत्याचारों पर रोक निश्चित होती है, जहाँ से प्रभावकारी नियंत्रण होता है, काम होता है, वहां वो होते नहीं है या मिलते नहीं है। यह बात समझ में आनी चाहिए कि सर्वाधिक जनसंख्या और सर्वाधिक विधायक होने के बावजूद भी सरकारी संरक्षण नहीं होने से आप प्रगति के लाभों से, अन्याय और अत्याचार की रोकथाम से वंचित हो जाते है। ऐसे अवसरों पर इस हेतु कारगर उपायों पर चर्चा की जानी चाहिए और किस तरह से यह समाज ऐसा संरक्षण प्राप्त करे, उसके लिए आवाज उठानी चाहिए और वह सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
                हमारे जो प्रतिनिधि है, वे माला पहनने के बाद सोचते है कि उनका काम हो गया, उनके समाज का काम हो गया, गैर-बराबरी और भेदभाव ख़त्म हो गया, जातिगत अन्याय और अत्याचार नहीं रहे। बड़ी विचित्र स्थिति है। वे इन बातों को विरोधियों के सामने उठाने में, उपयुक्त आसन के सामने उठाने में कतराते है। बहुत सी बातें हैं। वे सामाजिक आन्दोलनों से दूर भागते है, लेकिन माला पहनने के मौकों को नहीं चूकते है। आजादी के बाद किसी भी नेता ने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आन्दोलन किया हो या उसका नेतृत्व किया हो, ढूंढ़ ने से भी कोई बिरला ही उदाहरण मिलता होगा। यह स्थिति विडम्बना पूर्ण और भयावह है। प्रसंगवश वे कहीं इन पर चर्चा कर लेते है तो वह आदर्श की बातों से लबरेज होती है। बात करने से काम नहीं चलता है। जब आदमी मुसीबत से निकल जाता है तो वह सबसे पहले सिद्धांतों की बात करने लगता है। उनकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं होती है और सामाजिक पीड़ा को वे ऐसी बातें कर प्रतिबद्ध हीन हो जाते है। यह दुखद और निराशाजनक है। कई लोगों को ऐसा लगता है कि उनको माला पहना दी गयी तो उनका कर्तव्य समाप्त हो गया, वे जीत गये। वे इस जीत को ही दुखों की मुक्ति मान लेते है, परन्तु हकीकत में जीत के बाद ही समाज उद्धार का काम शुरू किया जाना होता है। वह बड़ा कठिन और मुसीबत भरा होता है। क्योंकि जीतने से काम नहीं चलता, आदर्श की बातें करने से काम नहीं चलता। जीतने से, बातों से धरातल नहीं बदलता है। उनका परिणाम सामने आना चाहिए, और परिणाम दुनिया के सामने स्वयं नहीं आता। परिणामों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष के लिए संगठन बनाना पड़ता है। किसी भी विधायक या सांसद ने ऐसा संगठन बनाया हो, हमारी जानकारी में नहीं है। योगेन्द्र मकवाना ने अनुसूचित जातियों का एक संगठन अवश्य बनाया परन्तु उनके सत्ता से अलग होते ही वह बिखर गया। उदित राज ने सत्ता में जाने के लिए संगठन बनाया। कुल मिलाकर जब आपका संगठन नहीं है तो सिद्धांत की बात कोरी बात है, उसका कोई परिणाम नहीं निकलता है। इसलिए उचित संगठन का निर्माण करना आवश्यक है। जिस प्रकार से किस्मत की गाड़ी चलाने के लिए प्रयास करना पड़ता है, उसी प्रकार से सिद्धांतो का उचित परिणाम पाने के लिए संगठन होना आवश्यक है। आप सभी लोग धन्यवाद के अधिकारी है कि आपने अपने आदर्शों  को उद्देश्यों के रूप में सामने रखा और परिणामों की प्राप्ति हेतु संगठन बनाया। उसी संगठन के बल पर यह इतनी भव्य ईमारत खड़ी की और शिक्षा के क्षेत्र में और अन्य मामलों में लामबद्ध हो परिणामों के सुखद फल पा रहे हो। यह समाज उसके लिए आप सबका ऋणि रहेगा
संगठन में शक्ति होती है- यह बात सभी स्वीकार करते है। संगठन के द्वारा एक व्यापक संस्था का निर्माण किया जा सकता है। जिसका फलित आपकी यह संस्था है। यह बात सही है कि हमारा समाज गरीब है, पर यह बात अधिकतर लोगों के लिए तो सही है परन्तु समाज के लिए सही नहीं है। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, इस बात को हमने सुना है और जाना है। सामूहिक प्रयत्नों में बहुत बल होता है। भलेई धनबल से हमारा समाज गरीब हो पर हमारी संख्या कम नहीं है। यहाँ पर लाखों की संख्या में हमारे लोग रहते है। हर साल एक-एक रूपया भी दे तो भी हर साल लाखों में फंड इकटठा हो सकता है। इसको आपने इस संस्था को बना कर प्रमाणित कर दिया है। उस से आप समाज हित का काम कर रहे हो, यह सन्तोष और ख़ुशी की बात है और हमें आशावान बनाती है कि हम शीघ्र ही उन्नति करेंगे। विभिन्न संस्थाओं और संगठनों में काम करने के कारण मैं इस बात को अच्छी तरह से जानता हूँ कि जिसे क, ख, ग आता है, उसे लगता है कि वह नेता बन गया है। कुछ लोग संस्था के माध्यम से काम करने को तैयार नहीं होते है। कुछ लोग सोचते है कि संस्था में काम करने से उनका काम रुक जायेगा। कुछ लोगों में गैर जिम्मेदारी आ जाती है, कुछ लोग अपने नाम के लिए कुछ नया करने की कोशिश करते है। बहुत सी बातें है, आप लोगों ने भी अनुभव की होगी परन्तु आपने उनको धैर्य और साहस से, परिपक्वता और पैरवी से पार पाया होगा- अगर मैं ऐसा कहूँ तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी। इस संस्था ने फंड इकठ्ठा कर काम शुरू किया वह दूसरे जिलो के लिए भी प्रेरणादायी है। आपने समाज में परिवर्तन लाने की शुरुआत की, उसका बेड़ा उठाया और प्रगति के पथ पर अग्रसर हुए। यह अत्यल्प समय में ही आपकी सफलता है।
                       इसके साथ ही जिस जगह हम रह रहे है, जहाँ हमारे समाज के लोग रह रहे है। वहां हमारे लोगों पर कई तरह की जुल्म-ज्यादतियां हुई है या हो रही है। उसके प्रतिरोध में भी संगठन के कारण आपने प्रभाव पूर्ण आवाज बुलंद की है। हम लोग जहाँ रह रहे है, हम यहाँ अल्पसंख्यक नहीं है। हमारी सघन बस्तियां है। फिर भी सरकार हमारी बात नहीं सुन रही है। हमारी तकलीफों, हमारी बाध्यताओं और हम पर हो रहे गैर-बराबरी और जुल्मों पर हमारी दलीलों को सुनने के लिए तैयार नहीं है, बल्कि कई लोग हमारा मजाक उड़ाते है। वे हमारे को हमारे हक देने को तैयार नहीं हैं। हम लोग इस जमीन के आदि निवासी है। यह हमारी जन्म भूमि है, जीवन दायिनी है, जिसे हम माता मानते है, हम लोग उसी हिन्दू धर्म को मानते है, जैसा  कि दूसरे सवर्ण मानते है फिर भी हमारी उपेक्षा की जाती है जबकि अन्य जातियों या अन्य धर्मों के लोगों के साथ वे हमदर्दी रखते है। इसका कारण हमारी एकता का नहीं होना और संगठन का नहीं होना ही है। ऐसे संगठनों के फलीभूत होने से एक ओर जो अपने गलत नेता है, उन पर रोक लगायी जा सकती है और उनकी एक दिशा तय की जा सकती है तो दूसरी ओर अन्याय और अत्याचार का मुकाबला भी किया जा सकता है। हमारा जो अपमान होता है और हमारी बातों को जो अनसुना कर दिया जाता है, उसको शायद मौका नहीं मिले।
                 केवल अछूतपन या जाति-भेद के विरोध में ही शिकायत करने का कोई फायदा नहीं है। हिन्दू-मानसिकता से भरे पड़े नेता इस दर्द को दर्द नहीं मानते और इसके साथ वे हमारे में गुण-भेद भी करते है। जिस बात पर कदाचित ही हमारा ध्यान जाता है। वे यह कहते है कि इनको ऊँची कुर्सी पर बैठा दे तो भी उन में वो गुण नहीं होते। बहुत सी बातें है, जिसका आप ऐसी शिक्षण और शोध सन्स्थानों में युवाओं में गुणों का विकास कर जबाब दे सकते हो। हमारे समाज से एक से बढ़कर एक प्रशासक बने है, इंजीनियर बने है, डॉक्टर बने है, फिर भी वे कहते है कि हम में गुण नहीं है, हम गुणवान नहीं है। समझने वाली बात यह है कि जाति और जाति में गुणभेद किया गया है। यह किसने किया? हिन्दुओं ने किया, हिन्दू शास्त्रों ने किया। अगर शास्त्र और समाज इसे नहीं बढ़ाते तो यह गुणभेद नहीं बढ़ता और अगर जातियां नहीं रहती तो गुणभेद भी इतने दिनों नहीं रहता। क्योंकि सारी दुनिया के लोग यदि बराबर गुणवान होते तो उन्हें किसी एक जाति की श्रेष्ठता और वर्चस्व कभी बर्दास्त नहीं होता। इसलिए शास्त्रों में, धर्म में और अन्यान्य जगहों में गुण भेद किया, अधिकार भेद किया ।ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर यह गुण भेद नहीं होता तो जाति-भेद भी कभी का ख़त्म हो गया होता। अन्य लोग जिस तरह से हमसे जाति से श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वे व्यवहारिक गुणों में भी श्रेष्ठ है। इसलिए हमारे लोगों में व्यवहारिक गुणों को बढाने के लिए खास प्रयास करना चाहिए। यह गुण-भेद ही उनकी व्याख्या में मेरिट है। अभी हाल ही में भारत की सर्वोच्च सेवा परीक्षा में अनुसूचित जाति की लड़की अव्वल आई। कुछ दशकों पूर्व हमारे ही समाज की साधना मेघवाल बोर्ड की परीक्षा में लगातार अव्वल रही। यह उस गुण-भेद को चुनौती है। हमें ऐसे संस्थानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ी में ऐसे गुणों का विकास करने के लिए प्रशिक्षण और ट्रेनिंग की व्यवस्था का इंतजाम करना होगा। सामूहिक प्रयासों से हम ऐसा कर सकते है।
                  समाजिक अन्याय और अत्याचार के विरोध में कुछ लोग मौन और निरपेक्ष बने रहते है। यह खेद और आश्चर्य की बात है। ऐसे ही पढाई-लिखाई और दूसरे हुनर को प्राप्त करने में उनकी शिथिलता या ढिलाई दुखद है, परन्तु यह इतने विक्षोभ की बात नहीं है। उन्हें बात करना नहीं आता,  जोर-जोर से बोलने पर भी गुस्सा नहीं आता, उनके साथ अन्याय और अत्याचार होने पर भी वे शोरगुल नहीं करते। इसका कारण है कि उन्हें अन्याय की समझ ही नहीं है। शिक्षा और हुनर के महत्त्व का पता ही नहीं है। कई जगहों पर कई बार हमारे ध्यान में यह भी आया है कि कोई व्यक्ति किसी पद के योग्य है किन्तु जाति-भेद की वजह से उस पद को वह नहीं पा सकता, तब उसे पता चलता है कि जाति-भेद कितना खतरनाक है। वरिष्ठ आइ.ए.एस. उमराव  सालोदिया के मामले से आप सभी वाकिफ है। ऐसे लोगों को तभी हमारे आन्दोलन का महत्व समझ में आता है और वे हमारे समर्थक या साथ हो जाते है। किन्तु जिस में उस पद पर जाने की योग्यता ही नहीं हो, तो उसको जाति भेद का स्वरुप और विभीषिका कैसे समझ में आयेगी? जाति-भेद हो या न हो, वह तो जहाँ है वहीँ रहेगा। इसलिए अपने लोगों की योग्यता बढ़ाने का प्रयास हम लोगों को करना चाहिए। यदि गुणों में समानता आयी तो जाति-भेद में समायी हुई अस्पृश्यता या अछूतपन ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं है। आजादी के इतने वर्षो बाद भी हम शिक्षा में पिछड़े है। पिछली जनगणना के आंकड़ों के  अनुसार पूरे राजस्थान में हमारे समाज का शिक्षा का अनुपात 2% से भी कम है। यह चिंता का विषय है। आपके जिले में अनुसूचित जातियों की आबादी में 85% मेघवाल है इसलिए ऐसा लगता है कि मेघवालों में शिक्षा का काफी प्रसार है। परन्तु एक कहावत है कि जब रोही में अकेला ऊंट दौड़ता है तो लगता है कि यह बहुत तेज दौड़ने वाला है, वही ऊंट जब होड़ में दौड़ता है तो पिछड़ जाता है। यही हमारे समाज की स्थिति है। उनकी शिक्षा का अनुपात 'ऊंट के मुंह में जीरे' के बराबर है। ऐसी सन्स्थाओं के माध्यम से समाज में शिक्षा के प्रति भूख और लगन पैदा करनी चाहिए। बालकों के साथ बालिका शिक्षा पर भी उतना ही जोर देना चाहिए।
                       कुल मिलाकर बात यह है कि जिस प्रकार की समाज़िक, धार्मिक और राजनैतिक स्थिति हमें चाहिए, वैसी स्थिति प्राप्त करने के लिए हमें देर नहीं करनी चाहिए। हम लोगों की जनसँख्या अपने आप में इतनी विशाल है कि हम लोग राजनीती में या किसी धर्म में एक साथ रहते है तो एक सबल और उन्नत समाज का निर्माण कर लेंगे। हमारे बिना हिंदू हो या मुस्लिम, उनकी राजनीती परवान नहीं चढ़ सकती है। हिन्दू धर्म का अस्तित्व भी हमारे लोगों की वजह से है। अगर किसी धर्म को मानने वाले ही नहीं हो तो उस धर्म की क्या गति होगी? आप अंदाजा लगा सकते है। रोज-रोज की धर्म की पाबंदियों और भेद-भाव से तो अच्छा है कि हम ऐसे धर्म से किनारा कर लें। ऐसे धर्म में हमारा रहना और नहीं रहना बराबर है। धर्म आदमी की उन्नति के लिए होता है। उसकी अवनति या पतन के लिए नहीं। इस पर भी हमें विचार करना चाहिए। आजादी के दरम्यान हमारे जो साधु-संत हुए, उन्होंने अपने अनुभव और ज्ञान से हमारा मार्ग दर्शन किया। जैसा उन्होंने हमें बताया हम उस पर आकीं हुए। भारत के विभाजन से पूर्व हमारे समाज का निकट सम्बन्ध सिंध के हैदराबाद, लाहौर, स्यालकोट, पेशावर, भावलपुर आदि जगहों  से रहा और इधर से उधर आते-जाते रहे। वहां पर आजादी के दौर में जो गतिविधियाँ होती थी, उसमें मेघ लोग सक्रिय भागीदार थे। मैने सं 1857 के आन्दोलन में मेघों के योगदान पर एक जगह चर्चा की है। उनकी धार्मिक जाग्रति के बारे में आर्य-समाज के सन्दर्भ में प्रकाश डाला है। हमारे मुक्ति-संघर्ष में बेगारी के साथ खेती की जमीनों पर जो बिचौलियों और सूद खोरों का भयावह साया था। उस के विरुद्ध भी सिंध और यहाँ पर एक साथ आवाज उठी। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के प्रभाव से इस में क्रन्तिकारी बदलाव आये और जब सर छोटूराम ने 'यूनियनिस्ट पार्टी' तले आन्दोलन चलाया तो  हमारे समाज ने उनका भी साथ दिया। हमारे समाज के स्वतंत्रता सेनानी भगत हंसराज मेघ को कौन भूल सकता है। वे इस आन्दोलनों के अग्रणीय मेघ पुरुष थे। अखंड भारत की पंजाब सूबे की सरकार में वे आजादी से पहले सर छोटूराम की सरकार में काबिल मंत्री रहे। जब बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने शेड्यूल्ड कास्ट फेडरसन का गठन किया तो यूनियनिस्ट मिशन और फ़ेडरेशन के बीच एक साझा आन्दोलन चलाने की रणनीति भी तैयार हुई।
                     आजादी के दरम्यान और उसके बाद कईं मेघवाल घर-बार छोड़कर संन्यस्त हो समाज सुधारक की भूमिका में भी आगे आये। उन लोगों का ध्येय इस समाज को हिन्दू धर्म और समाज में एक गौरव शाली स्थान दिलाना था। संत पुरुष उमाराम, उत्तमाराम, अछ्लाराम, टीकुराम, साधू राम प्रताप और संत पुरुष गोकुलदास जैसे अनगिनत लोग थे। जो धर्म के द्वारा मेघवालों की मुक्ति की वकालात करते थे। इन में से कई लोग ' बेगारी-उन्मूलन' और 'खुली-बंदी' के आन्दोलन से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे। इन का प्रभाव अपने-अपने क्षेत्रों में था। गोकुल दास जी का कार्य क्षेत्र अजमेर और अजमेर से इत्तर भीलवाडा और मध्य प्रदेश की सीमाओं में था। मारवाड़ में टीकुराम जी, अछ्लाराम जी और अन्य लोगों का था। इन सब के धार्मिक विचार एक आन्दोलन के शक्ल में देखें तो मोटे रूप में तीन भागों में बाँट सकते है- वैदिक कर्म-कांडी, आर्य-समाजी और महाधर्मी। जिन का आग्रह वेद धर्म पर था वे हिन्दू धर्म की आलोचना करते हुए भी अद्वैत धारणाओं पर अवलम्बित थे। जिनका आग्रह आर्य-समाज की स्थापनाओं से जुडा था, वे दयानंद के शुद्धि के पक्षधर थे और महाधर्मी की पतवार और प्रमाण बाबा रामदेव, भरथरी, कबीर और ऐसे ही संत पुरुषों की वाणियाँ, वचन और साखी थे। उन सब में एक समान बात यह थी कि ये सभी स्वतंत्रता के समय से मेघवालों का एक 'नया-समाज' निर्मित करना चाहते थे, जो सवर्ण हिन्दुओं के मुकाबले में किसी से कम नहीं हो। निश्चित रूप से इन लोगों में इस समाज को सामाजिक स्तर पर ऊपर उठाने की और प्रतिष्ठित करने की ललक थी, परन्तु हिन्दू पुनर्जागरण के थपेड़ों में संस्कृतिकरण की भेंट चढ़ गए। इनका प्रचार और प्रभाव व्यक्तिगत चेलों की मंडली पर टिका था, जो अधिकांशतः गृहस्थ थे। मेघवालों की पंचायतों की पहुँच से ज्यादा इनका कोइ इनका संगठन नहीं बन सका। इस कमी को देखते हुए पिछले कुछ दशकों में हिन्दू धर्म के वैदिक प्रचार ने उसे ब्राह्मणवादी चोगा पहना कर नया रूप देना प्रारंभ किया है। इस अवसर पर इस से अधिक इस पर कहना प्रासंगिक नहीं है, पर मेघों की चेतना में इन साधु-संतों ने जो मार्ग दर्शन और योगदान दिया, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।
                हमारा समाज सबल नहीं है, यह जानते हुए हमारे लोगों को हर एक रोजगार में प्रविष्ट होना चाहिये। रोजगार से सामाजिक सुरक्षा मिलती है। सरकार की किसी भी तरह की नौकरी हो, उस में अधिक से अधिक आना चाहिए। प्रथम विश्व युद्ध में हमारे समाज के काफी लोग सेना में भर्ती हुए। उन्होंने उन्नति की। दूसरे विश्व युद्ध में भी काफी तादाद में मेघ लोग सेना में भर्ती हुए और भारत की जीत हुई और देश की आजादी सुनिश्चित हुई। मेरे परिवार से, मेरे ननिहाल से 4-5 लोग थे, जो दूसरे विश्व युद्ध में फ़्रांस, जर्मनी, अफ्रीका और जापान के बोर्डर पर युद्धरत रहे। ऐसे कई लोग थे, जिन्होंने देश पर कुर्बानियां दी। आज उन सबका संकलन और लेखा-जोखा हमारे पास नहीं है। हमारी आने वाली पीढ़ी के सामने हमारे समाज के ऐसे-ऐसे गौरव के स्वरुप रखने चाहिए, ताकि वे साहस के साथ खड़े हो सके और प्रगति कर सके। सेना की नौकरी बड़े सम्मान की नौकरी है। उस में हमारे लोगों को अधिकाधिक जाना चाहिए। जो लोग मेधावी है, उन्हें प्रशासन और अन्य नौकरियों में आना चाहिए। इतने विशाल समाज में अब तक डॉक्टरों और इंजीनियरों के अपने अस्पताल और संस्थान खुल जाने चाहिए परन्तु वे ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते है। किसी भी समाज की समृद्धि ऐसे संस्थानों या उपक्रमों से ही नापी जाती है कि उस समाज के द्वारा कितने शिक्षण संस्थान, कितने अस्पताल और अन्य जन-उपयोगी संस्थाएं संचालित की जा रही है। आज हम लोग सबसे नीचे है फिर भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति की कलह में संख्या बल से बहुत है। जाति-भेद और गुण-भेद की दुर्भावना के साथ कई बार हम लोग हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के फसादों में भी पीसे जाते है। अगर हम लोग अपना सबल संगठन बना देते है, संघ शक्ति का निर्माण कर लेते है तो हम जो चाहे हमें वही मिलेगा।


अंत मैं हमारे मुक्तिदाता परम पूजनीय बाबा साहेब के शब्दों को दोहराते हुए अपनी बात को विराम दूंगा। वे कहते है-
"अपना समाज आज पूरी तरह से पिछड़ा है। पैसे से पिछड़ा हुआ है। मन की सामर्थ्य से पिछड़ा हुआ है। जिस समाज के लोगों को राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक असमानता तथा अन्याय से बेहद परेशानी हो रही है, जिन सभी लोगों को अज्ञानता और मूढ़ता ने घेर रखा है, जिन्हें मुसीबत में यातनाएं बर्दाश्त करनी पड़ती है और उस से मुक्ति के लिए जिनके पास कोई रास्ता नहीं है, जिन लोगों की  फ़िलहाल चारों और चल रहे संघर्ष में स्थिति क्या होगी, यह बताना बहुत ही मुश्किल है। इसके लिए हम में से जिन लोगों को इस स्थिति के बारे में ज्ञान हो, उन्हें इस जीवन-कलह में अपने समाज को पार कराने के लिए दिन-रात बिना किसी अपेक्षा के काम करना चाहिए। जो लोग इस तरह की बातों को जानते हुए भी निष्क्रिय रहेंगे उनके माथे पर अपने उत्पीडित भाईयों को इस नामुराद स्थिति में पहुँचाने की और उनका विनाश करने की जिम्मेदारी रहेगी। इसलिए पढ़े-लिखे भाईयो! यदि आपको अन्य लोगों की ओर से और आने वाली संतानों की और से प्रशंसित होना हो या आज आपकी जो स्थिति है, उसे समाप्त करके अपने बच्चों और पोते-पोतियों की स्थिति सुधारनी हो, यदि आपकी वास्तव में ऐसी इच्छा हो तो जिन दुरावास्थाओं और दुराचारों ने हमारे लोगों की बुद्धि का, सफलता का सत्यानाश करवाया है, उनकी क्षमता ही समाप्त कर देना आपकी जिम्मेदारी है। और यह काम हम लोगों को करना चाहिए। इतना कहकर मैं आपसे विदा लेना चाहता हूँ। Tararam Gautam