शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

आर्य समाज का शुध्दिकरण आंदोलन और मेघ:

आर्य समाज का शुध्दिकरण आंदोलन और मेघ: 
यह सभी जानते है कि आर्य समाज की स्थापना दयानंद सरस्वती ने की थी। यह विशुद्ध रूप से हिन्दू धर्म का एक सुधारवादी आंदोलन के रूप में सारे भारत में जाना गया और इसका प्रभाव भी पड़ा। यह मात्र प्रचारक रूप ही नहीं बल्कि सामाजिक रूढ़ी वादिता पर प्रहार भी था। कुलमिलाकर इसे एक राष्ट्रवादी नजरिये से देखा गया और जो हिन्दू वर्ण व्यवस्था में नहीं थे या जो उसे नापसंद करते थे या जिन्हें दूसरे धर्म और पंथ पसंद थे, ऐसे अनेकानेक लोगों को घेरकर वापस हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था में उन्हें स्तर प्रदान करने की गवेषणा से लवरेज यह एक जातीय या राष्ट्रवादी आंदोलन था। इसका मंतव्य बढ़ते हुए ईसाई धर्म और मुस्लमान धर्म को रोकना भी था। इसका प्रभाव भी पड़ा, इसे नकारा नहीं जा सकता।
दयानंद सरस्वती के बाद सबसे ज्यादा प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में श्रद्धानद जी उभरे थे। श्रद्धानंद जी के और बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के बीच कई बार विचारों का आदान प्रदान हुआ। हिन्दू कोड बिल के समय जब बाबा साहेब ने सभी से विचार विमर्श किया तो उनमें श्रद्धानंद जी प्रमुख थे, जिन्होंने बाबा साहेब के मंतव्य के अनुरूप हिन्दू ग्रन्थों से कई उद्धतरण बाबा साहेब को उपलब्ध कराये। हिन्दू कोड बिल के समय उनके व्यकिगत सचिव रहे श्री सोहनलाल शास्त्री जी ने इस सम्बन्ध में मुझे कई रोचक बातें बताई थी। कुछ उन्होंने अपने संस्मरण में भी लिखी है। यहाँ उनका सन्दर्भ उचित नहीं है, परंतु यहाँ यह जानना महत्त्व पूर्ण है कि जात-पांत तोड़क मंडल की आर्य समाजी गतिविधियों का उस समय बोलबाला था और श्रद्धानंद जी इसमें अग्रणीय थे। इन गतिविधियों का केंद्र लाहौर था। संतराम बी.ए. के इस संबंद्ध में किये गए कार्यों को भी सभी जानते है। 
इस समय तक भारत के कई प्राचीन जन समूह हिन्दू धर्म में समाहित नहीं थे। जिसमे सबसे बड़ी संख्या मेघों की थी। सिंध और मरुस्थल में बसे मेघों के बीच आर्य समाज की पुरजोर घुस पैठ हुई। चूँकि वे हिन्दू बाह्य लोग थे और अन्य कई समुदायों से ठीक ठाक थे तो उनको हिन्दू ढांचे में खींचना और फिट करना आर्य समाज को सुभीता लगा। जहाँ जहाँ इनकी सघन बस्तिया थी, वहां वहां आर्य समाज की गति विधिया बढ़ गयी और हजारों की संख्या में मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिन्दू धर्म में अंगीकृत किया गया। ऐसा किया जाने के बावजूद भी उनके सामाजिक स्तरीकरण की समस्या फिर भी ज्यों की त्यों बनी रही। यह भी एक ऐतिहासिक सच्चाई है। 
सिंध, कश्मीर किंवा जम्मू और मारवाड़, मेरवाड़ा आदि के मेघों का त्वरित गति से शुद्धिकरण किया गया। लाहौर और मारवाड़ के बीच सीधे सम्बन्ध थे और मेघ लोग इधर से उधर आते जाते रहते थे। स्वयं दयानंद सरस्वती भी मारवाड़ के जोधपुर में आये थे, यहाँ का राजा और खेतड़ी का राजा उनके शिष्य थे। परंतु दयानंद सरस्वती फिर भी अपने शिष्य राजाओं को यह आदेश नहीं दे सके कि हे! राजन, अब आपके राज्य में यह फरमान जारी कर दो कि आज के बाद कोई भेदभाव या छुआछूत नहीं करेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि यह एक हिन्दू जातीय राष्ट्रवादी आंदोलन मात्र था! जिसमे हिंदुओं की नफरी को बढ़ाना मात्र था न कि जात पात या वर्ण व्यवस्था को तोड़ना था। लाहौर, स्यालकोट, जम्मू, जोधपुर, अजमेर और अन्य कई जगहों के मेघों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिन्दू बनाया गया। आज वे वहीँ के वंही है, कुछ के नाम बदल गए, कुछ वापस लोट गए. यह सब इसलिए हुआ कि आर्य समाज में भी दबदबा तथाकथित जातीय हिंदू लोगों का ही बना रहा और जातीयां ज्यों की त्यों बनी रही.उसमे कोई विशेश तबदीली नहीं हुयी. अतः धीरे धीरे मेघों ने अपने आप को इससे अलग कर दिया।
यहॉ मैं कुछ ऐतिहासिक तथ्य रखना चाहता हूँ, जिसे समझना बहुत जरुरी है। ये तथ्य सीमित है परंतु इनका प्रभाव सम्पूर्ण मेघ समाज पर पड़ा और पड़ रहा है, चाहे वह जम्मू कश्मीर का हो या राजस्थान का या पंजाब का या गुजरात या हरियाणा आदि का....। इसी मंतव्य से इसे यहाँ उदधृत कर रहा हूँ.....
आर्य समाज ने यह अनुभूत किया कि हिन्दू धर्म की हानि या क्षति न केवल गुणात्मक रूप से गिरी है बल्कि संख्यात्मक रूप से भी गिर रही है। उन्होंने आंकड़ो के हिसाब से देखा की 1881 से लेकर 1911 तक कुल 9252295 से 8773621 की हिन्दू जनसँख्या कम हुयी है। उन्होंने जनसँख्या के आधार पर यह विश्लेषण किया कि पंजाब में यह कमी 43.8% से 36.3% तक की हुई है. जबकि पंजाब में मुसलमानो की जनसँख्या वृद्धि 50.7 तक की हुई है।....अतः जो लोग ईसाई या मुस्लमान बन गये है, उन्हें वापस हिदु घर्म में शुद्धिकरण करके लाया जाय। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह जनसँख्या वृद्धि या कमी आज भी हिन्दू राजनीति का एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक औजार बना हुआ है। जो भी हो, बात यह है कि शुद्धिकरण का पेच जातीय जनसँख्या के आंकड़ो की राजनीति से प्रेरित रहा था और आज भी है। जबकिं हिन्दू बाह्य आज की तथाकथित sc या st की प्रेरणा का स्रोत वृद्धि या कमी नहीं था बल्कि एक समाज या धर्म विशेष में अपना स्थान बनाना था अर्थात सामाजिक ढांचें में अपना एक जातीय क्रम निर्धारित करवाना या पद प्राप्त करना था। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जिनका शुद्धिकरण किया गया वे उस समय हिन्दू नहीं थे, तभी तो उन्हें शुद्धिकरण से हिन्दू बनाया गया। यह जाति परिवर्तन नहीं था और न ही किसी जाति को जातीय पैमाने में ऊँचा या नीचा करना था. बल्कि विशुद्ध रूप से हिन्दू बाह्य लोगों को हिन्दू धर्म में पहचान देना मात्र था... और भी कई तथ्य है, जिसका अनुमान लगा सकते है. उन सबके साथ......।।।।
सन 1884 से आर्य समाज ने शुद्धि की रस्म शुरू की। इस शुद्धिकरण में आर्य समाजी लोग हिन्दू धर्म के प्रतिष्ठ ब्राह्मणों द्वारा कुछ मंत्रोच्चार की प्रक्रिया के द्वारा इसको अंजाम देते थे। उनकी वकालत करने वाले लोग भी ब्राह्मण ही हुआ करते थे। इस तथ्य को आर्य समाज के रिकार्ड्स से जाना जा सकता है। गुरदासपुर में राम भज दत्त नाम के ब्राह्मण जागीरदार का नाम इस सम्बन्ध में विशेष रूप से लिया जाता है, जो एक मोहयाल ब्राह्मण था और जो लाहौर में वकील था। हालाँकि यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि स्वामी दयानंद ने ऐसी किसी शुद्धि की शुरुआत नहीं की और आर्य समाज के रिकार्ड्स से यह तथ्य उजागर होता है कि शुद्धि का पहला व्यवस्थित रीतिविधान या क्रिया कलाप अमृतसर के आर्य समाज से शुरू हुई!
सन 1884 से आर्य समाज ने शुद्धि की रस्म शुरू की। इस शुद्धिकरण में आर्य समाजी लोग हिन्दू धर्म के प्रतिष्ठ ब्राह्मणों द्वारा कुछ मंत्रोच्चार की प्रक्रिया के द्वारा इसको अंजाम देते थे। उनकी वकालत करने वाले लोग भी ब्राह्मण ही हुआ करते थे। इस तथ्य को आर्य समाज के रिकार्ड्स से जाना जा सकता है। गुरदासपुर में राम भज दत्त नाम के ब्राह्मण जागीरदार का नाम इस सम्बन्ध में विशेष रूप से लिया जाता है, जो एक मोहयाल ब्राह्मण था और जो लाहौर में वकील था। हालाँकि यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि स्वामी दयानंद ने ऐसी किसी शुद्धि की शुरुआत नहीं की और आर्य समाज के रिकार्ड्स से यह तथ्य उजागर होता है कि शुद्धि का पहला व्यवस्थित रीतिविधान या क्रिया कलाप अमृतसर के 'आर्य समाज' से शुरू हुआ। 
पहला व्यवस्थित शुद्धिकरण या धर्म परिवर्तन का कार्यक्रम अमृतसर के आर्य समाज द्वारा सम्पादित करवाया गया। यह एक सफल कार्यक्रम बन पड़ा था, अतः इस क्रिया विधान को आगे जाकर व्यापक रूप और दिशा दी गयी। इस कार्यक्रम में ऐसा क्या था कि इसने शुद्धिकरण के क्रियाकलाप को एक आंदोलन का रूप दे दिया। कई बातें है कुछ छोटी है और कुछ बड़ी, वे सभी विचारणीय है। परंतु, जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह है कि इस क्रिया विधान को एक पुरातनपंथी ब्राह्मण के द्वारा संपन्न करवाया गया। जो हिन्दू धर्म के हिसाब से सर्वोच्च और आधिकारिक प्रमाण माना जाता है। अतः इसका व्यापक प्रभाव पड़ा या उसके माध्यम से लोगों को आकर्षित किया गया। उस ब्राह्मण महाशय का नाम तुलसी राम बताया जाता है। वह पुरातनपंथी ब्राह्मणों का भी बाप था, कहने का तात्पर्य यह है कि वह उस समय का सबसे ज्यादा पुरातन पंथी था say it he was the most orthodox of the orthodox. वह पुरातनपंथी होने के साथ ही बहुत बड़ा विद्वान था, उसकी लोगों में बहुत बड़ी मान्यता और प्रतिष्ठा थी. वह ब्राह्मणों का सबसे अग्रणीय और पूजनीय माना जाता था. उसकी दूर दूर प्रसिद्धि थी. ऐसे में अगर कोई इस प्रकार का कोई कार्य अंजाम दे तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्या पड़ सकता है, आप सहज ही अनुमान लगा सकते है. ये सब एक सोची समझी रणनीति के तहत ही किया गया गया था. जिसके जाल में कई भोली भाली जातियां आ गयी और अपना स्वतंत्र वजूद खो बैठी, जिसमे मेघ कौम भी एक है। इस क्रिया विधान में किया क्या गया? 
जो भी किया गया वह संवेदित था! शुद्धि कारित लोगों को हिन्दू धर्म के एक बाह्य लक्षण, जनेऊ से विभूषित किया गया अर्थात उन्हें जनेऊ पहनाया गया और गायत्री मन्त्र दिया गया। वे लोग बड़े प्रफुल्लित हुए थे कि आज तक उनकी पहचान न हिन्दू धर्म में है और न मुसलमान धर्म या ईसाई में तो आज उन्हें एक पहचान मिल गयी ! वे जनेऊ और गायत्री के कायल हो गए, अपने सब दुःख दर्द को भूल गए। पर हकीकत में यह उनकी दासता की बेड़ियों की नयी शुरुआत थी। इसे आजादी के बाद आज अनुभूत भी किया जा रहा है। न केवल अमृतसर बल्कि और भी कई जगहों में उन्हें इसी तरह से फांसा गया। मारवाड़ के जोधपुर आदि इलाकों में भी ऐसा ही हुआ, पर मारवाड़ के मेघों के सामने एक प्रश्न था कि उनके सामने ही राजपूत तो बिना जनेऊ के भी राजपूत उच्च जातीय ही कहलाते है, द्विज है। ब्राह्मण भी वही है, और जनेऊ पहनकर भी वे अगर निम्न ही रहते है तो इस प्रकार का शुद्धिकरण उन्हें मंजूर नहीं. उनका मोह भंग हो गया और मारवाड़ में आर्य समाज की पैठ इनमे कम हो गयी.। उनके साथ ही कुछ शुद्र लोगों ने यथा माली आदि लोगों को भी शुद्धिकरण द्वारा बाड़े में बांधा गया था, वे फिर भी बने रहे, पर मेघों का मन उचट गया। आज बिरले ही मेघवाल मिलेंगे जो आर्य समाजी हो। इस यज्ञोपवीत और गायत्री से जुडी और भी कई बातें है, वे आप विश्लेषित कर सकते है।
आर्यसमाज के इस शुद्धिकरण की घटना की इससे आगे की बात और भी महत्वपूर्ण है, अतः इस घटना विशेष के प्रभाव को जानने से पहले इसको जानना जरुरी है। वह है- शुद्धिकरण के बाद उन लोगों को हरिद्वार भेजना। पंडित तुलसि राम इस प्रकार से शुद्धिकृत किये हुए लोगों को एक शुद्धिपत्र लिख कर देते थे और उसके साथ उन्हें हरिद्वार में जाकर गंगा में डुबकी लगाने/स्नान करके शुद्ध होने का उपदेश देते थे। उधर हरिद्वार व गंगा आदि की महिमा का अपरंपार बखान और महिमा का प्रचार भी कथा कीर्तनों द्वारा बढ़ चढ़कर किया जाने लगा। यह सब पुनः उन्ही प्रक्रियाओं के अंग थे, जो भोली भाली जनता को झांसे के फंदे में बाँधने वाले। अगर बाद की घटनाओं का विश्लेशण करें तो यह बात सत्य सिद्ध हो जाती है। इससे पहले मेघों का हरिद्वार और गंगा से कोई लेना देना नहीं था, पर इस प्रक्रिया से उनका हरिद्वार से अटूट सम्बन्ध बनता गया और आज भी वह अटूट है। इस प्रकार से शुद्धिकरण से आये मेघ और जिनकी शुद्धि नहीं हुई थी, दोनों में कुछ समय तक रस्सा कशी भी चली पर अंततः कभी उसने समर्पण किया तो कभी इसने पर, हरिद्वार और गंगा स्नान का खेल चलता रहा। कई बार इस पर मेघों की बड़ी बड़ी पंचायतें भी हुई पर अभी तक यह सभी मेघों में अनिर्णीत है. हरिद्वार और मेघों की पोस्ट पर इस पर और लिखा जायेगा, यहाँ सिर्फ यह समझना है कि शुद्धिकरण के साथ ही मेघों में हरिद्वार के प्रति न केवल उत्कण्ठा जागृत हुई बल्कि उसका पुंछ भी पकड़ लिया गया!
हिन्दू धर्म की जानकारी रखने वाला यह तथ्य अच्छी तरह से जानता है कि यज्ञोपवीत वैदिक विधि विधान में द्विज लोगों का विशेषाधिकार है। जब हिन्दू बाह्य लोग इससे संपन्न हुए तो उनमे एक उच्चता के भाव का संचरण होना वाजिब था, परंतु वह तो एक छलावा था, जिसे ये लोग बाद में समझ पाये। क्योंकि न तो वे क्षत्रियों में शुमार हो सके और न ब्राह्मणों में। हिन्दू बाह्य होने पर उनका अपना जो स्वतंत्र वजूद था वह भी ख़त्म हो गया और जातीय संस्तरण के गंदे खेल में उलझ कर रह गए। जिसे जातीय संघर्ष कहा जाता है। अर्थात ऐसे लोग जो जाति में परिणित हुए वे किन्ही जातियों से अपने को ऊँचा साबित करने में लग गए तो दूसरे उन्हें नीँचा । यह रस्सा कशी अभी भी व्याप्त है और उसे ख़त्म नहीं किया जा सकता क्योंकि हिन्दू धर्म वर्ण और जाति पर टिका है। और कोई भी जाति तभी ही जाति है जब वह किसी से ऊँची हो और किसी से नींची। ब्राह्मण से ऊँचा कोई हो नहीं सकता। और नींचे का कोई पैमाना नहीं। अतः जितनी भी नीची जातियाँ है वे एक दूसरे को ऊँचा नीचा करने और बनाने में लगी रहती है। जो ऊँची है उसका मानना यह होता है कि दूसरी जाति उसका स्थान नहीं ले ले और जो नीची है वह सोचती है कि अगर यह ऊँची हो गयी तो उसका वजूद और नीचा हो जायेगा। अतः शुद्धिकरण के बाद यह प्रक्रिया पनपने लगी, जब उनका कोई स्थान नियत सा हो गया, तब से और ज्यादा! इस सम्बन्ध में और भी कई तथ्यों पर गौर किया जा सकता है। यहाँ अमृतसर के शुद्धिकरण की बात हो रही थी तो बात यह है कि यह बहुत ही छोटे पैमाने पर शुरू किया गया था पर उसका ध्येय बहुत ही आगे की सोच का था। शुरुआत में एक्के दुक्के लोग शुद्धिकृत हुए, पर एक समय तो बाढ़ सी भी आ गयी थी और फिर रुक गयी। ऐसा क्यों और कैसे हुआ?
अगर आंकड़े देखे जाय तो सन् 1884 में अमृतसर में 39 लोगों को शुद्धिकृत कर हिन्दू धर्म में लाया गया। 1885 में 55 लोगों को शुद्धिकृत किया गया। यह ट्रेंड महाशय मुंशीराम द्वारा इसमें पुरे संकल्प से लग जाने के बाद तीव्र गति में आया। इस शुद्धिकरण का ऐसा नहीं है कि विरोध नहीं हुआ हो। अर्थात इसका कई जगहों पर विरोध भी हुआ। कुछ जगहों पर दिखावे का विरोध था तो कुछ जगहों पर अन्यान्य कारणों से। पुरातनपंथी हिंदुओं की ओर से भी विरोध हुआ तो मुसलमानों की ओर से भी। उस समय के विरोध को आज के धर्मान्तरण के विरोधों के सन्दर्भ में जान सकते है। तात्पर्य यह है कि यह निर्विरोध नहीं था। D.A. V कॉलेज द्वारा भी विरोध हुआ......। परंतु 1892-93 से मुंशी रामजी इस हेतु पूर्ण समर्पित हो चुके थे, वे लोगों को सहमत करने में सिद्धहस्त थे। उन्होंने सन् 1879 में अमृतसर में सिंहंसभा के साथ अपनी एक 'शुद्धि सभा' का गठन किया था। उसके माध्यम से वे शुद्धिकरण को आंदोलन का रूप देने में जुट गए। यहॉ यह ध्यान देने योग्य है कि मेघों ने 1879 में मांसाहार का त्याग संकल्पित किया था । आंकड़े बतलाते है कि 1895 में इस शुद्धि सभा नें14 और 1896 में 226 लोगों की शुद्धि की। इसमे व्यक्तिगत शुद्धिकरण से पारिवारिक शुद्धिकरण की पहल हुई अर्थात अब परिवारों का शुद्धिकरण किया जाने लगा और विभिन्न जातीय समूह इस शुद्धिकरण में लिए जाने लगे।
सन् 1896 में इन्ही प्रयत्नों के फलीभूत जुलाहों/बुनकर लोगों का सिख धर्म में सिख रोहतियास के रूप में शुद्धिकरण करके उन्हें सामिल किया गया। सन् 1896 में मुंशीराम द्वारा पहला सामूहिक शुद्धिकरण किया गया। ये राठी लोग थे। (suddhi of rathias).it is stated in one source as under: 
"The first mass purification, reports Munshi Ram, began with the SUDDHI OF RATHIAS, a sect of a Sikhism who were not allowed to sit on the same carpet even by the Khalsa..... In the middle of 1896 AD they applied for their Suddhi and within the next few months a thousand and more were taken into Arya Samaj as brethren, entitled to full social and religious rights.( Shraddhananda, 1926, Pareek, 1973, 136.) " 
यह ध्यान देने योग्य है कि जिस सिख धर्म को स्वामी दयानंद ने हिन्दू धर्म की एक शाखा के रूप में माना था, उसके और आर्य समाजियों के रिश्तों में भी खटास आ गयी। कई कारण रहे होंगे। अस्तु 19वीं शताब्दी के अंत होते होते सिखों ने आर्य समाज से अपने को अलग कर लिया। कहा यह भी जाता है कि 1849 में मुसलमानों के जिहाद से प्रभावित होकर ही यह शुद्धिकरण आर्य समाज ने अपनाया था। सन् 1907 से 1910 के बीच आर्य समाज का ध्यान मुसलिम राजपूतो का शुद्धिकरण करने पर केंद्रित रहा..........। सन् 1911 के जनगणना के आंकड़ो के अनुसार उत्तर पश्चिमी रियासतों में आर्य समाज द्वारा 1052 ऐसे लोगो का शुद्धिकरण कर के उन्हें हिन्दू धर्म में समाहित किया गया। ( saurce: Census of India, 1911, vol. 15, pp 134) 
आर्य समाजियों की इन गतिविधियों से मुसलमानों और आर्य समाजियों के बीच एक तरह से युद्ध छिड़ गया, जिसका यहाँ वर्णन आवश्यक नहीं है. परंतु इस प्रकार की गतिविधियों से हिन्दू और मुसलमानों में तनाव हुआ और एक दूसरे के विरुद्ध पैम्फलेटबाजी भी शुरू हुई। पेशावर में पंडित लेख राम 'आर्य गजट' निकालते थे। उसमेंऔर मुसलमानो के जेहादी पर्चो में एक दूसरे के प्रति नफ़रत के अंगारे भरे जाते थे। सन् 1897 में लेख राम का क़त्ल हो गया! .......।
शुद्धिकरण यही नहीं रुका। आर्य समाज की शुद्धिकरण की नीति का मकसद संख्या के बल पर एक समुदाय को दूसरे समुदाय के विरोध में खड़ा करना था। यहाँ स्पष्ट रूप से मुसलमानों की संख्या को कम करना था, उन्हें हिन्दू बनाना था, किन्ही लोगों को यह कह कर या भरोसा दिलाकर कि उनके पूर्वज हिन्दू थे तो किन्हीं को अन्य आधार बना कर या बता कर पर इन सब का मकसद सन्ख्या की राजनीती और ...... और बहुत कुछ था! इस प्रकार से यह एक बांटने वाली राजनीती का भी हिस्सा बन गया. ज्यों ज्यो शुद्धिकरण में तीव्र गति आने लगी त्यों त्यों उनमे आक्रामकता भी बढती गयी। यह सब हम उस समय के पत्र पत्रिकाओं और अन्य स्रोतों से जान सकते है।निसे एक राष्ट्रवाद का चोगा पहनाया गया, जो विशुद्ध रूप से जातीय चरित्र का था या यो कहें कि हिन्दू जातीय राष्ट्रवाद था। इस प्रकार से अब यह आंदोलन राष्ट्रवाद के कलेवर से जाना जाने लगा।
सन् 1900 से पहले के प्रयत्न ज्यादातर मुसलमानो और ईसाईयों को हिन्दू बनाने पर केंद्रित थे पर 1900 के आस पास शुद्धि के आंदोलन में परिवर्तन आया। इस समय से हिन्दू बाह्य जातियों को शुद्धिकरण के द्वारा हिन्दु बनाने की ओर इसका रुख हुआ, जिसे 1900 के आस पास राठी लोगों के शुद्धिकरण से हम जान सकते है। सन् 1911.आर्य समाज का शुद्धिकरण आंदोलन और मेघ: 2, पिछली पोस्ट से आगे
स्यालकोट के मेघों से शुरू हुआ शिक्षा की शर्त
आर्य समाज द्वारा मेघों के शुद्धिकरण पर census-1911की यह टिपण्णी कितनी प्रासंगित हो सकती है- The Meghs thus recieved the services of an Upadeshak, often a Brahman, for performing their rituals. At the same time as the Arya Samaj was questioning the rules of hierarchy through these 'purification', it was freeing itself from the tutelage of the orthodox pandits by simplifying the ritual as is explained by Ram Bhaj Datt, who had become the President of Suddhi sabha:
,"The ceremony is everywhere the same. In all cases the person to be reclaimed has to keep Brat(fast) before the ceremony ( a part of which consists patting on the sacred thread). In some cases where the fall was due to passion , the number of Brats is increased by the persons who are perform the ceremony. They very act of their being raised in social status makes them feel a curious sense of responsibility. They feel that they should live and behave better and that they should act as Dvijas. It has thus, in the majority of cases, a very wholesome effect on their moral, social, religious and spiritual being. As to treatment, the Arya Samaj treat the elevated on terms of equality.." ( See, Punjab census Report 1911:110)
इस प्रकार से यह शुद्धिकरण का रूप उन लोगों के सामने एक आदर्श के रूप में आर्य समाज के द्वारा रखा गया, विशेषकर तथाकथित अछूत जातियों के सामने यह आदर्श था, जिसे अपनाकर वे अपना सामाजिक ओहदा ऊँचा करने हेतु तत्पर हुए। आर्य समाज द्वारा जाति व्यवस्था पर भी बड़ा सावधानीपूर्वक किया जाने वाला विवेचन इन्हें एक आदर्श समाज का रूप नजर आता था। अतः अधिकाधिक मेघ लोग इस अवधी में आर्य समाजी बने। सारांशत:
'This is an idealized description insofar as Suddhi tended to be reserved for less impure castes- even among the Untouchable- and particularly insofar as the majority of the Arya Samajists had reservations about challenging the castw system in favor of which an active minority was mitigating. The ideal type of social relations that this avant -garde devised however has the characteristic of integrating the sectarian and nationalist dimensions of the Arya Samaj within the logic of 'str
. यहप्रश्न बार बार दिमाग में आता है कि मेघों ने आर्य समाज की शुद्धि को क्यों अपनाया? कई तरह के जबाब लोगों द्वारा दिए जाते रहे है। मैं उन सब पर नहीं जाना चाहता। वे कारण हो भी सकते है और नहीं भी। यह तो उस समय की परिस्थियों के विश्लेषण से हम जान सकते है। जहाँ तक हिन्दू संस्कारों और रीति रिवाजों की बात है, तो यह आर्य समाज के साहित्य में दर्शाया गया है कि बहुधा मेघों के रिवाज कई मामलों में अच्छे थे। हिन्दू रिवाजों और संस्कारों से मिलते थे। कई मामलों में उनका क्रिया विधान राजपूतों के संस्कारों से और कई मामलों में एनी द्विज जातीय संस्कारों से मेल खाते थे, तो फिर उनको शुद्धि के द्वारा संस्कारित करने का क्या औचित्य था? हालाँकि उनके संस्कार लिपिबद्ध नहीं थे पर परंपरागत रूप से वे उनके लिए सहज और स्वीकार्य रूप में निरंतर चले आ रहे थे। ऐसे में उनको संस्कारों का झांसा देकर उन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद में नहीं लिया जा सकता था।
जहाँ तक जातीय संस्तरण की बात थी। यह समाज अपने आप में स्वायतशायि माना जाता था । फिर भी वह अलग थलग पड़ा हुआ था। हिन्दू समाज में अच्छेप था। उसके लिए यह बात सुभीती थी कि इस माध्यम से वह प्रगति कर सकता है। जब पहली बार मेघों को शुद्धिकरण के द्वारा द्विज/हिन्दू बनाने का लोभ दिया गया या यह लोभ उनमें आया तो उन्होंने इसे सामूहिक रूप से अस्वीकार कर दिया। उधर हिन्दू और मुसलमानो के बीच भी आपसी विद्वेष बढ़ रहा था। ऐसे में मेघों को एक राष्ट्र की आवश्यकता अनुभूत होना जायज था। यह भी एक वजह थी कि वे धीरे धीरे इस पर विचार करने लगे।
जब स्यालकोट के मेघों के सामने शुद्धिकरण द्वारा द्विजत्व प्राप्त करने या हिन्दू बनने का प्रस्ताव आर्य समाजियों द्वारा दिया गया तो उन्होंने कई शर्ते रखी। उनमे जो सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी, वह थी, उनके लिए शिक्षा का माकूल प्रबंध करना। अगर आर्य समाज मेघों के लिए पाठशालाएं खोल दे तो मेघ लोग शुद्धि द्वारा हिन्दू धर्म को अंगीकृत कर लेंगे। मेरे हिसाब से उनकी यह शर्त महत्वपूर्ण तो थी ही साथ ही उनकी भविष्य की पीढ़ियों के उद्धार से भी जुडी थी। आर्य समाज इस पर राजी हो गया और मेघों के लिए स्कूलें खोलने के जतन किये जाने लगे। आर्य समाज को भी इस में अन्य पुरातनपंथी हिंदुओं का कोप भाजन बनना पड़ा। यह मैंने पहले भी बताया है कि आर्य समाजियों और पुरतांपंथियों के बीच अपने तरह की एक अलग ही रस्सा कस्सी थी। कई जगह इस बात को लेकर झगड़े भी हुए और कई जगहों पर कुछ लोगों को जान भी गंवानी पड़ी।
मेघों के लिए अंततः स्यालकोट में स्कूल खोल दी गयी और देश के अन्य भागों में भी इस्कूलों का जाल बिछाने का काम आर्य समाज ने अपने हाथ में लिया। इस पहले दौर में स्यालकोट और पंजाब में स्कूलें खोली गयी , जहाँ मेघ अन्य जातीय छात्रों के साथ शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। मारवाड़ के जोधपुर में भी आर्य समाज का यह कार्य देर सवेर शुरू हुआ। पुराने समय में द्विज के अलावा दूसरा स्कूल का दरवाजा नहीं देखता था, बनिए लोग हिसाब किताब तक की पढ़ाई करके अपना व्यवसाय संभालते थे। मेघ लोग उन पोसालों के पास से भी नहीं गुजर सकते थे।। जब आर्य समाज ने यह पहल शुरू की तो मेघों में शुद्धिकरण का चस्का भी लगा।। मेरे ताऊ जी पूना रामजी और अन्य कुछ बालकों ले उस शर्त का फायदा भी उठाया। उन्हें अक्षर ज्ञान जरूर मिला। प्रायः सभी जगह इसका ठीक ठाक रेसपोंस था। उधर मेघों ने शुद्धिकरण का समर्थन भी करना शुरू कर दिया.... कई क्षेत्रों में यह हुआ और होता रहा।
साफ बात यह है कि मेघों के शुद्धिकरण के पीछे मेघों की कई भावनाओं में शिक्षा एक महत्वपूर्ण भाग था। वे लोग कितने ही अनपढ़ या निरीह बेजुबान लोग रहे हो पर शिक्षा की शर्त पर ही वे आर्य समाज में गए। बाद में यह क्रेज और शर्त ख़त्म प्रायः हो गयी। उसके भी कई कारन थे। आर्य समाज ने भी इन लोगों के हाथों में रामायण, पुराण और महाभारत आदि थमा दी। जिसे वे सुबह शाम स्नान कर पूजा पाठ के वक्त नियमित वाचन करने लगे। ये लोग समजोद्धार के कार्यों में भी बढ़ चढ़कर आगे आने लगे और आजादी के समय और तुरंत उसके बाद विधायिका आदि में उन्हें सदस्य भी बनाया जाने लगा। जोधपुर से सूरजमल जी ऐसे ही एक शख्स थे. जो विधायिका के पहले सदस्य बने थे
हिन्दू वर्ण व्यवस्था के बाहरी वर्गों में मुसलमानों को छोड़कर एकल वर्ग के रूप में मेघ लोग सर्वाधिक थे। उनकी नफरी को हिन्दू धर्म में शुमार कराना आर्य समाज के राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण अंग बन चूका था। सिंध, पंजाब आदि इलाकों में मेघ, जाट, और ऐसी कई अन्यान्य जातियाँ धार्मिक रूप से स्वतंत्र सी थी! उनमे कुछ लोग मुस्लमान तो कुछ लोग हिन्दू होते रहे। उनके आपसी रिश्ते और शादी ब्याह भी होते रहे।परंतु राष्ट्रवाद के उदय के बाद उनमे किंचित दूरियां भी खींचने लगी। अगर मेघ मुस्लमान बन गया तो जुलाहा कहा गया और जुलाहा से हिन्दू हो गया तो वह मेघ हो गया। क्योंकि इस समय तक यह कौम अपने आप को बुनाई के धंधे से सम्प्रक्त कर चुकी थी। धर्म उनके लिए दिवार नहीं था, पर शुद्धिकरण से दुरिया बढ़ गयी। हमारे ननिहाल के आधे लोग जुलाहा बनकर सिंध पाकिस्तान में रह गए तो कुछ हमारे परिवार जैसे मेघ बनकर भारत में आ गए। अब उनका आपस में मिलना भी दूभर हो गया। बात स्यालकोट की हो रही थी, तो उस समय स्यालकोट मे मेघों की सर्वाधिक आबादी थी, उन्हें हिन्दू घेरे में लेने के लिए आर्य समाज के प्रयत्न शुरू से ही होते रहे।इन प्रयासों पर एक स्रोत में जो टिपण्णी की गयी है, उसे मैं यहाँ देना चाहूँगा, ताकि अन्य सम्बन्ध कारकों को आप स्वयं जान सके और यह जान सके कि इन शुद्धि कार्यक्रमों में मेघ लोग अन्य जातियों की अपेक्षा ज्यादा थे। इसके कई कारण रहे होंगे, परंतु स्पष्तः हिन्दू धर्म में समाहित होना और उनमे जातीय संस्तरण में ऊपर का पांव दान प्राप्त करने की ललक को नाकारा नहीं जा सकता है।
"Another untouchable caste known as Megh in district Sialkot consituted nearly one and quarter lakh of Populaion in 1911. This increased three-fold by 1921. Though megh observed hindu rituals, yet they were considered untouchables. Lala Ganga Ram , a lawyer purified a large number of Meghs on 23 March 1922. The Meghs were given name of Arya Bhagat after their Shuddhi. A sabha known as "Megh Uddhar Sabha" was founded in 1922, which later set up anexclusive locality of the Meghs. During 1901-1910, around 60000 to 70000 thousand (sixty to seventy thousands) untouchables underwent Shuddhi. Some of the prominent untouchable castes were Rohtiya with 3000 to 4000 suddhis. Ramdasiya about 200, Od with 2000 to 3000. Megh numbering 30000(thirty thousand)etc. These Suddhies were solemnized in places like Kangra, Dalhousie, Hoshiarpur, and Ambala districts. In 1923 nearly 8000 chamars were purified at Sialkot through Dayanand Dalitoddhar Mandal. Pandit Vishnu Dutt Vakil, performed Shuddhi in 5300 Balmikis in 1930 at Lahore. In 1931 another 1000 Balmikis become dwijasafter their Shuddhi at Lahore. In 1923 Pt. Vishnu Dutt purified another 1530 Balmikis. Besides the above mentioned numbers, it is noted that All India Suddhi Mahasabha purified 183242 persons within a period of 8 years."
ये आंकड़े तो प्रकाशित आंकड़े है , इनके अलावा और कई जगहों पर मेघों ने देखा देखी या नाते रिस्तेदारी के हिसाब से भी शुद्धिकरण अपनाया और हिन्दू धर्म के जातिवादी प्राचीर में कैद हो गए। कैद होना इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि न तो वे ब्राह्मण बन सके और न राजपूत आदि द्विज। इसी समय डॉ आंबेडकर भारतीय राजनीति के क्षितिज पर चमकने लगे। इसके बाद इस में एक नया मोड़ आया। कई संस्थाये इस कार्य में संलग्न हुई और इसी समय में लाहौर में भूमानंद द्वारा 1922 में जात-पात तोड़क मंडल की भी स्थापना की और इसी समय स्यालकोट में मेघ उद्धार सभा और लाहौर में मेघ सभा का गठन हुआ। इन संस्थाओं ने और ऐसी कतिपय अन्य संस्थाओं ने भारत के विभिन्न भागों में शुद्धिकरण को अंजाम दिया। मेघ उद्धार सभा स्यालकोट और मेघ सभा लाहौर का प्रभाव और कार्यक्षेत्र पंजाब के साथ साथ वर्त्तमान राजस्थान तक था। इन संस्थाओं ने निश्चित रूप से मेघों को एक सम्बल दिया आर्य समाज का शुद्धि आंदोलन और मेघ: 9

आर्य समाज ने उन्नीसवी शताब्दी के अंतिम दशक में जम्मू कश्मीर में अपनी गतिविधिया और पैठ बढ़ाना प्रारम्भ किया।। सन् 1891 में आर्य समाज ने जम्मू में अपनी शाखा की स्थापना की। उसके बाद आर्य समाज ने मीरपुर, कोटली, भेम्बर, राजौरी, नावशहर, रियासी, रामवन, भद्रवाह और किस्तवार में शाखाएं खोली। अगर आंकड़े देखे जाय तो 1911 तक जम्मू व मीरपुर में 1047 लोगों का शुद्धिकरण किया गया अर्थार्त उन्हें धर्मान्तरित कर आर्य यानि हिन्दू धर्म में लिया गया। सेन्सस ऑफ़ इंडिया की 1911 की रिपोर्ट के अनुसार इनमें 429 लोग मेघ थे।
सन् 1931 तक जम्मू कश्मीर में इस प्रकार शुद्धि के द्वारा 93944 लोगों को आर्य यानि हिन्दू बनाया गया, जिनमे 93337 लोग जम्मू प्रोविंस के थे। (सेन्सस-1931, पृष्ठ 290-291) । आर्य समाज द्वारा यहाँ जम्मू और कठुआ जिलों में ज्यादा जोर रहा। इसका एक प्रमुख कारण तो यह था कि यह क्षेत्र पंजाब से सट्टा हुआ था, जिसके कारन यहाँ के लोग आर्य समाज की गतिविधियों को जानते थे। ये लोग स्यालकोट में आर्य समाज की गतिविधियों से वाकिफ थे और उनसे पूर्णतयाः प्रभावित थे। दूसरा प्रमुख कारण यह था कि यहाँ दलितों की सघन जनसँख्या निवास करती थी, जिसमें मेघ लोग सर्वाधिक थे। स्यालकोट में मेघों ने सामूहिक रूप से शुद्धि को स्वीकार किया था, जो इनके सामने एक मार्ग दर्शक की तरह था। अतः यहाँ भी सर्वाधिक रूप से मेघों ने आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन में भाग लिया और शुद्धि के द्वारा आर्य भगत बन गए।
कठुआ में आर्य समाज की गतिविधियों को राम भज दत्त ने ही अंजाम दिया। उसने वहां शुद्धि यज्ञ कर हजारों मेघों और अन्य लोगों को आर्य बनाया । जहा 1931 तक यह संख्या 7930 से 16271 तक पहुँच गयी। इन जगहों के अलावा भी जगह जगह शुद्धिकरण के कार्यक्रम आयोजित होते रहे और मेघ लोग मेघ से आर्य भगत होते रहे। शिक्षा की सुविधा की जो शर्त स्यालकोट में थी, उसका पालन यहाँ पर भी किया गया। आर्य समाज ने इनके लिए जम्मू जिले में रेहड़ी मोहला, आर.एस. पूरा आदि में प्राइमरी स्कूलें खोली गयी। कठुआ जिले में गढ़ अँड्रॉ Garh Andral और कल कुर कठुआ में पाठ शालाएं खोली गयी। अगर देखा जाय तो सन् 1921 से 1930 की समयावधि इस क्षेत्र में धार्मिक चेतना की जाग्रति की अवधि थी, जिसमें हिन्दू बाह्य लोग आर्य बनकर हिन्दू धर्म में अपनी एक पहचान बनाने का जतन पूरे मनोवेग से कर रहे थे। इस समय कई संगठन और पत्र-पत्रिकाएं भी निकालनी शुरू हुई। पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से आर्य समाज अपनी विचारधारा और जनमत दोनों को अपनी ओर करने में जुटा हुआ था। जिसके परिणाम भी उसे मिल रहे थे। इस क्षेत्र में सिंह सभा का संगठन और रणबीर पत्र का प्रकाशन आदि इसमें दृष्टव्य है।
जात-पात तोड़क मंडल, जिसकी स्थापना लाहौर में हुई थी, उसकी गतिविधियाँ भी इस क्षेत्र में बढ़ी। इस दरम्यान मेघों ने और अन्यान्य अन्य अन्य अछूत कही जाने वाली जातियों ने अपने साथ हो रहे भेदभाव के विरोध में महाराजा के सामने भी पक्ष रखा। महाराजा हरी सिंह ने 1931 में अपने राज्य में अछूतों पर लादी गयी पाबंदियों या निर्योग्यताओं को हटाने का एलान किया। 1932 में इन लोगों ने महाराजा को पुनः ज्ञापन भी दिया। महाराजा हरिसिंह ने अपने राज्य में सभी मंदिरों, कुँओं और सार्वजनिक शिक्षा स्थानो को सभी के लिए खोलने का एलान कर दिया। इसे राज्य के असाधारण गजट में प्रकाशित भी किया।
जम्मू कश्मीर में इस प्रकार की गतिविधियाँ होती रही और मेघ लोगों की शुध्दि दर शुद्धि होती रही अर्थात वे आर्य भगत बनते रहे। महात्मा मुंशीराम जो बाद में श्रद्धानंद जी के नाम से प्रसिद्द हुए उनके द्वारा भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य अंजाम दिए गए। वस्तुतः श्रद्धानंद जी के प्रयत्नों से ही इन कार्यों में स्फूर्ति आई और अछूतों को आर्य किंवा हिन्दू बनाने की मुहीम हकीकत में बदलती गयी। उस समय बहुत सी संस्थाये और संगठन खड़े हुए यानि बने और इस शुद्धि के कार्यमे लग गए। इनमे जात-पात तोड़क मंडल- लाहौर, मेघ उद्धार सभा- स्यालकोट, दयानंद दलितोद्धार सभा-अमृतसर, अछूतोद्धार सभा व दलितोद्धार सभा- दीनानगर, मेघ सभा-लाहौर, अस्परस्यता निवारण संघ, आल इंडिया महाशय महासभा, अछूतोद्धार सभा, आदि प्रमुख थी। इन संस्थाओं ने पन्जाब और उसके आस पास, जम्मू और उसके आस पास के जिलों में शुद्धि या धर्मान्तरण के विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये और लोगों को आर्य बनाया अर्थार्त उन्हें हिन्दू बनाया। मेघ से आर्य भगत या मेघ भगत हो गए, डुमना से महाशय हो गए, भंगी से वाल्मीकि हो गए आदि आदि।
प्रश्न यह पैदा होता है की क्या मेघो को आर्य भगत बना दिए जाने के बाद वे द्विज बन गए या उनकी निर्योग्यताएं ख़त्म हो गयी?

आर्य समाज का शुद्धि आंदोलन और मेघ : 10

आर्य समाज के शुद्धि कार्यक्रमों के द्वारा मेघों को द्विज बना दिए जाने के बाद भी क्या उनके सामाजिक और आर्थिक औहदे में कोई परिवर्तन आया? अगर इसके बाद की हालातों का आंकलन करे तो हमें निराशा होती है। इसका परिणाम कोई अच्छा नहीं निकला। जो लोग नवोदित धर्म जागरण से शुद्दीकृत होकर आर्य या हिन्दू बने थे, वे गरीब, निस्सहाय, अनपढ़ और हिन्दू मुसलिम बाह्य को थे। एक धर्म विशेष में अपनी पहचान के लिए कायल हुए इन लोगों को मालूम नहीं था कि यह भेदभाव बाद में भी बद्दस्तूर जारी रहेगा। वे आर्य समाज में तो आ गए, पर आगे की रणनीति उनके हाथ में नहीं थी। ये लोग खेतिहर मजदूर के रूप में जीवनयापन करने वाले थे। उसी में रमें रहे। इन भगतों या मेघों की सबसे बड़ी कमजोरी थी कि ये जगह जगह बिखरे हुए थे। खेतिहर कामों से जुड़े होने और हर दूसरे तीसरे साल अकाल पड़ने से ये जीवन यापन जे लिए इधर से उधर भटकते भी रहे। उन सबके बीच कोई आदान प्रदान भी नहीं था। अपने अपने प्रदेशों या क्षेत्रों में विभिन्न व्यवसायों में संलग्न हो गए। उस समय संवहन के साधन भी सीमित थे। ऐसे बहुत से कारण और परिस्थियां थी, जिसजे कारन उनका सामाजिक और आर्थिक उन्नयन अपेक्षानुरूप नहीं हो पाया। 
परंतु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगई कि इन शुद्धि कार्यक्रमो से उन्हें वेद् और वैदिक साहित्य पढने का अधिकार और पवित्र धागा धारण करने का अधिकार मात्र ही मिला। उन्हें द्विजत्व नहीं मिला। एक ओर सनातनी हिंदुओं ने उनका विरोध किया तो दूसरी ओर मुसलमानों ने भी विरोध किया। सामाजिक संस्तरण में गरिमामय स्थान प्राप्ति का उनका यह प्रयत्न इस हेतु कारगर नहीं बन पाया। उनकी सामाजिक स्थिति में कोई बदलाहट नहीं हुई। वे एक नए चक्रव्यूह के भाग बन गए। कुछ लोगों में सामाजिक गतिशीलता अवश्य आई, पर समूह के रूप में वह आशाजनक नहीं कही जा सकती थी। यह भी हुआ कि वे अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर नए नए धंधो को अपनाने की ओर उन्मुख हुए और नए धंधों में भी प्रविष्ट हुए। यह ट्रेंड न केवल मेघों में बल्कि अन्य शुधिकृत लोगों में भी आया। जिन लोगों ने अच्छे या लाभकारी व्यवसाय अपनाये थे वे प्रगति कर गए। वे शिक्षा में भी आगे बढे तो कुछ राजनीती में भी आगे बढे। उनका धार्मिक उत्थान आर्य समाज की संकल्पना के इर्द गिर्द घूमता रहा और ये उसके उपदेशक या पैरोकार बन कर रह गए।उन्हें संवैधानिक संरक्षण डॉ. आंबेडकर के व्यापक दृष्टिकोण से ही मिला।उस बाबत जितना कहा जाय उतना ही कम है।
आंकड़े बताते है कि 1903 में स्यालकोट में 50000 मेघों ने आर्य समाज के शुद्धि कर्मकांड से अपने को शुद्ध कर हिन्दू धर्म में बतौर आर्य भगत सामिल किया। मैं आर्य समाज के शुद्धि कार्यक्रमों के सनातनी हिंदुओं के विरोध और मुसलमानों के विरोध पर अपनी टिपण्णी लिखू, उससे पहले यह बता देना आवश्यक समझता हूँ कि ये शुद्धिकरण आंदोलन इन कौमों के लोगों के द्वारा ही ज्यादा प्रचारित करनें के कारण फले फुले अन्यथा सनातनी हिन्दू तो बुरी तरह से इनके पीछे लग गए और एक नयी तरह की दुश्मनी या द्वेष का सूत्रपात हुआ। यह ध्यान देने योग्य है कि लाला बद्रीदास एयर लाल देवराज ने राहतिया जाति के लोगों को गुरुदासपुर और जालंधर में शुद्धि द्वारा आर्य धर्म में प्रविष्ट कराया था। महात्मा मुंशी राम 40 राहतिया को अपने साथ लाहौर ले गए और उन्को आर्य धर्म अपनाया। उसी समय रोपड़ और लायलपुर में भी शुद्धि के कार्यक्रम हुए। महाशय रौनक राम और महाशय गोकुल राम ने डुमना लोगों के शुद्धि हेति गंभीर प्रयत्न किये, जिसके फलस्वरूप डुमना लोग शुध्दि के द्वारा आर्य धर्म में आये और नया नाम महाशय स्वीकार किया।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि इनका शुद्धिकरण भी राम भज दत्त द्वारा ही यज्ञ के द्वारा किया गया और उसके द्वारा ही इन्हें महाशय नाम नवाज गया। राम भसज दत्त ने ही शुद्धि के बाद महाशय कौमी सुधार सभा का गठन किया।एकं सूत्र का कहना है की 1903 में भी स्यालकोट में 50000 मेघ शुद्धि द्वारा आर्य भगत बने। और भी बहुत से दृष्टान्त है।यहाँ यह भी प्रश्न खड़ा होता है कि अगर जात पात तोड़ना ही इसका लक्ष्य था तो विभिन्न जातियों से शुद्ध हुए लोगों को विभिन्न तरश के नाम क्यों नवाजे जा रहे थे। मसलन मेघों को आर्य भगत, डुमना को महाशय आदि आदि.

आर्य समाज का शुद्धि आंदोलन और मेघ : 11
हरिद्वार से चंद्रावल व्रत की ओर-
दलित वर्ग या अछूत कही जाने वाली विभिन्न जातियों का शुद्धि के द्वारा धर्मान्तरण किये जाने के विभिन्न विरोधों के उत्तर और प्रत्युतर हर तरह से और हर स्तर पर दिए जा रहे थे। यह आर्य समाज की हिस्ट्री से मालूम होता है। साथ ही यह भी मालूम होता है की इन शुद्धि यज्ञों या कर्मकांडों का उन वर्गों द्वारा भी विरोध किया जाता रहा, जिन वर्गों से ये लोग शुध्दि यज्ञों में सरीक होते थे। आर्य समाज ने इसे अपने स्तर पर निपटाया वह हमारे लिए इतना महत्त्व पूर्ण नहीं है। हालाँकि व्यापक दृष्टिकोण हेतु उसे जानना जरुरी है, पर अभी मेघों की बात हो रही है तो उनके शुद्धि कार्यक्रमो तक ही हमें सीमित रहना है।
ऐतिहासिक रूप से मेघ लोग आध्यात्म प्रवर रहे है। धार्मिक रूप से उनकी अपनी एक अलग ही पहचान थी। उनकी धार्मिक मान्यताओ को बड़ा धर्म या महा धर्म कहा जाता था। तकरीबन 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच ये अपने धर्म को महाधर्म से पुकारते रहे। उनकी वाणियों और भजनों में उसकी महिमा गायी जाती रही। अगर ऐतिहासिक जड़ों को टटोले तो वह सिद्धो और नाथों के माध्यम से उनमे प्रवाहित होती रही। इसकी महिमा ये लोग अपनी सभा पंचायत और उत्सवों में करते रहे। उनके उत्सवों में चंद्रावल ब्रत का विशेष महत्त्व होता था! इस अवसर पर ये भर्तहरि, कबीर, बाबा रामदेव, गोरखनाथ और अन्य संतों या पीरो के भजनों का संगायन करते थे।जिस समय आर्य समाज ने शुध्दि को अंजाम देना प्रारम्भ किया उस समय भी हर एक को चंद्रावल व्रत करने और दान पूण्य करने की बड़ी महिमा थी । आर्य समाज ने इसे कुंजी के रूप में पकड़ लिया।
आर्य समाज ने शुद्धि की जो प्रक्रिया या कर्मकांड अपनाया था। उसमे यज्ञ और वेद मंत्रोच्चार होता था। पंडित के द्वारा यज्ञ करवाना, गायत्री मन्त्र उच्चार और जनेऊ का धागा पहनाना तथा साथ ही हरिद्वार जाना था। इन कर्म कांडों द्वारा उन्हें द्विज बना दिए जाने पर भी उन्हें सामाजिक स्तर पर द्विजत्व की मान्यता नहीं मिल रही थी। आर्य समाज ने उनमे यह आशा पैदा की कि इस प्रकार वैदिक धर्म की पालना करते हुए एक न एक दिन वे द्विजत्व प्राप्त कर ही लेंगे। साथ ही आर्य समाजी रूढ़िग्रस्त जात पात का मुखरित विरोध भी करते थे और कर्म आधारित जाति की वकालत करते थे।...... मेघों ने देखा की यज्ञ करने, जनेऊ धारण करने से भी हिन्दू समाज में उनकी स्थिति निम्न ही मानी जा रही है तो उनका जोश ठंडा पड गया। साथ ही और भी कई कारक रहे। जो धार्मिक संत या साधू मार्गी थे। जो संध्या और भजन कीर्तन अपने परंपरागत तरीके से करते थे, उन्हें भी ये कर्मकांड उपयुक्त नहीं लग रहे थे, हालाँकि बहुत से लोग इससे जुड़ चुके थे। हरिद्वार जाने की एक नयी परंपरा भी उन्हें रास नहीं आ रही थी। फिर भी हरिद्वार जाने वाले और जाकर आने वाले के इन आर्य समाजियों द्वारा बड़ी भारी महिमा गयी जाती थी। यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक प्रभाव था। कई लोग सिर्फ इसलिए नहीं जा सकते थे कि उनके पास न तो जाने के साधन थे उर न धन आदि।...... आर्य समाज ने इस पर गहन मंथन किया। सनातनी हिंदुओं के विरोध और मेघों के अपने रीति रिवाजों को देखते हुए शुद्धिकरण के कर्मकांड को नया रूप दिया गया। उन्होंने इसे मेघों की परंपरा के अनुकूल बनाने हेतु इस में जो कुछ परिवर्तन किया उसमें हरिद्वार जाने की बाध्यता या अनिवार्यता तो खत्म कर दिया और उनमे जो चंद्रावल व्रत का विधान था उसे कुछ रदो बदल के साथ स्वीकार कर लिया। इस प्रकार से आर्य समाज ने उस समय के मेघों को उसी में बने रहने या उसे अंगीकार करने की मनोवैज्ञानिक भूमिका बना दी।
यह ध्यातव्य है कि मेघ लोग परंपरागत रूप से चंद्रावल व्रत करते आये थे और उसे एक बड़े उत्सव की तरह सामाजिक स्तर पर सम्पादित करते थे। यह प्रायः शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन नए चंद्रमा के साथ ही होता था। कभी कभी इसे षष्ठी, अष्टमी और पूर्णिमा आदि के दिन भी सम्पादित किया जाता था। इसका क्रिया विधान उनके आध्यात्म गुरु के द्वारा होता था। उजोवना और व्रत इसमे महत्वपूर्ण होता था। चंद्रावल व्रतधारी मेघ संकल्प के साथ निश्चित व्रत रखता था और वे पूरा होने पर चंद्रावल का ब्रत उजोया जाता था। व्रतधारी निराहारी रहता था और व्रत समाप्ति चंद्रावल के उत्सव के साथ ही पूरी होती थी। आर्य समाज ने इसे अपने शुद्धि यज्ञ में शामिल कर मेघों को आकर्षित किया। ये लोग यह भी प्रचारित करने लगे कि आपके व्रत के साथ वेदों के मंत्रोच्चार और यज्ञ आदि से अधिक पूण्य प्राप्ति आदि होगी। उसी समय ब्रत उत्सवों की महिमा की पुस्तकें भी प्रचुर मात्र में छपने और प्रचारित होने लगी।
आर्य शुद्धि यज्ञ में अब हरिद्वार की अनिवार्यता ख़त्म कर दी गयी और चंद्रावल ब्रत को समाहित कर लिया गया। जो शुद्धि के द्वारा आर्य बनना चाहता था उसे 15 दिन तक ब्रत करना अनिवार्य कर दिया। इस व्रत में वह सिर्फ दूध ही ग्रहण कर सकता था। फिर 15 दिन पुरे होने पर वाही वैदिक यज्ञ मंत्रोच्चार, यानि गायत्री और धागा पहनाया जाता.....धीरे धीरे इसे भी 3 तिन का कर दिया गया.

आर्य समाज की शुद्धी और मेघ: 12
आर्य समाज जिस तरह की समाज व्यवस्था का सपना देख रहा था, वह उनका आदर्श समाज था और इस आदर्श समाज की रचना में स्वामी दयानंद ने जिन ग्रंथों को आर्य समाज द्वारा प्रमाणिकता प्रदान की उसमें मनु स्मृति भी एक थी। यह अलहदा बात है कि फिर भी सनातनी हिन्दू इसका जी जान से विरोध कर रहे थे, हालाँकि बाद में उनमें मौन समझोता हो गया और आज आर्य समाज की जो हालात है, वह उसके इसी मौन समझौते का परिणाम है, जिसमें सनातनी हावी हो गए। परंतु उस अवधी में इनके सम्बन्ध एक तरह से द्वेषपूर्ण ही थे । एक सुदीर्घ परंपरा के विरुद्ध आवाज उठाना साहस का ही कार्य था। आर्य समाजी अब दबे कुचले अस्पर्शय जातियों में जोश भरने लगा और उनको एक जाति के दायरे में बराबरी का हक़ दिलाने हेतु प्रतिबद्ध था। उनका रास्ता जैसा भी था, उनमें प्रतिबद्धता तो थी ही।
जिन लोगों को शुद्धि के द्वारा आर्य बनाया जा रहा था, वे कतिपय मामलों में सशंकित थे और कई मामलों मेंउनकी हिचक को आर्य समाज की पत्र पत्रिकाओं और पुस्तकों में वर्णित भी किया है।एक दो का दृष्टान्त यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। इक जगह आर्य समाजं के नेता राम भज दत्त डोम लोगों को आर्य धर्म समझा रहे थे। पहले तो लोग उनकी सभाओं में नहीं आते थे, तो ये लोग खुद उनके घर घर और गली मोहलेनमे जाकर उन्हें हौसला बांधते और उनमें जज़्बा पैदा करते, फिर सार्वजनिक रूप से यज्ञ कर उन्हें आर्य धर्म में प्रवेश कराते। आप देखिये कि जब इन डुमना लोगों के बीच ये गए तो कोई नहीं आये। फिर ये लोग घर घर जाकर उन्हें तैयरिं करके एक जगह लाये। उन्हें विस्वास दिलाया कि उनके नागरिक अधिकार भी उच्च जातीय लोगों के बराबर ही है और वे इसे स्वीकार करते है... आदि आदि.. ऐसा भरोसा दिलाकर राम भज दत्त इन डुमना लोगों को कुँए पर ले गए और उन में से एक को कहा कि अब तुम कुँए से पानी भरो, जैसे दूसरी उच्च जाति के लोग भरते है. वह व्यक्ति इतना साहस नहीं जुटा पाया कि वह उन्मुक्त पानी भर सके. भीड़ द्वारा उसकी हौसला अफ़जाई की गयी। उसे कहा गया कि वह बिरादरी से कुँए से पानी निकलने के लिए आज्ञा मांगे. सब लोग तुम्हें आज्ञा दे देंगे, तो तुम पानी भर लेना. उसने पहली बार आज्ञा मांगी, भीड़ ने उसे पुर जोर आज्ञा दी कि हाँ तुम पानी ले सकते हो... ईएसआई आज्ञा तीन बार ली गयी।और अंततः उसने पानी भरने का साहस जुटा लिया।। इसका बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता था। ऐसा एक नहीं बल्कि कई मामलों में आर्य समाज द्वारा किया जाता था। फिर उसके बाद सार्वजनिक यज्ञ और यज्ञोपवीत होता। सार्वजिनक होने का भी अपना प्रभाव था.... इस प्रकार की गतिविधियाँ निश्चित रूप से सनातनी लोगों के कोपभाजन भी बनती. और कई मामलो में आर्य समाज द्वारा इन लोगों को द्विज बना दिए जाने पर भी उनको आम नागरिक अधिकार उपभोग करने नहीं देते थे तो आर्य समाजी नेता उनका अलग्नसे प्रबंध भी करते। उनके लिए अलग कुँए, पाठशालाएं आदि बनाना इसी का एक हिस्सा था। मेघ सभा या मेघ उद्धार सभा के माध्यम से भी जो उनके लिए स्कूल या प्रशिक्षण शालाएं खोली गयी वो इसी का एक हिस्सा थी।

मैंने आर्य समाज और मेघ पर पोस्ट डाली थी, उस पर और लिखा जायेगा। क्योंकि मेघों के लिए वह एक संक्रतिकारी युगान्तर था। आप लोग उसे पढ़िए. वह 1880 से 1950 तक का संक्षिप्त लेखा जोखा है। अभी तक 1925 तक का मोटा मोटा आंकलन किया है। इसके बाद का भी लिखूंगा, और आपके जो संत हुए हैं और जानकारी में आये है तो उनका भी जिक्र होगा, किस तरह से वे भी सनातनी, आर्य समाजी और महाधर्म में बंट गए। धीरे धीरे आजादी के बाद मनुवाद के प्रचारक बन गए और प्रशंसा व प्रतिष्ठा के भूखे बन कर इस कौम को मुनुवाद की तरह धकेल गए। शायद वे पोस्टें आपको अच्छी नहीं लगे!
फ़िलहाल बात यह है कि जब मेघों का आर्यकरण या वैदिकीकरण या हिन्दूकरण किया जा रहा था, तो यह बात शुध्दि वाले भलीभांति से जानते थे कि किस तरह से इन्हें हिन्दू मान्यताओं में रमाया जाय। इसको किसी धार्मिक आस्था के बल पर ही किया जा सकता था। अतः हरिद्वार में जाकर गंगा स्नान करने से शुद्धि और मुक्ति को जोर शोर से प्रसारित किया गया और उनमें आस्था का बीजारोपण किया गया। पहले पहल पंजाब से ही इसकी शुरुआत हुई। इससे पहले मेघों के लिए गंगा से ज्यादा पवित्र नदियां वे थी जो उन्हें जीवन प्रदान कर रही थी, यथा: चेनाब, सतलज, चंद्रभागा या जो भी उनकी भाषा में उनके नाम रहे हो। इस प्रकार से नदियों के प्रति उनकी आस्था को गंगा की ओर मोड़ दिया गया और हिन्दू पौराणिक साहित्य के प्रचार से उसे मजबूत किया गया। दूसरा हिन्दू धर्म में सामिल होने की ललक ने भी उनमें गंगा के प्रति आस्था को बढ़ाया। मोक्ष की परिकल्पना ,जो उनकी मान्यता से मेल खाती हुई थी, उसे भी इससे जोड़ दिया गया और अब न केवल शुद्धि के लिए बल्कि किसी की मृत्यु के बाद सूतक निवारण के लिए भी गंगा को तव्वजो दी जाने लगी। मृत्युपरांत गंगा नहाना का प्रचलन बहुत बाद में आया, पहले जब शुद्धि की धारणा उनमे बलवती हो गयी तो मृत्युपरांत गंगा स्नान को भी एक पुण्यकारी और मोक्षकारी कृत्य के लिए महिमा मंडित किया गया।
इस प्रकार 20 वीं शताब्दी में गंगा की ओर मेघों में आस्था पलने लगी। इस पर भी जगह जगह विवाद और विमर्श होते रहे और आज भी होरहे है। आर्य समाज का तो गंगा के प्रति आकंठ लगाव था ही, हिन्दू सनातन वादी यानि की वेड वादी भी इसमें पीछे नहीं रहे और उसे नए रंग रूप में वैदिक कर्म कांड से जोड़कर मजबूत किया। राजस्थान या मारवाड़ में इसकी कोई चाप उस समय नहीं दिखाई देती है। पर जब आर्य समाज की विचारधारा का इधर प्रचार हुआ तो यहाँ भी यह प्रचलन में आई। आर्य समाज के अनुसरण में मेघों के कुछ साधू संतों ने भी इसकी महिमा गाणी शुरू की। इस प्रचार का जोर उनके हिंदूवादी होने के जोश के साथ ज्यो ज्यो बढ़ाता रहा, यह आजादी के अस्स पास ज्यादा ही विमर्श का मुद्दा बना. गोकुल दास जी जैसे संतों ने प्रत्यक्ष तो पैरवी नहीं की, पर उन्होंने इसकी खूब महिमा गयी और पुष्कर स्नान से इसकी तुलना की। गंगा नहाएं या पुष्कर. इसप्रकार यह समाज में समाहित हुआ प्रचलन सब उनकी बेड़िया बन चूका है। यह ध्यान देने योग्य है की पहले इनको हरिद्वार में भी स्नान करने नहीं देते थे! जिसे गंगाराम पंडित जैसों से संपन्न करवाया गया। दक्षिणा के फेर में स्वयं गंगाराम मारवाड़ किंवा राजस्थान के कई भागो में घुमे और लोगों को कन्विंस किया। धन कि कमी होने पर उनके खुद के द्वारा व्यवस्था आदि कई चीजे थी, जिसने मेघों को इस से बांधा.......

राजस्थान की हर एक अनुसूचित जाति की जनसंख्या जनगणना 2001 व जनगणना 2011 के आंकड़े

I am giving here below census figures of individual scheduled castes of Rajasthan, both of census 2001 and that of 2011 for reference and study. यहाँ राजस्थान की हर एक अनुसूचित जाति की जनसंख्या जनगणना 2001 व जनगणना 2011 के आंकड़े आपके ध्यान और अध्ययन के लिए दिए जा रहे है. प्रथम संख्या सन् 2001 की है व दूसरी संख्या 2011 की।
सन् 2001 में sc की कुल जन संख्या 96 94 462 थी जो सन् 2011 में एक करोड़ से ऊपर पहुँच गयी व कुल जनसँख्या आंकी गयी-1 22 21 593. जिसमें विभिन्न जातियों की संख्या के आंकड़े निम्न है.
आदि धर्मी: 308 = 412
अहेरी : 2748 = 5567
वादी : 4928 = 15833
बागरी : 40911 = 64334
बैरवा : 931030 = 1260685
बाजगर : 5240 = 911
बलाई : 643189 = 708518
बंसफोड़ : 5903 = 9187
बाओरि : 290399 = 405573
वर्गी : 10739 = 12096
बावरिया : 60121 = 62585
बेड़िया : 3092 = 4833
भांड : 18977 = 25711
भंगी,मेहत्तर,,ओलगाना, रूखी, मलकाना, हलालखोर, लालबेगी, कोरार, झाड़ माली आदि: 375326 = 466315
बिदकिया : 70 = 456
बोला : 402 = 2397
चमार,( चमार, भांभी, बाम्भी, जटिया, जाटव, जाटवा, मोची, रैदास, रोहिदास, रेगड, रैगर, रामदासिया, असादरु, असोदि, चमाड़िया, चम्भार, चामगर, हरलय्या, हराली, खलपा, माचीगर, मोचिगर, मदार, मादिग्, तेलगू मोची, कामटी मोची, रानिगर, रोहित, सामगर, आदि ): 2465563 = 2491551
चांडाल। : 1344 = 1415
दबगर। : 1969 = 2169
धानक, धानुक। : 94275 = 114159
धनकिया। : 2074 = 1447
धोबी। : 151612 = 190273
ढोली : 101589 = 134287
डोम : 3329 = 4507
गांडिया : 301 = 382
गारांचा, गांचा। : 6716 = 11566
गरुडा : 37436 = 52652
गवारिया : 63228 = 85741
गोधि : 273 = 438
जीनगर : 42774 = 53540
कालबेलिया, सपेरा : 75118 = 131911
कामड़, कामड़िया : 8490 = 11871
कंजर। : 37971 = 53816,
कपाड़िया सांसी। : 1257 = 2600,
खंगार। : 6126 = 10263,
खटीक। : 330816 = 381447,
कोली, कोरी। : 453074 = 539920,
कुचबंद : 933 = 2921,
कोरिया। : 394 = 1770,
मदारी : 32625 = 43880,
महार, धैगु मेगु आदि। : 7241 = 1980,
मह्यावंशी धेढ़ आदि : 325 =1289,
मजहबी : 130649 = 158698,
मांग-मातंग आदि : 249 = 2089,
मांग-गारोडी आदि : 10 = 55,
मेघ, मेघवाल.. : 2060454 = 3060418,
मेहर : 52014 = 79689,
नट, नुट : 43565 = 65904,
पासी : 7995 = 4025,
रावल : 26478 = 28651,
सालवी : 57255 = 85719,
सांसी : 60365 = 86966,
सातिया, साटिया। : 9150 = 12330,
सरभंगी : 395 = 563,
सरगरा : 113947 = 138917,
सिंगीवाला : 5363 = 15879,
थोरी, नायक : 650373 = 839204,
तीरगर : 3824 = 5373,
तूरी : 3682 = 4963.
                                                                                                                                 जानकारी इतिहासकर ताराराम गौतम से 

बुधवार, 27 जनवरी 2016

जातिवाद मिटाने का वातावारण बनाईये:- ताराराम गौतम


संत मत से निकले जितने भी पंथ है- उनका एक मजबूत आधार समाज में व्याप्त जातिपरक भेदभाव, कुरीतियाँ और अन्धविश्वास से उत्पन्न उर्वरा भूमि थी। परन्तु आज वे सभी वापस उसी दल-दल में फंस गए। उसका सबसे बड़ा कारण यही कहा जा सकता है कि उनका कोई मजबूत दर्शन-पक्ष नहीं था, जो हर जिज्ञाषा और प्रश्न का माकूल जबाब देता। यही कारण है कि दादू, रैदास, कबीर, सेन, बाबा रामदेव, पलटू, जम्भा या वैष्णव या अन्य विद्रोह के जितने भी स्वर थे, आज नाम भर के
रह गए है। उनका मिशन पुन: ब्राह्मणवादी जातिपरक व्यवस्था की दल-दल में धंस गया और वैदिक या सनातनी लोगों से ज्यादा इनकी बांगे सुनाई देती है। नया मुल्ला जोर से बांग देता है- मुहावरा सार्थक। आजकल ये सभी बिगड़े हुए रूप में मौजूद
है। जो अपना मूल आधार भूल चुके है और भूलभुलैया में खो चुके है। वैदिक धर्म के विरोध में उभरे ये पंथ आज पुनः वैदिक
दल दल में धंस चुके है। दूसरा कोई इनका सुधार नहीं कर सकता। इनका अपना सुधार ये खुद ही कर सकते है । अगर
ऐसा नहीं हुआ तो लोग धीरे धीरे इनसे दूर होते जायेंगे। ऐसा मेरा विश्वास है।
यह इसलिए हुआ क्योंकि उनका दार्शनिक आधार मजबूत नहीं था। अतः ब्राह्मणवाद ने उनके लिए वह आधार बना कर अपने में खपा दिया और उनके विराट व्यक्तित्व को ब्राह्मणवाद में छोटा कर दिया। डॉ आंबेडकर इस बात को जानते थे इसलिए
उन्होंने अपनी विचारधारा को एक मजबूत आधार दिया। जिसमे छेड़ छाड़ की गुन्जाईस बहुत कम है। यह एक बड़ा फर्क इन संतो के आन्दोलन और डॉ आंबेडकर के आन्दोलन में है।
सौराष्ट्र में बाबा साहेब ने अस्प्रश्यों को आपसी जात-पात तोड़ने का उपदेश दिया । एक जंगी सभा हुई। कुछ जातियां आगे आई। उन्होंने ऐसा किया। बाकी पिछड़ी जातीय आगे निकल गयी। आगे वाली आगे ही रही। जिन्होंने ऐसा किया वे गिर गयी। मैंने इसका उल्लेख अन्यत्र किया है। इसलिए सावधान रहे।
जातिवाद मिटाने का वातावारण बनाईये। सभी लोग जातियों को ख़त्म करिए। एक दूसरे पे दबाब से जातिवाद ख़त्म नहीं होता । वह जातीय संघर्ष का छुपा रूप होता है। कुछ लोग तथाकथित निम्न जातियोंको जाति तोडने का कहेंगे, कहते है, पर उच्च जाति के लोगों को नहीं कहेंगे या नहीं कहते है- इसका सीधा सा अर्थ यही है कि वे जाति को बहुत महत्त्व देते है, उनकी जाति गत उच्चता बनी रहे इस हेतु ही वे निम्न जातियो को जाति तोड़ने का उपदेश देते है। इस में बहुत बड़ा दोगलापन है।
Tararam goutam 

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

अगर चाहते हो की दुबारा किसी रोहित की हत्या न हो तो सरकार पर दबाव बनाओ

अगर चाहते हो की दुबारा किसी रोहित की हत्या न हो तो सरकार पर दबाव बनाओ की वो रिजर्वेशन की खाली पड़ी सीट पर 1 महीने के अंदर नियुक्तिया करे ताकि आरक्षित वर्ग के मनुवादी लोग ऐसा घिनोना खेल न खेल सके।
दोस्तों अगर रोहित के collage मैं भी आरक्षित वर्ग के शिक्षक होते जो उसको सपोर्ट करते तो आज ऐसा नहीं होता। ऐसे तो न जाने कितने हादसे होते है जहा आरक्षित वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रो को आत्महत्या के नाम पर मार दिया जाता है और कोई खबर तक नहीं होती। IIT और ऐसे ही बड़े संसथान इनका प्रमुख केंद्र है। आज भी IIT मैं sc/st वर्ग के लोगो को 2 या 3 सेमिस्टर मैं अयोग्य साबित करते बाहर कर दिया जाता है । हमारे वर्ग के लोग IAS/PCS DOCTOR तो बन जाते है पर IIT से इंजीनियरिंग नहीं कर पाते क्यों? ऐसे और भी बहुत से सवाल है जिनका किसी के पास कोई जवाब नहीं है। इन सब समस्याओ का एक ही हल है की शिक्षा वयवस्था मैं अपनी भागीदारी बढ़ाओ। इसके लिए एक आंदोलन करना होगा और जिसकी सुरुवात आज ही होनी चाहिए।
कृपया इस सन्देश को आगे भी प्रसारित करे।
धन्यवाद
जय भीम।

सोमवार, 18 जनवरी 2016

मेघ समुदाय में मेघों के धर्म के विषय पर टिप्पणी -ताराराम

मेघ समुदाय में मेघों के धर्म के विषय पर कुछ कहना टेढ़ी खीर है. यदि किसी को अपने धर्म के बारे में
 ठीक-ठीक नहीं मालूम तो आप उससे क्या अपेक्षा रखेंगे. यह विषय गहन गंभीर है क्योंकि-
 (1) धर्म व्यक्ति की नितांत व्यक्तिगत चीज़ है, इसे वह सब के सामने नहीं भी रखना चाहता.
(2) भय के कारण वह सबके सामने वही रखता है जो लोक में प्रचलित है या कमोबेश स्वीकृत है.
 विभिन्न लोगों की आपसी बातचीत से कुछ तथ्य सामने आए जिन्हें नीचे संजोया गया है.
 1. मेघ अपने धर्म का इतिहास तो दूर वे अपना इतिहास तक नहीं जानते. जो थोड़े-बहुत जानते हैं वे -
 टुकड़ों में जानते हैं. उलझन में पड़े हैं. बहुत से पढ़े-लिखे (literate) हैं लेकिन शिक्षित (educated) कम हैं. वे इस विषय में तर्क नहीं कर पाते और भावनाओं की मदद लेते हैं. ऐसा भी नहीं है कि तर्क योग्य बिंदुओं का अभाव है परंतु यह सत्य है कि शिक्षा और आर्थिक स्रोतों की कमी के कारण उनमें से अधिकतर उन तर्क बिंदुओं तक पहुँच नहीं पाते. दोष किसका है?
 2. हालाँकि व्यक्ति के धर्म और लोक धर्म में कई बातें समान हो सकती हैं. उनके बारीक ताने-बाने को बुद्धिजीवी क्रमवार समझने का प्रयास करते हैं. कबीर, महात्मा ज्योतिराव फुले और डॉ. अंबेडकर की परंपरा में कइयों ने यह कार्य किया है लेकिन हम उनकी वाणी पढ़-सुना कर धन्य हो जाते हैं. उनकी कही बातों में छिपे इतिहास और परंपरा को समझने का प्रयास नहीं करते.
 3. एक विशेष उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ. मार्च, 1903 में आर्यसमाज ने 200 मेघों का शुद्धीकरण (?) करके उन्हें हिंदू दायरे में लाने का पहला प्रयास किया. बाद में बहुत से मेघों का शुद्धीकरण किया गया . मेघों की गणना हिंदुओं में करने से स्यालकोट के उस क्षेत्र में मुस्लिमों की संख्या 50 प्रतिशत से कम हो गई इससे हिंदुओं के नाम पर आर्यसमाज/हिंदुओं को अंग्रेज़ों से काफी लाभ मिले थे. लेकिन यह सवाल स्वाभाविक उठ खड़ा होता है कि आज की तारीख में कितने मेघ आर्यसमाजी हैं और कि आर्यसमाज के एजेंडा में मेघ कहाँ हैं. जो मेघ पाकिस्तान में रह गए थे उनमें से काफ़ी इस्लाम को अपना चुके हैं. जो अभी भी हिंदू हैं वे अपना हाल बताना चाहें भी तो सीमा पार से उनकी आवाज़ कम ही आती है. वे अल्पसंख्यक हैं और अन्य
 अल्पसंख्यकों की भाँति अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पाकिस्तान में रह गए मेघवालों और मेघवारों का भी यही हाल है. राजस्थान में रह रहे मेघवाल अपने एक पूर्वज बाबा रामदेव के मंदिरों में जाते हैं. गुजरात के मेघवारों ने अपने पूर्वज मातंग ऋषि के बारमतिपंथ को धर्म के रूप में सहेज कर रखा है और उनके
अपने मंदिर हैं.
 4. जो मेघ भारत विभाजन के बाद भारत में आ गए वे आर्यसमाज के एजेंडा से बाहर हो गए क्योंकि यहाँ हिंदुओं के रूप में उनकी कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी. साथ ही वे कई अन्य धर्मों/पंथों में बँट
 गए जैसे राधास्वामी, निरंकारी, ब्राह्मणीकल सनातन धर्म, सिख धर्म, ईसाई धर्म, विभिन्न गुरुओं के डेरे-गद्दियाँ आदि. सच्चाई यह है कि जिसने भी उन्हें 'मानवता और समानता' का बोर्ड दिखाया वे उसकी ओर पाँच रुपया और हार लेकर दौड़ पड़े. इससे उनका सामाजिक स्तर बदलने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था , धार्मिक दृष्टि से भी उनकी अलग पहचान नहीं बनी. राजनीतिक पार्टियाँ अपने वोटों की गिनती करते समय हिंदुओं, सिखों, मुसलमानों और ईसाइयों के वोट गिनने के बाद "बाकियों के वोटो" में मेघों को गिन भर लेती हैं. विशेष महत्व नहीं देतीं कारण यह कि मेघों ने सामूहिक निर्णय कम ही लिए हैं.
 5. मेघ जानते-बूझते हैं कि मंदिरों में उनके पुरखों के जाने पर मनाही थी. वे आज भी धर्म के भय से उबर नहीं पाते. इस स्थिति पर उन्हें ख़ुद पर क्रोध तो आता है लेकिन वे तर्कहीन पौराणिक कथाओं से प्रभावित हैं. वे
 देवी-देवताओं के मंदिरों की ओर आकर्षित हैं. कला और धर्म के मेल से असीमित कृतियाँ बन सकती हैं. उससे कहीं धर्म तो गायब नहीं हो जाता?
 6. वे मंदिरों में जाना चाहते हैं लेकिन ब्राह्मणीकल धर्म के प्रति आशंकित भी हैं. गुलामी के दौर में अत्यधिक
 जातीय हिंसा झेलने और अशिक्षा के कारण वे जात-पात को भुलाने की प्रबल इच्छा रखते हैं लेकिन यह कैसे हो. जातिवाद को खत्म करने की इच्छा दलितों में है क्योंकि वे इससे पीड़ित हैं. गैर दलित जातियाँ इस बारे में
गंभीर नहीं हैं.
 7. मेघों की नई पीढ़ी कबीर की ओर झुकने लगी है और बुद्धिज़्म को एक विकल्प के रूप में जानने लगी है बिना जाने कि कबीर और बुद्ध की शिक्षाओं में ग़ज़ब की समानता है. देखने में आया है कि ये पीढ़ी अगर मंदिरों में जाने लगी है तो वहाँ के कर्म-कांडों और वहाँ से फैलाए जा रहे अंधविश्वासों के प्रति जागरूक है. वहाँ मूर्तियों को दूध- दही चढ़ाने, दूध पिलाने आदि केआडंबर के विरोध में है.
 8. युवा मेघ पूछते हैं कि शूद्र खास अपने मंदिर क्यों नहीं बनाते? शायद वे नहीं जानते कि वे देवी-देवताओं की मूर्तियों वाले अपने खास मंदिर बना लेंगे (कबीर मंदिर को छोड़) तो अन्य जातियों के लोग विशेषकर ब्राह्मण उन पर कब्ज़ा जमाने के लिए आ जाएँगे क्योंकि मंदरों में धन लगातार टपकता है. यह एक भरा-पूरा व्यवसाय है. अपने समुदाय द्वारा बनाए गए कबीर मंदिरों में चढ़ा पैसा मेघ अपने उत्थान के लिए प्रयोग में ला सकते हैं. वैसे उन मेघों की संख्या काफी है जो इष्ट के रूप में कबीर को सब कुछ देने वाला मानते हैं और उससे शक्ति ग्रहण करते हैं.
 9. कुछ मेघ इस अनुभव से गुज़रे हैं कि कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों का प्रयोग जातीय भेदभाव फैलाने के लिए होने दिया जाता है. अतः वे भगवान को तो मानते हैं लेकिन इसके लिए किसी मंदिर में जाने की अनिवार्यता महसूस नहीं करते न ही वे ऐसे मंदिरों में दान देना चाहते हैं. वे समुदाय के लिए या कबीर मंदिर के लिए दान देने में विश्वास रखते हैं. तथाकथित हिंदू धर्म ग्रंथों (जो ब्राह्मणों द्वारा लिखे हैं) पर उनका विश्वास समाप्त हो रहा है क्योंकि ये ग्रंथ जातिवाद बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं.
 10. अंत में यह कहना पर्याप्त होगा कि मेघों में संशयवादी विचारधारा के लोग भी हैं जो भगवान, मंदिर, धर्मग्रंथों, धार्मिक प्रतीकों आदि की आवश्यकता महसूस नहीं करते बल्कि देश के संविधान पर भरोसा रखते हैं.

ताराराम जी 

शनिवार, 9 जनवरी 2016

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति भाग 2 - लेखक- ताराराम पुस्तक-सार

मेघवंश : इतिहास और संस्कृति - लेखक- ताराराम पुस्तक-सार
 भारत में अनगिनत जातियाँ हैं. अनुसूचित जातियों की संख्या भी बहुत बड़ी है जो 6000 से अधिक नामों में
 बँटी हुई हैं. ’मेघ‘ जाति 10 राज्यों और 2 केन्द्र शासित क्षेत्रों में अधिसूचित अनुसूचित जाति है. 8 राज्यों में यह ’मेघ‘ नाम से अधिसूचित है. छतीसगढ़ व मध्यप्रदेश में यह केवल ‘मेघवाल‘ नाम से अधिसूचित है. महाराष्ट्र में मेघवाल व मेंघवार नाम से, गुजरात में मेघवार, मेघवाल व मेंघवार नाम से तथा राजस्थान में ‘मेघ‘ के साथ मेघवल, मेघवाल और मेंघवाल के नाम से अधिसूचित है. जम्मू-कश्मीर में मेघ व कबीर पंथी के नाम से अधिसूचित है. कश्मीर से लेकर कोयम्बटूर तक कोई भी ऐसा प्रदेश नहीं है जहाँ यह जाति अधिसूचित नहीं है. यह संपूर्ण भारत के विस्तृत भू-भाग में निवास करने वाला एक प्राचीन समाज है. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पं. बंगाल और पूर्वी राज्यों में यह अनुसूचित जातियों में शुमार नहीं है. दक्षिण में केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और उड़ीसा में भी मेघ अनुसूचित जातियों में शुमार नहीं है. जिन प्रदेशों में यह जाति अधिसूचित नहीं है, वहाँ भी इस जाति के लोग निवास करते हैं, परंतु उसके प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं है. परंपरागत रूप से मेघ लोग एक ही वंश के लोग हैं. ये अपने आपको 'मेघ', ‘मेघवंशी‘ कहते हैं. शौर्य, पुण्य-प्रताप, कीर्ति और ख्यातिप्राप्त 'मेघ' (ऋषि) को अपना आदि पुरुष को मानते हैं. इस प्रकार 'मेघ' के वंशधर ही मेघ नाम से जाने गए व हिंदू धर्म के उत्थान के साथ यह समाज धीरे-धीरे एक जाति के रूप में अलग-थलग पड़ा और वंचित (आज की अनुसूचित) जातियों में शामिल हो गया. मेघवंश के संस्थापक से संबंधित मान्यताएँ मेघ जाति से संबंधित सभी परंपराएँ और मेघ जाति की उत्पत्ति 'मेघ' नामक पुरुष के वंशधरों से होना स्वीकार किया जाता है. मेघों की कुछ परंपराएँ इसके प्रतिष्ठापक आदि पुरुष मेघ के समान ही क्षत्रिय मूल की और कुछ परंपराएँ ब्राह्मण मूल की हैं. इनके तहत संस्थापक-पुरुष 'मेघ' के नाम के साथ सिरी, चन्द, कुमार और रिख शब्द प्रयुक्त किया जाता है. इस प्रकार इस आदिपुरुष को मेघसिरी, मेघचन्द, मेघकुमार और मेघरिख कहा जाता है. इनको मानने वाले सभी लोग एक ही परंपरा और एक ही वंश के हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है. मेघों की ऐतिहासिकता मेघवंश भारत का एक ऐतिहासिक व प्राचीन समाज है. डॉ. नवल वियोगी 'मेघ' जाति को महान भारत में वर्णित 'मद्र' जाति से समीकृत करते हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार के. पी. जायसवाल आदि इसका उत्थान कोसल से, कुछ कन्नौज के राजा विमलचन्द्रपाल के पोते मेघचन्द से, कुछ गंधार-कश्मीर से व कुछ वर्तमान राजस्थान के प्राचीन भू-भाग से मानते हैं. ऐतिहासिक रूप से कोसल-बघेलखंड से इस जाति के उत्थान के सुस्पष्ट प्रमाण प्राप्त होते हैं. गंधार-कश्मीर में 6ठी शताब्दी के बाद के प्रमाण मिलते हैं. राजस्थान से मेघ जाति का उद्गम मानने वाली मान्यता ‘धारूमेघ‘ को ही मेघ और मेघ रिख
 मानती है जिसकी उपस्थिति मालाणी (राजस्थान का बाड़मेर जिला) के अधिपति माल दे (मल्लीनाथ) की
 समकालीन है. इस प्रकार तथ्यों के आधार पर इसका उद्गम कोसल से माना जा सकता है, जो उस समय सिंधु घाटी सभ्यता का ही एक प्रमुख भू-भाग था. मेघ लोग वहीं से भारत के विभिन्न भू-भागों में आए व गए. अपनी
 परिस्थिति के लिहाज़ से ये यहाँ-वहाँ के निवासी बन गए.इस प्रकार मेघवंश एक प्राचीन क्षत्रिय वंश था न कि क्षत्रियों से उत्पन्न हिंदू धर्म की एक जाति. उनकी जाति आधारित हीनता की जड़ें उनके हिंदू धर्म में विलीन होने की प्रक्रिया में छिपी हैं. विलीनीकरण की प्रक्रिया में मेघवंशी अपनी मान्यताओं और विश्वासों पर अडिग रहे परंतु वे
 अपनी विशिष्ट संस्कृति की पहचान खोते गए. धीरे-धीरे वे हिंदू धर्म की हीन जातियों में शामिल हो गए.
 प्राचीन काल में बंदियों और युद्ध बंदियों को दास बना लिया जाता था और ऐसे लोग अपनी स्वतंत्रता खो देते थे. पराजित लोग या तो वहां से कूच कर जाते थे या दासत्व को स्वीकार कर लेते थे. अतः स्पष्ट है कि मेघों के द्वारा ‘सागड़ी‘ या हाली‘ के रूप में दासत्व को स्वीकार करना उनकी पराजय का परिणाम है. दासत्व को स्वीकार करने वालों में उनकी संख्या अधिक थी, जो राजनीतिक कारणों से पीड़ित होते थे अथवा विषम परिस्थितियों के शिकार हो जाने पर दासता की ओर उन्मुख होते थे. मेघों के दासत्व स्वीकार्य में भी उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों या व्यवसायों का निश्चित रूप तय नहीं था. उनसे कपड़ा बनवाना, खेती-बाड़ी का कार्य करवाना, ढोर-पशु की देखभाल करवाना, चमड़े का काम करवाना आदि कोई भी कार्य निष्पादित करवाए जा सकते थे, परंतु अधिकांश मेघों ने कपड़े बुनने के कार्य में ही अपने को संलग्न किया और एक तरह से यह पुश्तैनी धंधा बनकर उभर गया.
 इस समाज की जीविका के प्रमुख साधन खेती, खेती मजदूरी और कपड़ा बुनना रह गया. इतना सब कुछ होने के बावजूद भी मेघवाल जाति की उत्पत्ति किसी भी व्यवसाय से नहीं हुई है. वास्तव में यह विशिष्ट मान्यताओं वाला पृथक समूह था जो एक अलग जाति बन गई. मेघों के पराभव का सर्वप्रथम कारण युद्ध में हारना ही रहा है. ऐसे पराजित लोगों को जो जीवनदान मिलता वह अपनी स्वतंत्रता खोकर ही मिलता था. जो लोग किसी तरह से वहाँ से पलायन कर जाते थे, वे भी कहीं और जा कर अन्य प्रभुत्व संपन्न लोगों के मातहत अपनी वास्तविकता को छुपाते हुए जीवन-यापन करने को मजबूर होते थे. परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने व अकाल आदि अन्य कारणों से भी
 उनकी हालत बिगड़ती थी. इस प्रकार इनकी दासता की बेड़ियाँ दृढ़तर होती गईं. तत्कालीन समाज व्यवस्था में ऐसे पराजित दासों की निम्नतर स्थिति बनाने में स्मृति काल ने आग में घी डालने का काम किया. राजस्थान के गोला, दरोगा, चाकर, दास, खानेजादा, चेला इत्यादि जातियों की तरह का दासत्व मेघ समाज के लोगों में नहीं रहा परंतु फिर भी उनका जीवन गुलामी से कम नहीं था. वे अपनी आजीविका के लिए दर-दर भटकते रहे, परंतु दासत्ववृत्ति को कभी स्वीकार नहीं किया. स्थान, समय और हालात के अनुसार विभिन्न व्यवसाय और आजीविका
 अपनाते रहे. ऐसे में वे इधर से उधर, देश-विदेश के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों के साथ जीवन यापन का सहारा खोजने लगे. अतः उनका सामाजिक संगठन भी बिखर गया और वे विभिन्न जातियों में घुलते-मिलते गए. उनका मुख्य पेशा ‘कताई-बुनाई‘ रहा और वे खेत-खलिहनों के धधों पर भी ज्यादा से ज्यादा निर्भर होने लगे. मेघ समाज की जहाँ एक ओर सामाजिक स्थिति निम्न हुई, वे अपनी धार्मिक और सामाजिक परंपराओं पर भी दृढ़
 नहीं रह सके. उनके सामाजिक, धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं पर प्रतिदिन प्रहार होता रहा. उस दौर में उनकी जातीय-पंचायतों में हलचल थी. पराजित मेघ राजाओं और उनकी प्रजा के सामने विकल्प कम थे. इतिहास साक्षी है कि ‘मेघवंश‘ ने अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने हेतु अमानवीय शर्तों के अधीन रहना भी स्वीकार किया, परंतु वैदिक कर्म-कांड और ब्राह्मणी-वितंडावाद से दूर रहे. इस संदर्भ में ऐतिहासिक शोध हमारे इतिहास को समझने में महत्त्वपूर्ण होगा. दासों को अपने स्वामी का नाम ओर गोत्र मिल जाता था. तत्कालीन समय की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था स्पष्ट करती है कि दासों को स्वामी की जाति-गोत्र से ही पुकारा जाता था. इस समाज के लोग न तो स्वेच्छा से दास बने थे और न ही वैदिक व्यवस्था के अंग थे, अपितु हारे हुए लोगों का समूह था या युद्ध बंदी और दास थे. जिनकी दासता की बेड़ियाँ तभी टूट सकती थीं जब उनके पक्ष की विजय हो. ऐसी विशेष परिस्थितियों की अपेक्षा में ये लोग इधर-उधर बिखरने लग गए और संपूर्ण भारत में फैल गए. संभवतः मेघों का पलायन राजस्थान में राजपूतों का पूर्वकालीन ही रहा होगा, क्यों कि जहाँ-जहाँ राजपूत गए, वहाँ-वहाँ ये लोग भी आगे-पीछे भटकते रहे हैं. राजपूतों और मेघों की स्थिति उस समय एक-सी रही होगी, परंतु राजपूतों ने शक्ति संचय कर राजस्थान में अपने ठिकानों की स्थापना करनी शुरू कर दी, वहीं मेघों ने अपने बिखराव की स्थिति के कारण इन नए क्षत्रपों के अधीन अपने को मानना शुरू कर दिया. मारवाड़ में राजपूतों और मेघों के सम्बंध विविधरूपा रहे हैं, जो इस सच्चाई को स्पष्ट करते हैं.
 कतारिये-मेघवाल मेघ-सत्ता की अवनति के बाद शासन-सत्ता का कोई केन्द्र नहीं रह जाने के बावजूद भी देश के कई व्यापारिक मार्गों पर मेघों का आधिपत्य था. राजस्थान से होकर गुजरने वाले इन प्राचीन व्यापारिक मार्गों पर आज भी मेघवालों की सघन बस्तियाँ हैं, जो इस बात को प्रमाणित करती है कि 18वीं व 19वीं शताब्दी तक कई प्रमुख मार्गों पर किसी न किसी रूप में मेघों का कम या ज्यादा आधिपत्य या दबदबा बना रहा. परंतु हर जगह व हर समय यह संभव नहीं होता था. अतः ऐसे सुरक्षा दायित्व में कई बार उन्हें मेहनताना दिया जाता और कई बार उनसे बेगार कराई जाती थी. इस समय भी मेघवाल समाज के कई परिवार व कई लोग अपना खुद का सार्थवाह रखते थे. मेघवालों के सार्थवाह में ऊँटों का काफिला प्रमुख रूप से होता था. ऊँटों पर सामान लादकर ये लोग वर्तमान पाकिस्तान के हैदराबाद, कराची, पेशावर तक सामान का आदान-प्रदान करते थे. मेघवालों के ऐसे काफिलों में संलग्न लोगों को कतारिया कहा जाता था. मेघवालों के कई कतारिया परिवार साख एवं साहूकारी का कार्य भी करते थे और जैसलमेर तथा बाड़मेर के सीमावर्ती इलाकों में इन कतारियों की अपनी पहचान एवं प्रतिष्ठा थीं.
 जैसलमेर, बाड़मेर तथा जोधपुर आदि जिलों की सीमा में बसे मेघवालों के इन कतारिया परिवारों की दुर्दशा आज भी
 देखी जा सकती है. जो कभी-कभार अपने दुख-दर्दों को कहानियों में बयान कर देते हैं. जागीरदारों, सामन्तों, महाजनों और अन्य जंगली एवं बर्बर जातियों की ठगी एवं साठ-गाँठ के ये शिकार हो जाते थे. महाजन व दलालों को सहूलियतें और सुरक्षा मिलने से धीरे-धीरे मेघवाल समाज ने उससे अपने को पृथक कर लिया. सामन्तशाही ने जहाँ मेघों की इस जीविकावृत्ति की उपेक्षा की और उन्हें किसी प्रकार का संरक्षण नहीं दिया, वहीं
 अंग्रेजों ने भी अपने निहित स्वाथों की पूर्ति के लिए महाजनों, दलालों और बिचौलियों को प्रश्रय देकर मेघों की इस
 जीविकावृत्ति पर बुरी तरह से प्रहार किया. अब वे सिर्फ कृषि कार्यों तक सिमटकर रह गए. साथ ही वे छोटे-छोटे मजदूरी के दूसरे धंधों में लग गए. विभिन्न प्रकार के करों से दबे मेघवालों पर भार बहुत पड़ता था. महाजन व बिचौलिये अपने संबंधों से इसमें हेर-फेर कर लेते थे. व्यापार वाणिज्य के इन क्रिया-कलापों के अलावा मेघवाल कौम के व्यक्ति चिट्ठी- पत्री लाने- लेजाने का भी काम करते थे. यह कार्य बेगार के रूप में ही किया जाता था. मेघों ने कई बार इसका सामूहिक विरोध भी किया, परंतु उनको सांत्वना देने वाला तक कोई नहीं था. इस प्रकार
 से कई मेघवाल राजस्थान छोड़कर अन्य प्रदेशों में जा बसे. धार्मिक रीति-रिवाज देवरा मेघवाल समाज के आराध्य-स्थल को विशेष नाम से पुकारा किया जाता है. मेघवंश के ऐतिहासिक समय से लेकर भक्तिकाल तक के समय का विश्लेषण यह सुस्पष्ट करताहै कि इस समाज ने अपने 'आराध्य-स्थल' को कभी भी मंदिर, मस्जिद या मठ के
 रूप में नहीं जाना है. इनके संत पुरुषों या सिद्धों के ‘ध्यान-विपश्यना‘ स्थल को ये ‘धूणी‘ शब्द से पुकारते हैं और ऐसे पुरुषों की स्मृति में बनाए जाने वाले 'मंदिर' या 'मठनुमा' आकृतियों को 'देवरा'
 कहते आए हैं. मंदिर और देवरा या देवरे की परिकल्पना में बहुत बड़ा अंतर है. 'देवरा' या 'देवरे' वस्तुतः मेघवंश के ऐतिहासिक काल में कहे जाने वाले ‘स्तूप‘ का ही पर्याय है, जो मेघवंश के आराध्य स्थल रहे हैं. स्तूप या देवरे महापुरुष के प्रतीकात्मक रूप माने गए हैं, वहीं मंदिर में देव-प्रतिमा की स्थापना सुनिश्चित मानी जाती है.
 वासुदेव शरण अग्रवाल ठीक ही लिखते हैं, 'स्तूप में महापुरुष या बुद्ध की परिकल्पना है और मंदिर में देव की. इस दृष्टि से स्तूप महापुरुष के निर्वाण में चले जाने का शोकात्मक प्रतीक नहीं था. परंतु भौतिक धरातल पर प्रकट होने और पूर्ण आनंद और ज्योति का प्रतीक था. महापुरुष भू-लोक में प्रकट होकर निर्वाण या मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं, यह कोई विषाद या रोने-धोने का हेतु नहीं है, किंतु वे मूर्त रूप में प्रकट होते हैं. यह सार्वजनिक हर्ष और कृतज्ञता का कारण है, जिसके लिए सभी देव और मनुष्य प्रसन्नता व्यक्त करते हैं. यह आनंद का भाव स्तूप के
 सहचरी शिल्पांकन में बारंबार देखा जाता था. महापुरुष का मनुष्य लोक में आगमन किसी दिव्य ज्योति का भूमि पर अवतरण है, जिसकी रश्मि इस लोक में एक ज्वाला के रूप में सदा विद्यमान रहेगी. महापुरुष का प्रतीक स्तूप उसके ज्ञानमय या तपोमय जीवन का उत्तम प्रतीक माना गया और उसकी स्वर्णमयी य रत्नमयी कल्पना की. धीर-धीरे स्तूप भी प्रतीकात्मक मूर्ति रूप में बनने लगे और पूजे जाने लगे.' प्रसिद्ध इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल व प्रो. राधेशरण के इस ऐतिहासिक विवेचन एवं विश्लेषण से यह सुस्पष्ट है कि मेघवाल समाज में ’देवरे‘ की पवित्रता का जो भाव है, वह इस ऐतिहासिक आधार पर ही है. उनके आराध्य-स्थल ‘देवरे‘ किसी मंदिर के रूप में नहीं हैं बल्कि मेघवंश के समय में आराध्य रहे ‘स्तूप‘ का ही अन्य रूप हैं. इन देवरों में महापुरुषों की वह प्रतीकात्मक भावना होती है, जो इस समाज की आध्यात्मिक अवधारणाओं में व्याप्त होती है. 'देवरों' की यह परंपरा निश्चित रूप से 'स्तूप' की अवधारणा पर ही अवस्थित है. इतिहासकारों ने इस अवधारणा के प्रस्फुटन का समय भी मेघवंश का समकालीन माना है. इतिहासकार प्रो. राधेशरण के शब्दों में
 "प्रतीकात्मक स्तूप में किसी महापुरुष के अस्थि-अवशेष नहीं, अपितु वह प्रतीक भावना होती थी, जो जन-मानस में व्याप्त होती थी. बौद्धाचार्यों ने स्तूप को बुद्ध के भव्य व्यक्तित्व का प्रतीक रूप मान लिया था. कालांतर में महान बौद्धाचार्यों के अस्थि-अवशेषों पर भी स्तूप बने. इन समस्त स्तूपों में वही प्रतीक भावना व्याप्त थी. थेरवादियों ने मूर्ति की अपेक्षा स्तूप पूजा को प्रश्रय दिया. इन बौद्धों ने पूज्य भाव संकल्पित स्तूपों का निर्माण शुरू किया. इसी के
 साथ संकल्पित स्तूपों के निर्माण की परंपरा चली. संकल्पित स्तूपों के निर्माण की परंपरा संभवतः शक-कुषाण काल से शुरू हो गई थी, जो संभवतः बाद में भी चलती रही. हमें देउर कुठार में 46 संकल्पित स्तूपों के अवशेष प्राप्त हुए हैं" (प्रो. राधेशरण, पृष्ठ 165) हमें यह सुविदित है कि मेघवंश का काल कुषाणों के परवर्ती काल का समकालीन है, उनके समय में ही स्तूप की अवधारणा जन-मानस में उभरी और जहाँ-जहाँ मेघवंश के उत्तराधिकारी गए अपने पूजा स्थल की यह अवधारणा साथ में ले गए.कुल देवी पूजा 'कुल' की परंपरा सिद्धों की आराध्य परंपरा का वैशिष्ट्य है, जिसे यह समाज मानता आया है. 'पदचिन्हों' की पूजा के अतिरिक्त मेघवाल परिवारों में कुल देवी या इष्ट देवी की पूजा या आराधना की परंपरा भी प्रचलित है. प्रत्येक मेघवाल कुनबे की अलग-अलग कुल देवी होती है अर्थात प्रत्येक 'खाप' की अलग-अलग कुल देवी होती है. देवी को ये लोग 'जोत' करते हैं एवं चढ़ावा भी चढ़ाते हैं.
 एक ही कुनबे या एक ही खाप के लोग प्रत्येक 'मंगल-कार्य' के लिए अपनी कुल देवी को चढ़ावा चढ़ाते हैं. कई खापों में वे अपनी कुल देवी को बकरे की बलि भी चढ़ाते हैं, तो कई खापें अपनी कुलदेवी को ‘चूरमा‘ आदि मीठा
 प्रसाद चढ़ाती हैं. लड़की के घर से विदा होने पर व आने पर 'गवाडी' में प्रवेश करते समय सबसे पहले 'कुल देवी' के
 आराध्य-स्थल पर धोक (पूजा-अर्चना) दिया जाता है. बहु भी अपने ससुराल की कुल देवी को 'धोक' देती है. वह
 भी पीहर जाने से पहले व ससुराल आने पर सबसे पहले कुल देवी के उपास्य स्थल पर अर्चना करती है.
 व्यक्तिगत पूजागृह मेघवाल समाज एक अध्यात्म प्रवर समाज माना जाता है. इस समाज के व्यक्तियों की पूजा-आराधना की विधियाँ या तरीके अन्य समाजों के ऐसे तरीकों से कई अर्थों में भिन्न हैं. अधिकांश मेघवाल परिवारों में अपने-अपने 'पूजा-गृह' होते हैं. इनकी आकृति 'चैत्याकार' होती है. परिवारों के इन व्यक्तिगत 'पूजा- गृहों' में 'पदचिह्न', अपने-अपने इष्ट-देव की प्रतिमा, पूजा में प्रयुक्त होने वाले विविध उपकरण यथा माला, धूप, दीपक आदि रखे होते हैं और ये परिवार नित्य प्रातः-सायं अपने 'इष्ट- देवों' की पूजा करते हैं. इसके अतिरिक्त पुस्तक में मेघवंश के व्रत-उपवास, वेशभूषा, उजोवणा-निमंत्रण, साख्या या साकिया, मरणासन्न मान्यताओं, अंतराभव, शंखोद्धार या संकोढ़ाल, वैशाख स्नान और सांस्कृतिक मूल्यों (खानपान, भोजन-नियम, पगड़ी धारण, आभूषण, गृहनिर्माण परंपरा, वाद्य यंत्र, रोशनी, सफाई-पानी की व्यवस्था, पीळा औढ़ना आदि का भी विशद वर्णन किया गया है.
 इस आलेख का निर्माण Bharat Bhushan Bhagat जी ने किया है MeghNet ब्लॉग पर www.meghnet.in 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

100 लोगो की सूची मे डॉ अंबेडकर जी प्रथम विश्व रत्न बाबा साहब

आज हम डॉ. अम्बेडकर के एक ऐसेचमत्कार और उस दौर की बात कर रहे है जो समय उन्होने न्यूयार्क,
 अमेरिका में 1913 से 1916 के बीच कोलम्बिया युनिवर्सिटी मेंबिताया ।ऐसा डॉ. अम्बेडकर और बड़ोदा महाराज के बीच हुऐ करार से सम्भव हो पाया जिसके अन्तर्गत 10 वर्षों तक रियासत की सेवा करने का करार। जिसके तहत डॉ. अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेजना तय हुआ । बीसवीं शताब्दी में डॉ. अम्बेडकर ऐसे प्रथम श्रेणी के राजनेताओं में पहले व्यक्ति थे । जिन्होने अमेरिका जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त की ।जून 1916 में उनके द्वारा किये गये शोध ‘‘नेशनल डिविडेन्ड इन इण्डिया ए हिस्टोरिक एण्ड ऐनेलेटिक स्टेडी’’ पर शोध विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया । जिस पर डॉ. अम्बेडकर को (डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी) पी. एच. डी. की उपाधि से सम्मानित किया गया । डॉ. अम्बेडकर कि इस सफलता से प्रेरित होकर ‘‘कला संकाय के प्राध्यापकों और विद्यार्थीयों’’ ने एक विशेषभोज देकर डॉ. अम्बेडकर का सम्मान किया जो महान व्यक्ति अब्राहन लिंकन व वांशिगटन की परम्परा का अनुसरण था । ‘‘इस शोध प्रबंध में
 डॉ. अम्बेडकर ने बिट्रिशसरकार द्वारा भारत के आर्थिक शोषण की एक नंगी तस्वीर दुनिया के सामने रखी जो आज एक ऐतिहासिक दस्तावेज है’’ ।डॉ. अम्बेडकर द्वारा सामाजिक न्याय व समता के संबंध
 में भारतीय दलित समाज के लिए उनके द्वारा किये गये‘‘सविधान निर्माण’’ की उपलब्धि से प्रभावित
 होकर ‘‘कोलम्बिया विश्वविद्यालय न्यूयार्क, अमेरिका ने जून 1952 में’’ डॉ. अम्बेडकर को ‘‘डॉक्टर ऑफ लॉ’’ की मानद उपाधि प्रदान की । इस कोलम्बिया विश्वविद्यालय न्यूयार्क अमेरिका ने जिसकी स्थापना वर्ष 1754, के 250 वर्ष (1754 से 2004) पूरे होने के उपलक्षमें वर्ष 2004 मे अपने 250 वर्ष के पूर्व विद्यार्थीयों मेसे, ऐसे 100 पूर्व विद्यार्थीयों Columbians ahead of their time, (shorted list of Notable persons) को चुना गया जिन्होने दुनिया में महान कार्य किये और जो अपने – अपने क्षेत्र में महान रहे, ‘‘ जिसमें 1
 मात्र भारतीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर व 3 अमेरिका के राष्ट्रपति, थॉडोर रूजवेल्ट, फ्रेकलिन रूजवेल्ट, डोविट एसनहॉवर, 6 अलग- अलग देशों के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्रीजिसमें राष्ट्रपतियों में जार्जिया के मिखैल साकाश्वीली, इथोपिया के थामस हेनडीक, प्रधानमंत्री में इटली के गियूलिनो अमाटो,अफगानिस्तान के अब्दुल जहीर , चीन के तंग शोयी, और पोलेण्ड के प्रधानमंत्री शामील है, तथा कई मंत्री, 40 से अधिक नोबल पुरस्कार विजेता, अमेरिकन सुप्रीम कोर्ट के प्रथम मुख्य न्यायाधीश, 8 अन्य सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, 22 से अधिकअमेरिकी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता, 5 कोलम्बिया विश्वविद्यालय के संस्थापक पितामह, 16 फोरर्चून कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सर्वाधिक धनवान व्यक्तियोंमें शामिल वारेन बफेट, फिलोशोफर जॉन डेव (डॉक्टर अम्बेडकर के गुरू), कई पुलीत्जर पुरस्कार विजेता, ऑस्कर पुरस्कार विजेता, फिल्म मेकर, पत्रकार, इतिहासकार, कवि, पर्यावरणविद्, वैज्ञानिक, चिकित्सक, गीतकार, लेखक, शिक्षाविद्, खिलाडी, गवर्नर,आई.बी.एम. के संस्थापक आदि महान विभूतियां शामिल है । कोलम्बियां युनिवर्सिटी में ऐसे 100 पूर्व
 विद्यार्थीयों के लिये एक स्मारक बनाया गया जिस पर इन 100 महान विभूतियों के नाम लिखे गये । इन
 सभी सम्मानित 100 पूर्व विद्यार्थीयों केनाम को सही क्रम में लगाने के लिए वहां कि विद्वानों कीएक कमेटी बनाई गई । उस कमेटी ने भारतीय संविधान के रचयिता तथा आधुनिक भारत के संस्थापक पितामह बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का नाम प्रथम नम्बर (1) पर रखा ।
 विभूतियों का एक सर्वे किया गया जो “The maker of the universe” शिर्षक के अन्तर्गत100 महान विभूतियों को चुना गया जिसमें भगवान गोतम बुद्ध को प्रथम स्थान तथा भारतीय संविधान के रचयिता डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर को चोथा स्थान मिला ।विश्व कि महान विभुतियों मे टॉप 10 में चोथा स्थान, 122 करोड भारतीयों के लिए गर्व की बात है , और यह भी कहा गया कि समय के साथ
 साथ डॉ अम्बेडकर के विचार प्रासंगिक होते जा रहे है ।अगस्त 2012, मे सी एन एन आई बी. एन. चेनल
 द्वारा द ग्रेटेस्ट इण्डियन शो आयोजित किया गया, जिसमे महानतम भारतीय का चुनाव किया गया । इस
 चुनाव मे 100 भारतीयो को सूचिबद्व किया, जिसमे से शीर्ष 10 भारतीयो को चुना गया ।जिसके लिए
 दुनियाभर से ऑनलाइन वोटिंग के आधार पर मोबाइल मिस्डकॉल, इन्टरनेट द्वारा वोटिंग की गई ।
 जिसमेसर्वाधिक मत डॉ बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर को ही मिले, और उन्होने ग्रेटेस्ट इण्डियनकी दौड़ मे
 सबको पीछे छोड़ दिया । शो मे कुल 80,97,243 वोट दिये गये, जिसमे डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को 19,91,734, के अतिरिक्त अब्दुल कलाम आजाद 13,74,431, सरदार पटेल 5,58,835, अटल बिहारी वाजपेयी1,67,378, मदर टेरेसा 92,645, जे.आर.डी. टाटा 50,407 सचिन तेंदुलकर 47,706, इन्दिरा गांधी 17,641, लता मंगेशकर 11,520, जवाहर लाल नेहरू 9,920मत मिले ।जिसमे जनता ने सर्वाधिक 25 प्रतिशत वोट, लगभग 20 लाख, अकेले डॉ. बी.आर. अम्बेडकर कोदिये गये, जबकि इस महानतम भारतीय चुनने की प्रक्रिया मे मोहनदास
 करमचन्द गांधी को अलग रखा गया । उन्हे बिना वोटिंग पहले ही महानतम भारतीय मान लिया गया । आप समझ सकते है कि यह मिडिया की करतूत है । शायद उन्हे महान भारतीय न चुने जाने का डर रहा होगा, अन्यथा वे ऐसा नही करते, क्योकि ( बिना वोटिंग ) बिना चुनाव के ही, किसी को प्रथम मान लेना, स्पष्टतः पक्षपातपूर्ण रवैये को दर्शाता है, क्योकि आप समझ सकते है कि देश के पहले प्रधानमन्त्री 10 वे नम्बर पर है, और वोटिंग मे उनका प्रतिशत, दशमलव 10 प्रतिशत है । जो एक प्रतिशत से भी बहुत कम है ।जिस तरह का सक्रिय मीडिया हमारे देश में है यह हमारी लिए बहुत अच्छी बात है । लेकिन दलितों की खबरे आते हीपता नहीं इसकी सक्रियता कहा चली जाती है, ऐसा बर्ताव करता है , कि जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं हो । उसी दलित विरोधी भावना को दोहराते हुए , उसने डॉक्टर अम्बेडकर के इस कारनामें को दबाने का प्रयास किया, जो मिडीया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह खडा करता है , जिस टी.आर.पी. केलिए यह छोटी सी खबर को सनसनीखेज बनाने वाला , और छोटे से मुददे को बवन्डर बनाने वाला यह मीडिया , दलित खबर में इसकी यह कार्यकुशलता पता नहीं कहा खो जाती है । उच्च वर्ग की एकछोटी सी खबर का जिस प्रकार सीधा प्रसारण किया जाता है जैसे कि वह देश की सबसे बडी खबर हो । आज मीडियाकर्मी इस महान व्यक्ति के द्वारा बनाये गये संविधान से प्राप्त अधिकारों की बात करते है लेकिन जिस प्रकार इनके साथ भेदभाव करते है यह उनकी हिन भावना की धोतक है ।सम्पूर्ण भारत मे एक मात्र महाराष्ट्र के मुख्य समाचार पत्र सामना ने 9 नवम्बर 2011 को इस ऐतिहासिक खबर को मुख पृष्ठ पर स्थान दिय नहीं तो जो व्यक्ति भारत से इकलोता होने के साथ साथ ऐसे महान लोगों की पंक्ति में आगे खडा हो, जिसकी छोटी सी हलचल सुर्खिया बन जाती हो । यह हमारे देश के 121 करोड लोगों के लिए एक बहुत बडे
 गर्व की बात है ओर जो 250 वर्षो के सर्वे के आधार पर उसे चुना गया हो इससे बडा चमत्कार कोई नहीं हो सकता, ना ही ऐसा भविष्य में होने की संभावना है । चूंकि वह दलित है इसलिए उसका जितेजी शोषण किया और उनके मरने के बाद भी यह दलित विरोधी मीडिया व लोग शोषण करने से नहीं चुकते ।जिस देश में केवल खेल और मनोरंजन कराने वाले कई लोगों को कई डॉक्टरेट की मानद उपाधी दे दी जाती है जबकि डॉक्टर अम्बेडकर के मामले में इनका रवैया भेदभाव रहा था और रहा है । ऐसी ही भावना के चलते बडे दुख की बात है कि जनवरी 1952 में सम्पूर्ण भारत के एकमात्र विश्वविद्यालय मेंडॉक्टर अम्बेडकर के द्वारा संविधान निर्माण पर पर उन्हें डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि प्रदान की । यह दलित शोषण की भावना को दर्शाता है ।हालांकि मेरा इस पर कोई विवाद नहीं है, मुझे तो इस बात पर भी संदेह है कि जिस प्रकार कोलम्बिया विश्वविद्यालय व विकिपेडिया की वेबसाइट द्वारा डॉ. अम्बेडकर का नाम नोटेबल लोगों की लिस्ट में दबाने का प्रयास किया गया । हाईलाइट नहीं किया गया । मुझे तो इस पर भी संदेह है कि, एक भारतीय होने के कारण उनके साथ किसी भेदभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोलम्बिया विश्वविद्यालय एक अमेरिकी विश्वविद्यालय है, डॉ. अम्बेडकर
 को जो सम्मान मिलना चाहिये उसे देने में वे बडा असहज महसूस कर रहे होगें, ।वैसा मेरा कोई विरोध नहीं हैफिर भी जिस प्रकार वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को राष्ट्रपति बनते ही शांति के लिए नोबल जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया । इससे आप इसकी विश्वसनीयता ओर अमेरिकी एकाधिकार को समझ सकते है ।डॉ. अम्बेडकर द्वारा सामाजिक न्याय व समतामूलक समाज के निर्माण में जो महानयोगदान दिया । जिसके इतने बेहतरीन चौकाने वाले परिणाम आज हम देख रहे है । ऐसा उदाहरण दुनिया के इतिहास मे कहीं नहीं मिलता है ।जिसके फलस्वरूप आज दलितों की स्थिति में तीव्र गति से ऐतिहासिक सुधार हुआ है जिसके परिणामस्वरूप आज भारतीय समाज में दलितों की पहचान बनना प्रारम्भ हो गई है जिसे दलित विरोधी मिडीया दबाने का प्रयास कर रहा है ।यह डॉक्टर अम्बेडकर के योगदान का ही परिणाम है कि आज हम इस बिन्दु पर अपना पक्ष रख रहे है, इसमें कोई संदेह नहीं है, वे दुनिया में सर्वश्रैष्ठ थे, और सर्वश्रैष्ठ रहेगे ।प. मदन मोहन मालवीय ने बाबा साहेब के अपार ज्ञान को समझकर एक बार
 लाहौर में 1935 में कहा था कि वे ज्ञान के भंडार हैं । असीमित ज्ञान केधनी हैं । उनके विश्वास और हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार वे देवी सरस्वती के पुत्र हैं । उनका ज्ञान आगध है ।उनके ज्ञान की कोई सीमा नही है । उन्होंने इसी अपरिमित ज्ञान के आधार पर समाज और धर्म को सुधारना चाहा है, परन्तु धर्म के ठेकेदारों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है अगर हिन्दू धर्मको जीवित रखना है तो डॉ. अम्बेडकर के विचारों को मानकर चलना होगा । उनके अगाधज्ञान की जितनी प्रशंसा की जाए वह सब थोड़ी ही होगी ।
 बाबा साहेब के केन्द्रिय सरकार ने एक्जीक्यूटिव सरकार बनने के उपलक्ष्य में 1944 में मालवीय
 जी ने हिंदू विश्वविधालय ( इस विश्वविधालय के संस्थापक स्वंय मालवीय जी थे ) में बाबा साहेब
 का स्वागत समारोह आयोजित किया । इस अवसर पर मालवीय जी ने कहा कि – ‘‘जिस ज्ञान पर
 ब्राह्यणों ने एक छत्र अधिकार कर रखा था उसे डाक्टर साहेब ने अपनी प्रकांड विद्वता से छिन्न-भिन्न
 कर दिया है । इन्होंनेकिसी भी ब्राह्यण विद्वान से ज्यादा ज्ञान अर्जित किया है । वे अपार, अगाध और
 असीम ज्ञान के भंडार है ।’’‘‘इसी गहन अध्ययनशीलता के कारण उनके तर्क अकाट्य होते थे, मान्य और प्रमाणिक होते थे । उनके इसी अथाह ज्ञान के कारण उनके घोर विरोधी महात्मा गांधी जैसे लोग भी उनकी विद्वता पवित्रता और राष्ट्रधर्मिता को मानते थे ।’’महारानी एलिजाबेथ ने डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाणपर कहा कि – ‘‘दुःख की बात है कि महामानव डॉ. अम्बेडकर का जन्म भारत में हुआ । यदि इनका जन्म किसी अन्य देश मेंहुआ होता तो इनको सर्वमान्य विश्वविभूति में मान मिलता । ’’बाबा साहब जैसी महान शख्सियत के महापरिनिर्वाण पर लन्दन टाइम्स ने कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया ‘‘भारतमें ब्रिटिश शासन के अंतिम दिनों के राजनैतिक और सामाजिक इतिहास में डॉ. अम्बेडकर का नाम प्रमुखता से जगमगायेगा । उनका धीरज औरदृढ़ निश्चय उनके चेहरे पर सदा झलकता था ।
इस स्मारक का अनावरण अमेरिकी राष्ट्रपति और नोबल पुरस्कार विजेता बराक ओबामा ने किया, यह स्मारक आज भी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के केम्पस में शान से खड़ा है ।वर्तमान में कोलम्बिया विश्वविद्यालय ने अपनी इस सूची में ओर कई नाम जोडने का फैसला किया है जिसमें वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति व नोबल पुरस्कार विजेता बराक हुसैन ओबामा भी शामिल है तथाओर भी कई नाम इसमें जोडे जा रहे है ।जबकि भारत में इस दलित विरोधी मीडीया में न तो कोई खबर है न ही कोई आवाज, एक सर्वे के अनुसार www.whopopular,indianleadarand politician की वेबसाइट में डॉ. अम्बेडकर नं. 1 रहे है । आज भी इन्टरनेटपर दुनिया में सबसे ज्यादा सर्च किये जाने वाले महान व्यक्तियों में शामिल है ।वर्ष 2011 मे आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्धारा बीते10 हजार वर्षो में विश्व में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले दुनिया की महान