बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

राजस्थान मे मेघवाल पर लगे ढेड और भाम्बी शब्द क्या है इसके पिछे क्या कारण है। कुछ इतिहासिक तथ्य

राजस्थान मे मेघवाल पर लगे ढेड और भाम्बी शब्द क्या है और यह नाम किसने दिए और क्यु दिए इसके पिछे क्या कारण है।

प्रत्क्रियाओ से स्पस्ट होता है कि इसमें कुछ न कुछ दफन है। एक प्राचीन पुस्तक है उसका नाम है- "The 

Dheds" 


मारवाड़ मर्दुमशुमारी में भी इसको अर्थाया गया है। गोकुल दस जी ने भी इनका अर्थ किया या लिखा।


Tararam Gautam आज यह शब्द अपमानजनक माना जाता है,परन्तु सद्य प्राचीन काल में कई जातियों 

का सूचक शब्द था। जिन्हें sc/st में शुमार किया। राजस्थान की sc की लिस्ट में 17 नंबर पर यह शब्द। ढेढ़ 

1971 के बाद withdraw।

Sharvan Meghwal Lakhani भाम्बी शब्द बहुत समानजनक है पर मनुवादियो को इस शब्द घृणित बना

 डाला

महात्मा बुद्ध के समय पालि भाषा बोली जाती थी ।

पालि भाषा की लिपि बम्भी थी । सम्राट अशोक ने धम्मलिपी का समान दिया था ।

ब्रह्मण लोग इस बम्भी लिपि वाली पालि भाषा से बहुत नफरत करते थे ।

ओर इस भाषा को बोलने वाले लोगो को हेय दृष्टी से देखा जाता था और घृणा वश उनको बम्भी कहा जाता था 

जो आज तक चला आ रहा है


भाम्बी शब्द मेघवँश के राजकाल इसवी सन् 150 से लेकर करीब 300 इशवी तक जो भाषा प्रचलित
 थी 
- जिनके कई शिला लेख भारतीय पुरातन विभाग ने खोज निकाले है - उस भाषा को " बाम्भी " कहते थे 

| यह मेघो की मूल प्राचीन भाषाथी जिससे भाम्बी कहलाये | ओर ढेड नाम का प्रचलन करीब 12 वी 

शताबदी ते आसपास सामन्ति ठाकुरो ने प्रचलित किया था ढेड का अर्थ मुर्ख होता है - उस समय मेघो 

ने सामन्ति ठाकुरो की बैठ बेगारी हाली प्रथा से पिछडे होने के कारण उनको जातीय अपशब्द के रूप मे 

यह घ्रणिय नाम ( ढेड ) शब्द प्रयोग किया था परन्तु ध्यान रहै .......... आधुनिक भारतीय सविधान

 निमार्ण के बाद आजाद भारत मे इस घ्रणित जातीय शब्द का प्रयोग करना - सवैधानिक दण्डनिय 

अपराध है अत: कोई भी निबुदि जन मुर्खता से मखोलता पूर्वक यह शब्द का प्रयोग करता है तो उनके 

खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो सकती है मध्यकालीन सामन्तकाल मे जब धार्मिक खेचातान थी - तब 

मेघो ने अपनी अध्यात्मधारा को मेघ महाधर्म सिध्दो की परमपरा से सजोये रखा - उन्होनो ब्राहमणी

 वैदिक पदति को नही माना - वे अलख उपासी थे | तब सर्वण जाती के लोगो ने एक ओखाणा प्रचलित

 किया कि | डरता ढेड बैगार सु ,लियो भेख रो आलो | अलख नाम सत है , झुठो नाम है मोलो || कबीर ने 
उनको कडा जवाब देते हुए कहा था यह तन ढुँडी रूप है ,इणमे रहे सो ढेड | आसक्ति तन मे रहे , ढुँडे सो 

ही ढेड || कह कबीर सुनो भाई साधो - एक शब्द रो भेद | ढेड शब्द रो अर्थ ना , जाणै वे भादु है लेड ||

Tararam Gautam ऊपर एक अत्यंत पिछड़ी जाति के एक प्रतिभावान ने क्या खूब कही-"सतजुग 

में 
रिखिया---रोफल मांडी।" क्या यह इनके प्रतिकार आन्दोलन को बयाँ नहीं करता। मारवाड़ी में रोफल 

का अर्थ"विद्रोह या प्रतिकार" भी होता है। दूसरा यह स्पस्ट है की इंद्रा के सत्तासीन होने तक उनका यह 

आन्दोलन जीवंत था। thanks mr suthar for the valuable information . चलते - चलते इस 

पर भी विचार कर ले-

"छौळणििया सेल़ा फिरे, मत बांध भरम री पाळ।

जादम सूं हेत मिलियो, छबिसों कर दिया कंगाळ।"


प्रश्न यह है कि यह तथाकथित मध्य वर्ग आपके साथ होने के बजाय अधिकार संपन्न वर्ग के साथ 

क्यों खड़ा होता हुआ दिखता है। इसकी पड़ताल करने पर कई रहस्योद्घाटन होते है। उन सब पर चर्चा 

अपेक्षित नहीं। एक उदहारण देकर में इसके समाज मनोविज्ञान पर डॉ बाबा साहेब के मतानुसार 

विचार रखूँगा।

मारवाड़ में एक पीछड़ी जाति है जिसे सुथार या खाती भी कहते है। रियासत काल में खातियों की 


औरतों को नाक बिन्दाने का अधिकार नहीं था। वे नाक नहीं बिन्दाती थी। पांव में चांदी की सांटे और 

हाथ में बाजूबंद नहीं पहन सकती थी। वे कलियों का घाघरा भी नहीं पहन सकती थी, जबकि मारवाड़ 

में 
मेघवाल औरत के पहनावे में ये आम प्रचलित था। सांटे या कड़ियाँ तथा बाजूबंद या चूड़े के बिना उनके 

विवाह की रस्म "समेला-पडला" भी नहीं होता था। कलीदार घाघरा मारवाड़ में मेघवालों के अलावा 

राजपूत और कुछ गिनी-चुनी जातियों का पहरावा था।

ओढ़ने-पहनने में इतना भेद् क्यो रहा? इस पर उनका विचार या मंथन नहीं जायेगा, बल्कि किसी 

मेघवाल की उन्नति देखेगा तो उसमे यह भावना जागृत होगी कि विगत में ये लोग निम्न जाती में थे 

अब पढ़ लिखकर हमारी जाति-स्तर से ऊपर नहीं उठ जाय और हिन्दू समाज उनको हमारी जाति से

 ऊँचा नहीं मान ले। इस तरह के विविध विचार ऐसी मध्य जातियों के मानस शास्त्र को घेरे रहते है।

 उनका ध्यान अन्याय परक व्यवस्था की ओर नहीं जाकर निराशा की ओर हो जाता है और वे आपके 

साथी बनने के बजाय आपके आन्दोलन में रोड़ा बनते है।


डॉ आंबेडकर इसे इन वर्गों की नासमझी या अज्ञानता कहते है। और यह बात मैं सत्य या तथ्यपरक 


इसलिए मनाता हूँ कि सुथार और सुथारों जैसी कई जातियां दूसरे प्रदेशों में sc में है, जहाँ उन्हें sc का

 फायदा मिलता है। तो उन्हें उस हेतु sc के साथ होकर काम करना चाहिए, परन्तु विरोध में करते है। 

इसका मनोविज्ञान यह है कि ये ब्राह्मणेत्तर समाजों के लोग अंधी परंपरा के वजह से छुआ-छूत बुरा है 

या अच्छा, अछुत्प्पन भोगी लोगों के मुद्दे ठीक है या गलत यह नहीं सोचते हूए, उनके साथ हमदर्दी न 

रखते हुए वे अपने झूठे बड्डपन के फरेब में आपके विपरीत खड़े हो जाते है। अनाचारी लोग अछूतपन 

को बुरा मानते है। लेकिन सूने बड्डपन के कारण स्वार्थ में फंसकर अपने ही विचारों के अनुकूल 

आचरण नहीं करते। उन्हें मालूम होते हुए भी अंधी परंपरा और स्वार्थ की वजह से आपकी बातों का उन 

पर असर नहीं होता। वे इसी मिथ्या के कारण आपकी पोस्टों पर भी उट-पटांग लिखते है।

आपको इससे विचलित नहीं होना चाहिए। जो वे कहते या लिखते है, उसे ही अपनी ताकत बनाये और 

साथ ही उनको राह पर लाऩे के लिए उपाय भी सोचने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण उपाय यह हो सकता है

 कि ऐसे अज्ञानी लोगों को सोच-विचार के लिए मजबूर करे। यह एकदम नहीं हो सकता है। हमेशा 

जिस रास्ते पर चले है, उसे बाधाजन्य बनाये वगेर आप यह नहीं कर सकते। जिस प्रकार से वे आपके 

मार्ग में बाधा बनते है वैसे ही आपको भी बाधक बनना पड़ेगा। दूसरा कोई चारा नहीं।


इस मनोविज्ञान का कारण आप ऐसे समझे- अछूतपन की परंपरा या जाति-पांति का भेदभाव वह 


रास्ता है, जिस पर शदियों से हिन्दू समाज की विभीन्न जातियां चलती रही है। आप इस बात को 

भलीभांति अपने अनुभव से जान सकते है कि किसी भी प्रचलित रास्ते के परंपरागत होने के कारण 

उस रास्ते पर चलने वाला यात्री आँख मूंद कर उस रस्ते पर चल देगा। वह सीधा और सरल लगता है,

 उसे दूसरों से भी पूछने की जरुरत नहीं होती है परन्तु जब उसी रस्ते में कोई बाधा आ जाए यथा उसी 

रस्ते से कई रास्ते निकलते हुए दिखते हो तो वह रुक जायेगा, हड़बड़ा जायेगा और वह यह सोचने के 

लिए मजबूर होगा कि इनमें से कौनसा रास्ता उसे सही गन्तव्य स्थान पर पहुंचाएगा। इससे साफ है 

कि तब तक कोई भी आदमी अपने परंपरागत रास्ते के भले बुरे के सोचने के लिए तैयार नहीं होगा ,

 जब तक उसमे बाधा न हो?

Megs. Connected with the Takkas by a similar inferiority of social position is the

 tribe of Megs, who form a large part of the population of Riyasi, Jammu, and 

Aknur. According to the annals of the Jammu Rajas, the ancestors of Gulab

 Singh were two Rajput brothers, who, after the defeat of Prithi Raj, settled on the 

bank of the Tohi or Tohvi River amongst the poor race of cultivators called Megs.

 Mr. Gardner calls them " a poor race of low caste," but more numerous than the 

Takkas.t In another place he ranges them amongst the lowest class of outcasts ; 

but this is quite contrary to my information, and is besides inconsis tent with his

 own description of them as " cultivators." They are but little inferior, if not equal, 

to Takkas. I have failed in tracing their name in the middle ages, but I believe that 

we safely identify them with the Mekei of Aryan, who inhabited the banks of the

 River Saranges near its confluence with the Hydraotes.J This river has not yet 

been identified with certainty, but as it is mentioned immediately after the

 Hyphasis or Bias, it should be the same as the Satlaj. In Sauskrit the Satlaj is 

called Satadru, or the " hundred channeled," a name which is fairly represented 

by Ptolemy's Zaradrus, and also by Pliny's Hesidrus, as the Sanskrit Sata 

becomes Hata in many of the W. Dialects. In its upper course the commonest 

name is Satrudr or Satudr, a spoken form of Satudra, which is only a corrup tion 

of the Sanskrit Satadru. By many Brahmans, how ever, Satudra is considered to

 be the proper name, although from the meaning which they give to it of " 

hundred- bellied," the correct form would be Satodra. Now Arrian's Saranges is

 evidently connected with these various readings, as Satdnga means the '* 

hundred divisions," or " hundred parts," in allusion to the numerous channels 

which the Satlaj takes just as it leaves the hills. According to this identification

 the Mekei, or ancient Megs, must have in habited the banks of the Satlaj at the

 time of Alexander's invasion. In confirmation of this position, I can cite the name 

of Megarsus, which Dionysius Periegetes gives to the Satlaj, along with the 

epithets of great and rapid.* This name is changed to Cymander by Aoienus, but

 as Priscian preserves it unaltered, it seems probable that we ought to read 

Mycander, which would assimilate it with the original name of Dionysius. But 

whatever may be the true reading of Avienus, it is most probable that we have 

the name of the Meg tribe preserved in the Megarsus River of Dionysius. On 

comparing the two names together, I think it possible that the original reading

 may have been Megandros, which would be equivalent to the Sanskrit Megadru,

 or river of the Megs. Now in this very part of the Satlaj, where the river leaves the

 hills, we find the important town of Makhowdl, the town of the Makh or Magh 

tribe, an inferior class of cultivators, who claim descent from Raja Mukh- tesar, a 

Sarsuti Brahman and King of Mecca ! " From him sprang Sahariya, who with his 

son Sal was turned out of Arabia, and migrated to the Island of Pundri; even

 tually they reached Mahmudsar, in Barara, to the west of Bhatinda, where they 

colonised seventeen villages. Thence they were driven forth, and, after sundry 

migrations, are now settled in the districts of Patiala, Shahabad, Thanesar,

 Ambala, Mustafabad, Sadhaora, and Muzafarnagar."* From this account we learn

 that the earliest location of the Maghs was to the westward of Bhatinda, that is,

 on the banks of the Satlaj. At what period they were driven from this locality they

 know not ; but if, as seems highly pro bable, the Magiaus whom Timur 

encountered on the banks of the Jumna and Ganges were only Maghs, their eject 

ment from the banks of the Satlaj must have occurred at a comparatively early

 period. The Megs of the Chenab have a tradition that they were driven from the

 plains by the early Muhammadans, a statement which we may refer either to the

 first inroads of Mahmud, in the beginning of the eleventh century, or to the final 

occupation of Lahor by his immediate successors. 3. Other

* Orljis DcsLTi1itio, V. 1145.

• Smith's Rcv1ning Family of Lahor, p. 232, and Appendix p. xxix. In the text he 


m.'iti* the " Tukkers" Hindus, but in the Appendix he calls the " Tuk" a " brahman 

caste." The two names are, however, most probably not the same. t Ibid, pp. 232,

 201, and Appendix p. xxix.

 A Cunningham describe Meghs as under in Archaeological Survey Of India. 

Volume-2 ( four reports during the years 1862-63-64-65) pp11 to 13. Published in

 1871

Megs.

" Connected with the Takkas by a similar inferiority of social position is the tribe 


of Megs, who form a large part of the population of Riyasi, Jammu, and Aknur.

 According to the annals of the Jammu Rajas, the ancestors of Gulab Singh were

 two Rajput brothers, who, after the defeat of Prithi Raj, settled on the bank of the 

Tohi or Tohvi River amongst the poor race of cultivators called Megs. Mr. Gardner 

calls them " a poor race of low caste," but more numerous than the Takkas.t In 

another place he ranges them amongst the lowest class of outcasts ; but this is 

quite contrary to my information, and is besides inconsis tent with his own 

description of them as " cultivators." They are but little inferior, if not equal, to 

Takkas. I have failed in tracing their name in the middle ages, but I believe that we 

safely identify them with the Mekei of Aryan, who inhabited the banks of the 

River Saranges near its confluence with the Hydraotes.J This river has not yet 

been identified with certainty, but as it is mentioned immediately after the 

Hyphasis or Bias, it should be the same as the Satlaj. In Sauskrit the Satlaj is 

called Satadru, or the " hundred channeled," a name which is fairly represented 

by Ptolemy's Zaradrus, and also by Pliny's Hesidrus, as the Sanskrit Sata 

becomes Hata in many of the W. Dialects. In its upper course the commonest 

name is Satrudr or Satudr, a spoken form of Satudra, which is only a corrup tion 

of the Sanskrit Satadru. By many Brahmans, how ever, Satudra is considered to

 be the proper name, although from the meaning which they give to it of " 

hundred- bellied," the correct form would be Satodra. Now Arrian's Saranges is 

evidently connected with these various readings, as Satdnga means the '* 

hundred divisions," or " hundred parts," in allusion to the numerous channels 

which the Satlaj takes just as it leaves the hills. According to this identification 

the Mekei, or ancient Megs, must have in habited the banks of the Satlaj at the 

time of Alexander's invasion. In confirmation of this position, I can cite the name

 of Megarsus, which Dionysius Periegetes gives to the Satlaj, along with the 

epithets of great and rapid.* This name is changed to Cymander by Aoienus, but

 as Priscian preserves it unaltered, it seems probable that we ought to read 

Mycander, which would assimilate it with the original name of Dionysius. But 

whatever may be the true reading of Avienus, it is most probable that we have 

the name of the Meg tribe preserved in the Megarsus River of Dionysius. On

 comparing the two names together, I think it possible that the original reading

 may have been Megandros, which would be equivalent to the Sanskrit Megadru,

 or river of the Megs. Now in this very part of the Satlaj, where the river leaves the 

hills, we find the important town of Makhowdl, the town of the Makh or Magh 

tribe, an inferior class of cultivators, who claim descent from Raja Mukh- tesar, a 

Sarsuti Brahman and King of Mecca ! " From him sprang Sahariya, who with his 

son Sal was turned out of Arabia, and migrated to the Island of Pundri; even 

tually they reached Mahmudsar, in Barara, to the west of Bhatinda, where they 

colonised seventeen villages. Thence they were driven forth, and, after sundry 

migrations, are now settled in the districts of Patiala, Shahabad, Thanesar, 

Ambala, Mustafabad, Sadhaora, and Muzafarnagar."* From this account we learn 

that the earliest location of the Maghs was to the westward of Bhatinda, that is,

 on the banks of the Satlaj. At what period they were driven from this locality they

 know not ; but if, as seems highly pro bable, the Magiaus whom Timur 

encountered on the banks of the Jumna and Ganges were only Maghs, their 

eject ment from the banks of the Satlaj must have occurred at a comparatively 

early period. The Megs of the Chenab have a tradition that they were driven from 

the plains by the early Muhammadans, a statement which we may refer either to 

the first inroads of Mahmud, in the beginning of the eleventh century, or to the

 final occupation of Lahor by his immediate successors." 3. Other

* Orljis DcsLTi1itio, V. 1145.


• Smith's Rcv1ning Family of Lahor, p. 232, and Appendix p. xxix. In the text he


 m.'iti* the " Tukkers" Hindus, but in the Appendix he calls the " Tuk" a " brahman 

caste." The two names are, however, most probably not the same. t Ibid, pp. 232,

 201, and Appendix p. xxix.



रामसा कडेला मेघवँशी जोधपुर "दैनिक भाष्कर "'अखबार मे - 5 जुलाई 2003 पृष्ठ सॅख्या 13 मे 

देखिये -
"लुप्त हो गयी बाम्भी की परम्परा"


इस लेख से स्पष्ट है कि मध्यकालीन सामन्तकाल मे मेघो को "गाव भाँभी" के नाम से नियुक्त किया 


जाता था ।

जो गाव मे सूचना देने का सॅचार माध्यम के रुप मे नि:स्वार्थ सेवा प्रदान करते थे ।


चाहै गाव की बात हो , राजस्व सम्बन्धि सूचना हो या हाकिमो द्वारा किये गये एलान अथवा गांव पर 


आये सॅकट से अवगत करवाना हो ,

इनकी सूचना ही महत्वपूर्ण मानी जाती थी । दूर बसी ढाणियो को सूचित करने मे तो समय लगता था । 

अतः ये बाँभी हेला विधि से हर घर मे सूचना पहूचाने मे पारन्गत थे ।..........

.........परिवारो को आपस मे जोङकर समाज बनाने मे इन बाँभियो का महत्वपूर्ण योगदान रहा 



Tararam Gautam Archaeological survey of western India की जिल्द में पेज संख्या 196 

में इनके बारे में जो लिखा है,उसे नीचे हुबहू दे रहा हूँ-

"The Dheds, the lowest caste among the Hindus found in every town and village. 


From their nukhs, or family names, many of them appear to have been Origionaly 

Rajput descent, for instance, we find among solankis, chavadas, jhalas, vaghelas, 

& c. The Hindus consider themselves polluted by their touch. Their profession is 

that of weavers, cobblers, wood-splitters, and tanners. They also take the hides 

and entrails from the carcasses of dead animals. THOSE WHO SERVE AS GUIDE 

TO GOVERNMENT OFFICERS ARE ALSO CALLED MEGHVALS"

Ref: Archaeological Survey of Westen India: Report on the Antiquities of 

Kathiawad and Kuchh,1874-75. Published in 1876, India Museum, London

ऊपर रामसा के फोटो कमेन्ट के साथ इसे समझे। ढेड- हिन्दुओं में सबसे निम्न जाति, जो प्रत्येक 

कसबे और गांव में है। उनके नख या पारिवारिक नामों से प्रतीत होता है कि ये मूल राजपूतों के वंशज 

है। यथा उनमे सोलकी, चावड़ा, झाला, वाघेला और अन्य पाए जाते है। उनके छू जाने/स्पर्श हो जाने पर

 हिन्दू अपने को दूषित/ अपवित्र हुआ मनाता है। उनके व्यवसाय/धंधा में कपड़ा बुनना, जूते बनाना, 

लकड़ियो को काटना और चमडा रंगना है। मरे हुए पशुओं के शवों से खाल भी उतारते है। वे जो राज/

सरकार के अधिकारीयों के गाइड के रूप में सेवा करते है, उन्हें मेघवाल भी कहते है।

इससे यह स्पस्ट हो जाना चाहिए कि यह शब्द अंग्रेजों ने नहीं दिया। हिन्दुओं ने ही दिया। आधुनिक 

समय में अपनी झेंप मिटाने के लिए वे सचेष्ट ऐसा करते है। अंग्रेजो को इस शब्द की कैसी समझ थी, 

वह ऊपर के विवरण से स्पष्ट है।

Glossary of Indian terms में इसके बारे में निम्न विवरण मिलाता है- "Dherh- Name of a 

caste in those provinces, chiefly in the saugar territory. The name is applied to

 Bhangis and Chamars.* They eat dead animals, clean the skins, and sell them to 

chamars. In the Nagpur territory they have acquired some consideration from

 their employment as Dherhs."

"In the Deccan they are said to be the same as the Mahrs of Maharattas(journal 


of R.A.S p224) - see also the printed glossary under Dheda and Dheyr"

"In the Western Provinces, though they are now not often found in any numbers,


 they appear to have left the remembrance of their name, for it is a common term

 to call man a 'bara Dherh' or a low caste fellow"

"In Rajputana, Dherhs will not eat hogs, either tame or wild: the latter they hold in


 great abomination, not withstanding their Rajput masters look upon them as a 

luxury." Pp 80-81.
-------------------
*footnote- "this word is spelled धेड in Molesworth's Marathi Dictionary, and I think 


this is more correct then in text. But so much uncertainty exists as to the spelling 

of Hindi that, in absence of a conclave of pandits, I can't venture to decide.

 Wilson, both in "Glossary....."and "sel. works" i 186, spells it ढेढ़- "

Reference: Memoirs on the History, folk-lore and Distribution of Races of North


 Western Provinces of india" supplementary Glossary of Indian Terms. Volume- 

6, by H. M. Elliot, ed by J. Beams, London,1869. जय भीम 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

तुम्हारे भगवान की क्षय - राहुल सांकृत्यायन

ये पोस्ट मुझे बहुत अच्छा ओर प्रेरक लगा इसलिए मैं इसे अपने ब्लॉग पर ले आया -राहुल सांकृत्यायन जी को बहुत-बहुत बधाई 


तुम्हारे भगवान की क्षय

राहुल सांकृत्यायन
राहुल सांकृत्यायन सच्चे अर्थों में जनता के लेखक थे। वह आज जैसे कथित प्रगतिशील लेखकों सरीखे नहीं थे जो जनता के जीवन और संघर्षों से अलग-थलग अपने-अपने नेह-नीड़ों में बैठे कागज पर रोशनाई फि़राया करते हैं। जनता के संघर्षों का मोर्चा हो या सामंतों-जमींदारों के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ़ किसानों की लड़ाई का मोर्चा, वह हमेशा अगली कतारों में रहे। अनेक बार जेल गये। यातनाएं झेलीं। जमींदारों के गुर्गों ने उनके ऊपर कातिलाना हमला भी किया, लेकिन आजादी, बराबरी और इंसानी स्वाभिमान के लिए न तो वह कभी संघर्ष से पीछे हटे और न ही उनकी कलम रुकी।
दुनिया की छब्बीस भाषाओं के जानकार राहुल सांकृत्यायन की अद्भुत मेधा का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं, साहित्य की अनेक विधाओं में उनको महारत हासिल थी। इतिहास, दर्शन, पुरातत्व, नृतत्वशास्त्र, साहित्य, भाषा-विज्ञान आदि विषयों पर उन्होंने अधिकारपूर्वक लेखनी चलायी। दिमागी गुलामी, तुम्हारी क्षय, भागो नहीं दुनिया को बदलो, दर्शन-दिग्दर्शन, मानव समाज, वैज्ञानिक भौतिकवाद, जय यौधेय, सिंह सेनापति, दिमागी गुलामी, साम्यवाद ही क्यों, बाईसवीं सदी आदि रचनाएं उनकी महान प्रतिभा का परिचय अपने आप करा देती हैं।
राहुल जी देश की शोषित-उत्पीड़ित जनता को हर प्रकार की गुलामी से आजाद कराने के लिए कलम को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते थे। उनका मानना था कि ”साहित्यकार जनता का जबर्दस्त साथी, साथ ही वह उसका अगुआ भी है। वह सिपाही भी है और सिपहसालार भी।“
राहुल सांकृत्यायन के लिए गति जीवन का दूसरा नाम था और गतिरोध मृत्यु एवं जड़ता का। इसीलिए बनी-बनायी लीकों पर चलना उन्हें कभी गंवारा नहीं हुआ। वह नयी राहों के खोजी थे। लेकिन घुमक्कड़ी उनके लिए सिर्फ़ भूगोल की पहचान करना नहीं थी। वह सुदूर देशों की जनता के जीवन व उसकी संस्कृति से, उसकी जिजीविषा से जान-पहचान करने के लिए यात्रएं करते थे।
समाज को पीछे की ओर धकेलने वाले हर प्रकार के विचार, रूढ़ियों, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं के खिलाफ़ उनका मन गहरी नफ़रत से भरा हुआ था। उनका समूचा जीवन व लेखन इनके खिलाफ़ विद्रोह का जीता-जागता प्रमाण है। इसीलिए उन्हें महाविद्रोही भी कहा जाता है। जनता के ऐसे ही सच्चे सपूत महाविद्रोही राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तिका ‘तुम्हारी क्षय’ बिगुल के पाठकों के लिए हम धारावाहिक रूप से प्रकाशित कर रहे हैं। राहुल की यह निराली रचना आज भी हमारे समाज में प्रचलित रूढ़ियों के खिलाफ़ समझौताहीन संघर्ष की ललकार है।       -सम्पादक
लड़का माँ के पेट से ईश्वर का खयाल लेकर नहीं निकलता। भूत, प्रेत तथा दूसरे संस्कारों की तरह ईश्वर का खयाल भी लड़के को माँ-बाप तथा आसपास के सामाजिक वातावरण से मिलता है। दुनिया के धर्मों में बौद्धधर्म के अनुयायी अब भी सबसे ज्यादा हैं, लेकिन उनके दिल में सृष्टिकर्त्ता का खयाल भी नहीं उठता। रूस की नब्बे फीसदी जनता भी ईश्वर के फन्दे से दूर हट चुकी है और अब कुछ बूढ़ों को छोड़कर यह खयाल किसी को नहीं सताता। यह निश्चय है कि आज के बूढ़ों के मर जाने पर ईश्वर का नामलेवा वहाँ कोई नहीं रह जायेगा। हिन्दुस्तान में प्रार्थना-प्रदर्शनों और हरि-कीर्तनों को देखकर कुछ लोग समझते हैं कि ईश्वर का खयाल फिर से जोर पकड़ रहा है। उन्हें मालूम नहीं कि जिन लोगों में ईश्वर-विश्वास है भी, उनमें भी अब उसकी व्यापकता बहुत कम हो गयी है।
जिस समस्या, जिस प्रश्न, जिस प्राकृतिक रहस्य को जानने में आदमी अपने को असमर्थ समझता था, उसी के लिए वह ईश्वर का खयाल कर लेता था। दरअसल ईश्वर का खयाल है भी तो अन्धकार की उपज। प्रारम्भिक मनुष्य जब घर बनाकर नहीं रहता था, अपनी रक्षा के लिए जब उसके पास कुछ अनगढ़ पत्थरों के अतिरिक्त कुछ न था और साथ ही उस वक्त सारी भूमि जंगल से भरी थी जिसमें सिंह, बाघ, हाथी, भेड़िया आदि बड़े-बड़े हिंस्र पशु घूमा करते थे। दिन में भी वृक्षों के ऊपर चढ़कर, गुफाओं के भीतर छिपकर, बहुत सजग रहकर वह किसी तरह अपनी जान को बचाता था। अँधेरे में अपनी ताक में बैठे जन्तुओं का डर तो उसे बदहवास किये रहता था। इस प्रकार, वह अन्धकार प्राकृतिक मनुष्य के आज तक भय का कारण बना हुआ है। हाँ, जब आगे चलकर मनुष्य ने भाषा का विकास किया, विचारों को प्रकट करने के लिए उसके पास कुछ शब्दकोश बना और जब हर पीढ़ी अपने अनुभवों की कटु स्मृतियों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने लगी तो वास्तविक की अपेक्षा कल्पना-जात भय की संख्या बहुत बढ़ गयी। जीवन भर अपने बलिष्ठ शासक और नेता से मनुष्य थर-थर काँपता था। वह अपने आश्रितों के साथ बात की अपेक्षा लात से ही काम लेता था। इस साधारण शिक्षा-दीक्षा में कितने काने, कितने लँगड़े हो जाते और कितने जान से हाथ धो बैठते थे। ऐसे निर्दय स्वामी और मुखिया का भय उसके मरने के बाद भी लोगों के दिल से नहीं हटता था। मरने के बाद उसे वे अपनी बस्तियों में किसी वृक्ष पर या किसी चबूतरे पर अधिष्ठित मानने लगते थे। अँधेरा होने पर किसी वक्त उसके प्रकट होने का डर था। अज्ञात भय ने इस प्रकार देवता का रूप धारण किया। और ये ही विचार आगे चलकर महान देवता (महादेव) या ईश्वर के रूप में परिणत हुए।
प्रारम्भिक मनुष्य का मानसिक विकास अभी निम्न तल पर था। उसकी शंकाएँ हल्की और समाधान सरल थे। वर्षा क्यों होती है? पर्जन्य देवता के नेतृत्व में मेघ-समूह किसी जलाशय या पहाड़ में चरने जाते हैं, वे वहाँ से पानी लेकर पर्जन्य के आज्ञानुसार जगह-जगह बरसाते हैं। इन्द्र पर्जन्य का स्वामी है। वह कभी-कभी वज्र को चलाकर अपना रोष प्रकट करता है। यही अशनि या बिजली है। पहाड़ों की आकृति को मेघ से मिलते-जुलते देखकर उस समय लोग समझते थे ये पहाड़ ही हैं जो आकाश में मेघ के रूप में उड़ रहे हैं। उनके विश्वास में पर्वतों के पर भी होते थे जिन्हें इन्द्र ने नाराज होकर किसी समय अपने वज्र से काट दिया। प्रातःकाल पूर्व दिशा में पौ फटने के साथ लाली क्यों छा जाती है? यह उषा, स्वर्ग की देवी का प्रताप है। उस वक्त सूर्य अपने प्रखर प्रकाश के कारण प्रचण्ड देवता था और वह सात घोड़ों के रथ पर त्रिभुवन की यात्रा के लिए निकलता था। आग के पास बड़े-बड़े हिंस्र पशु नहीं आ सकते। प्रकाण्ड वृक्षों और महान (ब्रह्म) जंगलों को यह धाँय-धाँय करके जला देती है। इसलिए अग्नि प्रत्यक्ष था, उसी को वे प्रत्यक्ष महान कहते थे। नदी, समुद्र सभी उस मनुष्य के लिए देवता थे क्योंकि उनमें वे अमानुषिक (दिव्य) शक्ति पाते थे, नाश करने की भीषण योग्यता देखते थे। उनमें ऐसे-ऐसे अद्भुत रहस्य उन्हें दिखलायी पड़ते थे जिनकी गुत्थी को वह देवता की कल्पना से ही सुलझा सकते थे। मनुष्य ने प्राकृतिक शक्तियों में बहुदेववाद को अपने ज्ञान की सीमा के बहुत संकुचित होने के कारण स्वीकार किया था। अब हम जानते हैं कि बादल कैसे बनते हैं, कैसे बरसते हैं, कहाँ से किधर की यात्रा करते हैं। कौन-कौन से देश उनकी यात्रा-मार्ग में पड़ते हैं और कौन से दूर। बिजली बादलों में क्यों कर पैदा होती है? कड़क क्या है? सूर्य अब हमारे लिए घोड़ों के रथ का सवार नहीं रहा और न उसका वह गोल मुँह, दो आँखों और काली मूँछों वाला चेहरा ही रहा। उसकी यात्रा भी अब वह पहले वाली यात्रा नहीं रही, उषा देवी अब सूर्य की निम्नतर लाल किरण के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आरम्भिक मनुष्य के लिए सूर्य आकाश का सबसे बड़ा विशाल और तेजस्वी देवता था। अब हम जानते हैं कि आकाश में चमकते हुए ये छोटे-छोटे तेजो बिन्दु उतने छोटे नहीं हैं जितने कि वे हमें दिखलायी पड़ते हैं। उनमें से अधिकांश हमारे सूर्य से भी लाखों गुने बड़े और तेजस्वी हैं। आकाश को अनन्त कहकर पूर्वजों ने उसके विस्तार का एक अन्दाजा लगा लिया था, लेकिन वह अत्यन्त वास्तविकता की भित्ति पर न होकर अधिकतर अज्ञान के आधार पर आश्रित था। प्रकाश की गति प्रति सेकेण्ड एक लाख अस्सी हजार मील है। आज तक जो तारा हमसे सबसे नजदीक मालूम हुआ है; वह इतनी दूर है कि उसकी किरण को हम तक पहुँचने में ढाई बरस लगते हैं। ध्रुव तारा हमसे बहुत दूर नहीं है, तो भी उसके जिस रूप को हम इस वक्त देख रहे हैं, वह आज से पचास बरस पहले का है। दस-दस बीस-बीस हजार बरस में अपनी किरणों को हम तक पहुँचाने वाले तारों की भारी संख्या से हमें आश्चर्य करने की जरूरत नहीं। नक्षत्र-मण्डल में ऐसे भी तारे हैं जिनकी दूरी को किरणों की यात्रा के वर्षों की संख्या में बतलाना मुश्किल है। तारों, खगोल और प्राकृतिक जगत्-सम्बन्ध की अपनी इस अज्ञानता को मनुष्य देवता और ईश्वर की आड़ में छिपाता था।
राहुल फाउण्‍डेशन, लखनऊ द्वारा राहुल का ये संकलन एक पुस्तिका की शक्‍ल में भी प्रकाशित हुआ है जिसे इस लिंक से खरीदा जा सकता है –http://janchetnabooks.org/product/tumhari-kshay/
भूकम्प क्यों होता है? चिपटी धरती के महान भार को शेषनाग ने अपने कन्धे पर उठा रखा है। थककर वे जब उसे एक कन्धे से हटाकर दूसरे पर रखते हैं, तब भूकम्प आता है। आज कौन इस व्याख्या को मान सकता है? कौन चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण को राहु दैत्य का अत्याचार बतला सकता है? लेकिन किसी समय हमारे पूर्वजों के लिए ये बातें ध्रुव सत्य थीं। विज्ञान ने हमारे अज्ञान की सीमा को कितनी ही दिशाओं में बहुत संकुचित किया है; और, जितनी ही दूर तक हमारे ज्ञान की सीमा बढ़ती गयी, वहाँ से ईश्वर और देवता वाला उत्तर हटता गया है। अब भी अज्ञान का क्षेत्र बहुत लम्बा-चौड़ा है, लेकिन आज के मनीषी उसे साफ अज्ञान के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, न कि ईश्वर और देवता के पर्दे में उसे छिपाकर।
धर्मों, भाषाओं और कथानकों के तुलनात्मक अध्ययन से मालूम होता है कि सृष्टिकर्ता एक ईश्वर का खयाल मनुष्य में बहुत पीछे से आया है। दुनिया की सबसे अधिक समुन्नत जातियाँ – यूनानी, रोमन, हिन्दू, चीनी, मिड्डी आदि तो अपनी समृद्धि के मध्याह्नकाल तक इसे अपनाने के लिए तैयार नहीं हुईं; और उनमें से यदि किसी ने इस खयाल को माना भी तो सामीय धर्मवालों की तरह वैयक्तिक ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि विश्व-रूप ईश्वर के आकार में।
अज्ञान का दूसरा नाम ही ईश्वर है। हम अपने अज्ञान को साफ स्वीकार करने में शर्माते हैं, अतः उसके लिए सम्भ्रान्त नाम ‘ईश्वर’ ढूँढ़ निकाला गया है। ईश्वर-विश्वास का दूसरा कारण मनुष्य की असमर्थता और बेबसी है।
आये दिन हर तरह की विपत्तियों, प्राकृतिक दुर्घटनाओं, शारीरिक और मानसिक बीमारियों की असह्य वेदना सहते-सहते जब मनुष्य बचने का कोई रास्ता नहीं देखता, तब यह कहकर सन्तोष करना चाहता है कि ईश्वर की यही मर्जी है; वह जो कुछ करता है, अच्छा करता है; वह हमारी परीक्षा ले रहा है, भविष्य के सुख को और भी मधुर बनाने के लिए उसने यह प्रबन्ध किया है। अज्ञान और असमर्थता के अतिरिक्त यदि कोई और भी आधार ईश्वर-विश्वास के लिए है, तो वह है धनिकों और धूर्तों की अपनी स्वार्थ-रक्षा का प्रयास। समाज में होते हजारों अत्याचारों और अन्यायों को वैध साबित करने के लिए उन्होंने ईश्वर का बहाना ढूँढ़ निकाला है। धर्म की धोखाधड़ी को चलाने और उसे न्याय साबित करने के लिए ईश्वर का खयाल बहुत सहायक है। इस सम्बन्ध में धर्म के प्रकरण में हम कुछ कह आये हैं, इसलिए फिर से उसे यहाँ दुहराने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती।
ईश्वर का विश्वास एक छोटे बच्चे के भोले-भाले विश्वास से बढ़कर कुछ नहीं है। अन्तर इतना ही है कि छोटे बच्चे का शब्दकोष, दृष्टान्त और तर्कशैली सीमित होती है और बड़ों की कुछ विकसित। बस, इसी विशेषता का फर्क हम दोनों में पाते हैं। एक बार, तीन छोटे-छोटे बच्चों ने मुझसे ईश्वर के सम्बन्ध में बातचीत की। उनकी उमर सात और दस बरस के बीच की थी। पूछा कि ईश्वर कहाँ रहता है, उत्तर मिला – ‘आकाश में?’ धरती में कहने से प्रत्यक्ष दिखलाने की जरूरत पड़ती, क्योंकि धरती प्रत्यक्ष की सीमा के भीतर है। आकाश अज्ञान की सीमा के अन्तर्गत है, इसलिए वहाँ उसका अस्तित्व अधिक सुरक्षित है। ईश्वर के रंग-रूप के बारे में लड़कों का एक मत न था। कोई उसे अपनी शक्ल का बतलाते थे और कोई विचित्र शक्ल का। “ईश्वर क्या करता है?” – यह सबसे मुख्य प्रश्न था। इसे लड़के भी अनुभव करते थे, क्योंकि जिस वस्तु का आकार प्रत्यक्ष नहीं होता, उसकी सत्ता उसकी क्रिया से सिद्ध हो सकती है। लड़कों ने कहा – “वह हमें भोजन देता है।” “और तुम्हारे बाबूजी?” – “बाबूजी को ईश्वर देता है।”
“जिस दिन बाबूजी कचहरी में वकालत करने नहीं जाते, उस दिन क्यों नहीं उनके जेब में रुपये आ जाते?” लड़कों को समाज के दुरूह संगठन का उतना पता नहीं होता और जुए के खेल की तरह किस तरह वास्तविक न्याय न करके सौ रुपये को हराकर दो को जिताया जाता है, इसका भी उन्हें पता नहीं। इसलिए उन्होंने उस तरह के प्रश्नोत्तर नहीं उठाये। हाँ, उन्हें यह मालूम हो गया कि जहाँ तक खाने-कपड़े, मकान, खेल-तमाशे में खर्च देने का सवाल है, उसका हल माता-पिता और अभिभावकों द्वारा ही होता है। वहाँ ईश्वर की सहायता सन्दिग्ध-सी जान पड़ती है। लेकिन, जब उससे पूछा गया – “तुम्हें सिरदर्द कौन देता है – माँ-बाप या सगे-सम्बन्धी?” – वे तो विह्नल हो जाते हैं, अम्मा और बाबूजी क्यों ऐसा चाहेंगे?” वहाँ ईश्वर का हाथ होना उन्हें आसानी से स्वीकार कराया जा सका।
“और पेटदर्द?” – ईश्वर देता है।
“यक्ष्मा से घुला-घुलाकर तुम्हारे पड़ोसी को किसने मारा?” – “ईश्वर।”
“सात दिन के बच्चे की माँ को मारकर कौन उसे अनाथ करता है?” – “ईश्वर।”
“माँ के एकलौते बच्चे को मारकर कौन उसे ऐसा विलाप करने को मजबूर करता है जिसे सुनकर पशु-पक्षी और पत्थर तक का हृदय पिघल जाता है?” – “ईश्वर।”
“चैत-वैशाख के दिनों में एक-एक आम के ऊपर दस-दस करोड़ कीड़ों को सिर्फ धूप और हवा में मरने का मजा चखने के लिए कौन पैदा करता है? कौन बरसात के दिनों में धरती पर असंख्य मच्छरों, कीड़ों-मकोड़ों को तड़प-तड़पकर मरने के लिए पैदा करके अपनी असीम दया का परिचय देता है?” – “ईश्वर।”
“तब तो उसमें दया बिल्कुल नहीं। उतनी भी दया नहीं, जितनी कि क्रूर से क्रूर आदमी में सम्भव हो सकती है। रोते-तड़पते बच्चे को देखकर पत्थर का दिल भी पिघल जाता है। तुम भी उसकी माँ को उस दिन नन्हे बच्चे के मरने पर रोती देखकर अफसोस करते थे कि नहीं?”
“मैं भी रो रहा था। कैसा सुन्दर लड़का, उसका गोल-मटोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें और बिना दँतुली के मुँह के हँसते वक्त बालों में पड़े गड्ढे अब भी बड़े सुन्दर याद आते हैं।”
“ऐसे बच्चे को मारने वाला कौन – आदमी या राक्षस?” – “राक्षस से भी खराब।”
हाँ, दुनिया में प्राणियों के सुख की घड़ियाँ कम और दुःख की अधिक हैं। एक मच्छरों की ही योनि ले ली जाये, तो उसकी संख्या शंख-महाशंख से भी ऊपर चली जायेगी और इस तरह की योनियाँ भी हमारी इस पृथ्वी पर अरबों होंगी। अत्यन्त छोटे, दूरबीन से दिखायी देने वाले कीड़े से लेकर समुद्र की विशाल मछलियों तक अरबों योनियाँ हैं। उनमें अधिकांश शंख-महाशंख तक प्राणी अपने में रखती हैं। कहा जाता है कि जो मनुष्य यहाँ, इस लोक में, निकृष्ट कर्म करता है, वही परलोक या परजन्म में इन निकृष्ट योनियों में, दण्ड पाने के लिए पैदा होता है; पर यह बात टिकती नहीं, क्योंकि इस पृथ्वी पर मनुष्य की सारी संख्या डेढ़ अरब के ही आस-पास है। फिर डेढ़ अरब मनुष्यों के पुरबीले कर्म को भोगने के लिए इतनी अधिक संख्या में जीव कैसे पैदा हो सकते हैं? ईश्वर ने इन असंख्य जीवों को सिर्फ यन्त्रणा और कष्ट के लिए पैदा करके क्या अपनी कृपा का परिचय दिया है? इन्साफ तो उसमें छू नहीं गया, बल्कि उसके इस कर्म से तो यही पता लगता है कि उससे बढ़कर जालिम और पाषाण-हृदय दुनिया में और कहीं नहीं मिल सकता। शेर भी हिरण का शिकार करता है, अपनी भूख को दूर करने के लिए; छिपकली पतिंगे को दबोचती है, पेट भरने के लिए। सभी जीवधारी दूसरे जीव को आत्मरक्षा और जीवन-धारण के लिए मारते हैं। भरसक तड़पा-तड़पाकर मारना भी पसन्द नहीं करते! लेकिन ईश्वर जिनको मारता है, क्या उनके मांस से वह अपनी भूख शान्त करता है, या आत्मरक्षा के लिए उसे वैसे करना आवश्यक मालूम होता है? इन दोनों के न होने पर सिर्फ खेल के लिए ऐसा घोर कृत्य ईश्वर को क्या बतलाता है?  http://www.mazdoorbigul.net/archives/9143